क्या है उस ‘अयोध्या रीविज़िटेड’ पुस्तक में, जिसे लेकर ‘फाड़ाफाड़ी’ पर उतर आए मुस्लिम पक्ष के वकील ?

Written by

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 16 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की पिछले 40 दिन से प्रति दिन चल रही अंतिम सुनवाई बुधवार को खत्म हो गई। अब सर्वोच्च अदालत ने अपना फैसला सुनाने से पहले अगले तीन दिन में पक्षकारों से मोल्डिंग ऑफ रिलीफ पर लिखित हलफनामा माँगा है। अंतिम दिन सुनवाई पूरी होने से पहले कोर्ट रूम में दोनों पक्षकारों के बीच जम कर गहमागहमी भी देखने को मिली। कोर्ट से बाहर आने के बाद दोनों पक्षकारों के वकीलों ने दावे किये कि अदालत में उनका पक्ष मजबूत रहा। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस ऑफ इण्डिया (CJI) रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर और बाबरी मस्ज़िद की विवादित ज़मीन को लेकर गत 6 अगस्त से दैनिक सुनवाई शुरू की थी। हर सप्ताह 5 दिन सुनवाई हुई, जिसमें दोनों पक्षों को अपने-अपने पक्ष में मजबूत दलीलें और प्रमाण पेश करने का अवसर दिया गया था। मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने अयोध्या में विवादित स्थल पर राम जन्मभूमि मंदिर होने से जुड़ा एक नक्शा फाड़ कर कोर्ट की कार्यवाही को लटकाने और भटकाने की नाकाम कोशिश की थी। हालाँकि उनकी चाल सफल नहीं हुई। इसको लेकर कोर्ट रूम में काफी ड्रामा जरूर हुआ। सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्या है उस ‘अयोध्या रिविजिटेड’ पुस्तक में, जिसे लेकर मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ‘फाड़ाफाड़ी’ पर उतर आये। आइये जानते हैं इस पुस्तक के बारे में…

सेवा निवृत्त आईपीएस किशोर कुणाल ने लिखी है पुस्तक

सुनवाई के अंतिम दिन हिंदू पक्षकार के वकील विकास सिंह ने पीठ के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए कहा कि वे ‘अयोध्या रिविजिटेड’ किताब कोर्ट के समक्ष रखना चाहते हैं। यह पुस्तक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी किशोर कुणाल ने लिखी है। इस पुस्तक में विवादित ज़मीन पर राम मंदिर होने का उल्लेख किया गया है। किताब में हंस बेकर का कोट है। चैप्टर 24 में लिखा गया है कि राम जन्मभूमि मंदिर में जन्म स्थान के वायुकोण में रसोई थी। जन्म स्थान के दक्षिणी भाग में कुआँ था। बेकर की किताब के हिसाब से जन्म स्थान मंदिर परिसर के ठीक बीच में था। विकास सिंह ने उसी किताब का एक नक्शा भी कोर्ट को दिखाया, जिसकी एक कॉपी मुस्लिम पक्ष के वकील के पास भी थी। उन्होंने वह कॉपी ली और कोर्ट में पीठ के सामने ही उसे पाँच टुकड़ों में फाड़ दिया। इसी के साथ धवन ने यह भी कहा कि वे इसका गंभीरता से विरोध करते हैं।

वह नक्शा जिसे मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने पाँच टुकड़ों में फाड़ दिया। हिंदू पक्षकार हिंदू महासभा ने सप्रमाण सुप्रीम कोर्ट में पेश करने के लिये यह नक्शा ब्रिटेन की लाइब्रेरी से निकलवाया था, जो 1810 का बताया जा रहा है। इसमें यह भी लिखा गया है कि तीन गुंबद के नीचे राम मंदिर लिखा है।

नक्शा फाड़ने के मुद्दे पर दोनों पक्षों के वकीलों के बीच तीखी बहस भी हुई थी, जिससे नाराज़ हुए सीजेआई गोगोई को कहना पड़ा कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो कोर्ट सुनवाई को अभी खत्म कर देगी और जज उठ कर चले जाएँगे। माना जा रहा है कि मुस्लिम पक्ष के वकील जो अपने पक्ष में अदालत के समक्ष मजबूत दलील और प्रमाण रखने में कमजोर साबित हो रहे थे, उनकी ओर से अदालती कार्यवाही को बाधित करने और मामले को लटकाने-भटकाने के प्रयासों के तहत यह कदम उठाया गया हो सकता है, परंतु सीजेआई के कड़े रुख के समक्ष उनकी मंशा सफल नहीं हो सकी।

पुस्तक में राम जन्मभूमि मंदिर का अस्तित्व होने का दावा

उल्लेखनीय है कि किशोर कुणाल ने लगभग 20 वर्षों तक अयोध्या मामले पर शोध किया है। उन्होंने ब्रिटिश काल की पुरानी फाइलों, प्राचीन संस्कृत सामग्री और पुरातत्व खुदाई की समीक्षाओं के साथ ‘अयोध्या रिविज़टेड’ किताब लिखी है, जो 2016 में प्रकाशित की गई थी। इसमें यह बताने का प्रयास किया गया है कि अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर का अस्तित्व था, जिस पर बाद में मस्ज़िद बनाई गई थी। किशोर कुणाल ने अपनी पुस्तक में प्रमाणित भी किया है कि अयोध्या में विवादित स्थल पर ही राम मंदिर था, वहीं पर भगवान राम की जन्मभूमि भी है। अपनी किताब में उन्होंने कई पुरानी धारणाओं को भी गलत सिद्ध किया है। उन्होंने पुस्तक में प्रमाणों के आधार पर इस दावे को खारिज कर दिया है कि राम जन्मभूमि स्थल पर बाबरी मस्ज़िद का निर्माण बाबर ने किया था। उन्होंने कहा कि बाबरी मस्ज़िद से बाबर का कोई लेना-देना नहीं था। बाबर कभी न तो अयोध्या गया था, न ही उसने कोई मंदिर तोड़ा और न ही कोई मस्ज़िद बनवाई। अपनी किताब के माध्यम से किशोर कुणाल ने बाबर को क्लीन चिट देते हुए लिखा है कि बाबर एक उदारवादी शासक था। किताब में लिखा गया है कि दो शिलालेख को प्रमाण के रूप में लिया जा रहा है कि मस्ज़िद को मीर बाकी ने बनवाया था, जबकि यह प्रमाण झूठे हैं। किताब में बुकानन के रिकॉर्ड्स के आधार पर यह भी कहा गया है कि औरंगज़ेब के शासन काल में अयोध्या, काशी और मथुरा के मंदिरों को तोड़ा गया था। किशोर कुणाल के मुताबिक विवादित स्थल पर रामलला विराजमान के होने की बात को सिद्ध करने के लिये पुस्तक में 12 नये दस्तावेजों को जोड़ा गया है। पुस्तक में यह भी कहा गया है कि ज्यादातर मंदिर औरंगज़ेब के शासन काल में ही तोड़े गये थे। पुस्तक में बाबरनामा के हवाले से लिखा गया है कि बाबरनामा में मंदिर को तोड़े जाने या मस्ज़िद बनाने का कोई उल्लेख नहीं है। फिर यह सवाल यह उठता है कि तो राम मंदिर को किसने और कब तोड़ा ?

पुस्तक में बाबरी मस्ज़िद से बाबर के संबंध को नकारा गया है

इसका भी पुस्तक में सप्रमाण उत्तर देते हुए किशोर कुणाल ने लिखा है कि 1528 में मंदिर को मीर बाकी ने ध्वस्त नहीं किया था। औरंगज़ेब के शासन काल में 1660 में औरंगज़ेब के एक रिश्तेदार फिदाई खान ने मंदिर को तोड़ कर उस स्थान पर मस्ज़िद बनवाई गई थी। किताब ने दस्तावेजों के आधार पर यह भी सिद्ध किया है कि 1858 तक इस मंदिर (जो मस्ज़िद बन चुका था) में नमाज़ भी पढ़ी जाती थी और पूजा भी की जाती थी। 1858 में पहली बार इस नमाज और पूजा को लेकर सांप्रदायिक दंगा हुआ था। इसके बाद जान बूझ कर अफवाह फैलाई गई थी कि हनुमानगढ़ी में जो मंदिर है वह अवध नवाबों के समय में बनाया गया था। यह भी अफवाह फैलाई गई थी कि आलमगिरि मस्ज़िद के ऊपर ये मंदिर बनवाया गया था। किशोर कुणाल के अनुसार इतिहास में पहली बार सिद्ध किया गया कि उसी स्थल पर राम मंदिर था और वही स्थान भगवान राम की जन्मभूमि है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद ये सब प्रमाण आये हैं। किताब में जो कुछ भी लिखा गया है वह सब प्रमाणिक तौर पर लिखा गया है।

Article Categories:
News

Comments are closed.

Shares