‘शालीन’ सुषमा और ‘जेन्युन’ जेटली : मोदी को प्रधानमंत्री बनाने वाले दो महान आर्किटेक्ट

Written by

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 25 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज पीएम पद पर आसीन हैं तो निःसंदेह इसमें उनकी कड़ी मेहनत, पार्टी के प्रति निष्ठा, कार्यकर्ताओं का विश्वास हासिल करने के अलावा अपने कामों से लोगों में अर्जित की गई लोकप्रियता ही महत्वपूर्ण कारण है। इन सबके बावजूद इस पद तक पहुँचने में कई मुश्किलें और बाधाएँ थी, जिनसे निपटना अकेले मोदी के वश में नहीं था, तब भाजपा के दो दिग्गज नेताओं ने आगे बढ़कर ऐसी भूमिका निभाई थी और मोदी को गुजरात के सीएम से देश के पीएम पद तक ले जाने का मार्ग प्रशस्त किया था। इन दो दिग्गज नेताओं में से एक नाम सुनकर कदाचित आपको अचरज होगा, परंतु जब मैं इनकी भूमिका स्पष्ट करूंगा तो आपको भी यकीन हो जाएगा। भाजपा के यह दो धुरंधर नेता थे सुषमा स्वराज और अरुण जेटली, जिन्हें नरेन्द्र मोदी को पीएम बनाने वाला आर्किटेक्चर कह सकते हैं।

पेशे से सुप्रीम कोर्ट के वकील और लोकसभा का कोई चुनाव नहीं जीतने के बावजूद भाजपा संगठन में और केन्द्र की सरकार में अरुण जेटली ने महत्वपूर्ण पदों पर रहकर अपनी अहम भूमिका निभाई थी। उनका 24 अगस्त शनिवार को दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया, वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उन्होंने मोटापा घटाने के लिये बैरिएट्रिक सर्जरी करवाई थी। इसके अलावा वह किडनी की बीमारी से भी पीड़ित थे, इसलिये पिछले साल ही उन्होंने किडनी का प्रत्यारोपण करवाया था, चूँकि वह सॉफ्ट टिशू सारकोमा (कैंसर) से भी पीड़ित थे और किडनी ट्रांसप्लांट को ज्यादा समय नहीं हुआ था, इसलिये सारकोमा की सर्जरी नहीं की गई थी, वह कीमोथेरेपी ले रहे थे, परंतु इसी बीमारी के कारण उन्हें साँस लेने में परेशानी हो रही थी, जिससे उपचार के लिये 9 अगस्त को उन्हें एम्स में दाखिल किया गया था, जहाँ 16 दिन के उपचार के बाद उनका निधन हो गया। जब उनका निधन हुआ तब दिल्ली में कोई बड़े नेता मौजूद नहीं थे। पीएम मोदी विदेश दौरे पर हैं, गृह मंत्री अमित शाह आंध्रप्रदेश के दौरे पर थे और विपक्षी नेता राहुल गांधी श्रीनगर में थे। पीएम मोदी ने ट्वीट करके जेटली के निधन पर शोक व्यक्त किया और कहा कि उनका निकटतम मित्र उन्हें छोड़कर चला गया। अमित शाह अपना दौरा अधूरा छोड़कर दिल्ली लौट आये और राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं को श्रीनगर से धकेलकर दिल्ली भेजा गया। रविवार सुबह जेटली के पार्थिव शरीर को भाजपा मुख्यालय में अंतिम दर्शन के लिये रखा गया है, जहाँ देश भर के भाजपा नेता और कार्यकर्ता उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। दोपहर 12 बजे यहाँ से उनकी अंतिम यात्रा निकाली जाएगी और 2 बजे निगम बोध घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

ऐसी थी नरेन्द्र मोदी और अरुण जेटली की मित्रता

अरुण जेटली भाजपा के उन बहुत कम नेताओं में से एक थे, जिनकी हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं पर अच्छी पकड़ थी। वह सरल स्वभावी, मिलनसार और मृदुभाषी वक्ता भी थे। वास्तव में उनके रूप में भाजपा ने एक अमूल्य संपत्ति खो दी है, जिसकी भरपाई करना मुश्किल है। बहुत कम समय में उन्होंने पार्टी में अपना महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर लिया था। वह भाजपा में अटल-आडवाणी-मुरली मनोहर जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे और सुषमा स्वराज समेत अव्वल दर्जे के नेताओं के बाद दूसरी पंक्ति के नेताओं में मुखर और प्रखर नेता थे। जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व के बावजूद 2004 में भाजपा और उसके नेतृत्ववाले एनडीए की सत्ता में वापसी नहीं हो पाई और 2009 में आडवाणी का नेतृत्व भी पार्टी को सत्ता नहीं दिला पाया तो 2014 में पार्टी में नये पीएम कैडिडेट को आगे लाने की बात आई। उस समय गुजरात के सीएम नरेन्द्र मोदी के नाम की चर्चा शुरू हुई तो गुजरात दंगों का दंश झेल रहे मोदी को पार्टी के अंदर और बाहर दोनों ही मोर्चों पर कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। पार्टी के सीनियर नेताओं मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली आदि का नाम जानबूझकर होड़ में शामिल कर दिया गया था।

राजनीति के जानकारों के अनुसार जब गुजरात के सीएम बनने से पहले नरेन्द्र मोदी दिल्ली में भाजपा के महासचिव थे, तब जेटली भी संगठन में ही थे और इसी दौरान दोनों एक-दूसरे के मित्र बने थे। दोनों ने ही अपनी दोस्ती खूब निभाई। जब केन्द्र में वाजपेयी सरकार बनी और जेटली को मंत्रिमंडल में स्थान मिला, तो इसके बाद जेटली ने मोदी के लिये भी दिल्ली में सियासी जमीन तैयार करने की शुरुआत कर दी थी। हालांकि इसी दौरान भूकंप के बाद गुजरात में देश-विदेश से आ रही राहत सामग्री की लूट-खसोट शुरू हो गई और स्थानीय केशूभाई पटेल सरकार स्थिति को नियंत्रित कर पाने में कमजोर साबित हो रही थी। इससे देश और दुनिया में भाजपा की फजीहत हो रही थी और 2002 में ही राज्य विधानसभा के चुनाव आने वाले थे। ऐसे में तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी को गुजरात में मुख्यमंत्री बदलने की जरूरत पड़ी, जिससे जेटली को दोस्त की मदद करने का मौका मिल गया और जानकारों के कथनानुसार उनकी सलाह पर ही मोदी को सीएम बनाकर दिल्ली से गुजरात भेजा गया था। हालाँकि उन पर भी गोधरा कांड के बाद भड़के सांप्रदायिक दंगों का दाग़ लग गया। तब मोदी देश विदेश की मीडिया और राजनीति की सुर्खियों में आये और चारों ओर से उन्हें विरोध झेलना पड़ा। यह विरोध जितना बाहर था, उतना ही पार्टी के अंदर भी था। ऐसे में भी जेटली ने उनका साथ नहीं छोड़ा था और सीएम के खिलाफ जितनी भी कोर्ट कार्यवाही हुई, जेटली ने ही मुखर होकर मोदी की तरफ से उनका सामना किया। मोदी ने भी मित्रता निभाई और उन्हें गुजरात से राज्यसभा का सांसद बनाया। इसके बाद जब मोदी के सहयोगी अमित शाह पर फर्जी एनकाउंटर मामलों में सीबीआई ने शिकंजा कसा, तब भी जेटली ने ही शाह का भी साथ दिया था। इसके बाद 2014 में पीएम कैंडिडेट के तौर पर मोदी के नाम को आगे करने में भी जेटली ही मुखर रहे। जेटली ने विरोधी खेमे में शामिल मध्य प्रदेश के तत्कालीन सीएम शिवराज सिंह चौहान, राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया, खुद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे महाराष्ट्र के कद्दावर भाजपा नेता नितिन गड़करी आदि को भी शांत किया। जेटली को इसके इनाम के रूप में मोदी ने भी अपने मंत्रिमंडल में दूसरे नंबर का स्थान दिया और वित्त मंत्री बनाया था। जेटली और मोदी दोनों ही कड़े फैसले लेने के लिये जाने जाते हैं। दोनों ने मिलकर ही जनधन योजना को सफलतापूर्वक लागू किया और जीएसटी कानून का अमल शुरू किया। बीमार होने के बावजूद जेटली ने राफेल मुद्दे पर पीएम मोदी का बचाव करते हुए राहुल गांधी पर पलटवार किये थे।

शालीन सुषमा ने मोदी के साथ बनाया सामंजस्य

सुषमा स्वराज भले ही आजीवन आडवाणी खेमे की नेता रहीं, परंतु वे साथ ही एक ऐसी प्रामाणिक और निष्ठावान नेता भी रहीं, जो रहन-सहन, बोली-भाषा और व्यवहार में सरल थीं। वे विवादों से हमेशा दूर रहीं और पार्टी के प्रति निष्ठावान रहीं। उन्होंने पार्टी लाइन को कभी क्रॉस नहीं किया और न ही मुखर रूप से किसी का विरोध किया। वह सीनियर या जूनियर का फर्क भूलकर सभी पंक्ति के नेताओं में सामंजस्य बैठाकर काम करती थी। यही कारण है कि पीएम कैंडिडेट के लिये होड़ में उनका नाम भी चर्चा में होने के बावजूद तथा वे हर प्रकार से सक्षम और दावेदार होने के बाद भी उन्होंने पीएम कैंडिडेट के रूप में उभरे गुजरात के तत्कालीन सीएम मोदी का कभी कोई विरोध नहीं किया। उन्होंने आडवाणी खेमे में भी अपनी निष्ठा बनाये रखते हुए मोदी सरकार में विदेश मंत्री के पद पर रहते हुए ऐसे-ऐसे काम किये, जिनके लिये लोग उन्हें कभी नहीं भूल पाएंगे। विदेशों में मुश्किल में फँसे लोगों की उन्होंने जिस तरह से मदद की और उन्हें मुश्किलों से जिस खूबी से बाहर निकाला उसके लिये लोग उन्हें याद करते हैं और उन्हें माँ की संज्ञा देते हैं। क्योंकि वह माँ की तरह ही हर देशवासी की चिंता करती थीं। अपने विभाग में भी उनके काम करने के तौर-तरीकों से कभी किसी को कोई परेशानी नहीं हुई। इस प्रकार शालीन सुषमा ने न सिर्फ अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखा, बल्कि मोदी का विरोध करने वालों को भी शालीनता का पाठ पढ़ाकर पार्टी हित में शांत रहने की सलाह दी। यह दोनों ही ऐसे नेता थे, जो यदि चाहते तो अपना निजी स्वार्थ देखते हुए पीएम पद की दावेदारी पेश कर सकते थे, यदि ऐसा होता तो इनमें से कोई भी प्रधानमंत्री बन सकता था, परंतु उन्होंने निजी हित की परवाह न करते हुए पार्टी हित और देश हित को तवज्जो दी, जिसके परिणाम स्वरूप पार्टी और देश को पीएम के रूप में मोदी जैसे विराट व्यक्तित्व और कृतित्व की प्राप्ति हुई।

Article Categories:
News

Comments are closed.

Shares