VIDEO : जब पहली बार अटलजी के मुखारविंद से दुनिया के 150 देशों के बीच गूँजी हिन्दी

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रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 14, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। ‘मैं, भारत की जनता की ओर से राष्ट्रसंघ के लिए शुभकामनाओं का संदेश लाया हूँ।’ अटलजी के मुख बिन्दु से निकले इन चंद शब्दों को सुनते ही संयुक्त राष्ट्र यानी यूएन की सभा में बैठे सभी अतिथिगण तालियाँ बजाने पर विवश हो गए। तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूँज उठा। आज से 42 वर्ष पहले ही यूएन जैसे अंतराष्ट्रीय मंच से अटलजी ने हिन्दी भाषा को अधिकारिक बनाने की पहल कर दी थी। 4 अक्टूबर 1977 को भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था, जब भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे किसी मंत्री ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हिन्दी में अपने विचार व्यक्त किए थे। अटलजी को अंतर्राष्टीय हिन्दी प्रचारक कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।

देश में आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव 1977 मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी सरकार का गठन हुआ। इस सरकार में तत्कालीन जनसंघ (अब भाजपा) के नेता अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बनाए गए। इसी दौरान संयुक्त राष्ट्र महासभा में संबोधन का दिन आया। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने दुनिया की इस पंचायत में भारत की ध्वनि पहुँचाने के लिए विदेश मंत्री के रूप में वाजपेयी को भेजा। अटल बिहारी वाजपेयी 4 अक्टूबर, 1977 को संयुक्त राष्ट्रसंघ में बोलने के लिए खड़े हुए, तब किसी को अनुमान भी नहीं था कि वे हिन्दी में बोलेंगे। भारत की ओर से अब तक किसी भी प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री ने इस मंच से अंग्रेजी में ही भाषण दिया था, परंतु अटलजी ने उस दिन हिन्दी में भाषण दिया और ऐसा करने वाले वे पहले भारतीय राजनेता बने। अटलजी जब हिन्दी में भाषण दे रहे थे, तब यूएन की उस सभा में विश्व के लगभग 150 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे। अटलजी के भाषण के द्वारा पहली बार विदेशियों का हिन्दी भाषा से परिचय हुआ। अटलजी के भाषण ने सभी के दिल में हिन्दी भाषा का गहरा प्रभाव छोड़ा। जिसकी छाप आज तक संयुक्त राष्ट्रसंघ के सदस्य देशों में देखने को मिलती है।

क्या कहा था अटलजी ने ?

अटल बिहारी वाजजपेयी ने चिर-परिचित शैली में हिन्दी भाषा में अपने भाषण का आरंभ करते हुए कहा था, ‘‘अध्यक्ष महोदय, मैं भारत की जनता की ओर से राष्ट्रसंघ के लिए शुभकामनाओं का संदेश लाया हूँ। महासभा के इस 32 वें अधिवेशन के अवसर पर मैं राष्ट्रसंघ में भारत की दृढ़ आस्था को पुन: व्यक्त करना चाहता हूँ। जनता सरकार को शासन की बागडोर संभाले केवल 6 मास हुए हैं फिर भी इतने अल्प समय में हमारी उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं। भारत में मूलभूत मानव अधिकार पुन: प्रतिष्ठित हो गए हैं जिस भय और आतंक के वातावरण ने हमारे लोगों को घेर लिया था वह अब दूर हो गया है ऐसे संवैधानिक कदम उठाए जा रहे हैं जिनसे ये सुनिश्चित हो जाए कि लोकतंत्र और बुनियादी आजादी का अब फिर कभी हनन नहीं होगा। अध्यक्ष महोदय वसुधैव कुटुंबकम की परिकल्पना बहुत पुरानी है भारत में सदा से हमारा इस धारणा में विश्वास रहा है कि सारा संसार एक परिवार है अनेकानेक प्रयत्नों और कष्टों के बाद संयुक्त राष्ट्र के रूप में इस स्वप्न के साकार होने की संभावना है यहां मैं राष्ट्रों की सत्ता और महत्ता के बारे में नहीं सोच रहा हूँ। आम आदमी की प्रतिष्ठा और प्रगति के लिए कहीं अधिक महत्व रखती है अंतत: हमारी सफलताएं और असफलताएँ केवल एक ही मापदंड से नापी जानी चाहिए कि क्या हम पूरे मानव समाज वस्तुत: हर नर-नारी और बालक के लिए न्याय और गरिमा की आश्वसति देने में प्रयत्नशील हैं। अफ्रीका में चुनौती स्पष्ट हैं प्रश्न ये है कि किसी जनता को स्वतंत्रता और सम्मान के साथ रहने का अनपरणीय अधिकार है या रंग भेद में विश्वास रखने वाला अल्पमत किसी विशाल बहुमत पर हमेशा अन्याय और दमन करता रहेगा। नि:संदेह रंगभेद के सभी रुपों का जड़ से उन्मूलन होना चाहिए हाल में इज़रायल ने वेस्ट बैंक को गाजा में नई बस्तियां बसा कर अधिकृत क्षेत्रों में जनसंख्या परिवर्तन करने का जो प्रयत्न किया है संयुक्त राष्ट्र को उसे पूरी तरह अस्वीकार और रद्द कर देना चाहिए। यदि इन समस्याओं का संतोषजनक और शीघ्र ही समाधान नहीं होता तो इसके दुष्परिणाम इस क्षेत्र के बाहर भी फैल सकते हैं यह अति आवश्यक है कि जेनेवा सम्मेलन का पुन: आयोजन किया जाए और उसमें पीएलओ का प्रतिनिधित्व किया जाए। अध्यक्ष महोदय, भारत सब देशों से मैत्री चाहता है और किसी पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं चाहता भारत ना तो आण्विक शस्त्र शक्ति है और न बनना ही चाहता है नई सरकार ने अपने असंदिग्ध शब्दों में इस बात की पुनघोर्षणा की है हमारी कार्यसूची का एक सर्वस्पर्थी विषय जो आगामी अनेक वर्षों और दशकों में बना रहेगा वह है मानव का भविष्य। मैं भारत की ओर से इस महासभा को आश्वासन देना चाहता हूँ कि हम एक विश्व के आदर्शों की प्राप्ति और मानव कल्याण तथा उसके गौरव के लिए त्याग और बलिदान की बेला में कभी पीछे नहीं रहेंगे।
जय जगत धन्यवाद।’’

हिन्दी के प्रति आजीवन समर्पित रहे अटलजी

अटलजी ने अपने पूरे जीवन काल हिन्दी के प्रचार-प्रसार में बिताए। अटलजी को हिन्दी भाषा से बहुत लगाव था। वह हिन्दी में कविताएँ भी लिखा करते थे, जिसे लोग आज भी पसंद करते हैं। वर्ष 2015 में उन्‍हें भारत के सर्वोच्‍च नागरिक सम्‍मान भारत रत्‍न से सम्‍मानित किया गया था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 अगस्त 2018 की शाम 05-05 बजे अंतिम सांस ली और दुनिया को अलविदा कह गए। मां भारती के सच्चे सपूत, राष्ट्र पुरुष, राष्ट्र मार्गदर्शक, सच्चे देशभक्त अटल बिहारी वाजपेयीजी सही मायने में ‘भारत रत्न’ थे। अटल बिहारी वाजपेयीजी एक महापुरुष थे, जिन्होंने जमीन से जुड़े रह कर राजनीति की और ‘जनता के प्रधानमंत्री’ के रूप में लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बना गए। अटल बिहारी वाजपेयी के हिन्दी में महत्पपूर्ण योगदान को देखते हुए भोपाल में अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। ज्ञान-विज्ञान के सभी क्षेत्रों में शिक्षण, प्रशिक्षण एवं शोध को हिन्दी माध्यम से बढ़ाने हेतु 19 दिसंबर, 2011 को मध्यप्रदेश शासन ने इस विश्वविद्यायल की की शुरूआत की। इस विश्वविद्यालय का उद्देश्य ऐसी युवा पीढ़ी का निर्माण करना है, जो समग्र व्यक्तित्व विकास के साथ रोजगार कौशल और चारित्रिक दृष्टि से विश्वस्तरीय हो। विश्वविद्यालय का शिलान्यास 6 जून 2013 को भारत के पूर्व राष्ट्रपति माननीय श्री प्रणव मुखर्जी के कर-कमलों से ग्राम मुगालिया कोट में रखा गया। विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के लिए 18 संकायों में 231 से अधिक पाठ्यक्रमों का हिन्दी में निर्माण किया गया है। विश्वविद्यालय में प्रत्येक छात्र को हिन्दी भाषा के साथ-साथ एक विदेशी भाषा और एक प्रांतीय भाषा भी सिखाई जा रही है।

आप भी सुनिए 4 अक्टूबर, 1977 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अटलजी का हिन्दी में किया गया संबोधन :

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