PACK UP : सुप्रीम कोर्ट में 9 वर्ष से चल रही ‘राम की कसौटी’ का हुआ पटाक्षेप, अब निर्णय की प्रतीक्षा

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विश्लेषण : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 16 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। पिछले 40 दिन से सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहुचर्चित अयोध्या मामले की दैनिक सुनवाई बुधवार को खत्म हो गई। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट में 9 वर्ष से हो रही भगवान ‘राम की कसौटी’ का भी पटाक्षेप हो गया। अब भगवान राम इस परीक्षा में पास होते हैं या फेल ? पास होते हैं तो कितने अंक से ? यह आने वाले रिज़ल्ट से पता चलेगा। सुप्रीम कोर्ट का आनेवाला फैसला यह भी सुनिश्चित करेगा कि अयोध्या में भगवान राम जन्मे भी थे या नहीं ? यदि शीर्ष अदालत का फैसला राम जन्मभूमि मंदिर के पक्ष में आता है तो यह सिद्ध हो जाएगा कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में उसी स्थल पर हुआ था, जिस स्थल का विवाद कोर्ट के समक्ष आया था और यदि अदालत का फैसला मुस्लिम पक्ष के समर्थन में आया तो इसका अर्थ यह होगा कि अदालत ने विवादास्पद स्थल पर राम के जन्म को ही नकार दिया है। सर्वोच्च अदालत के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने अयोध्या में विवादित ज़मीन पर राम जन्मभूमि मंदिर और बाबरी मस्ज़िद मामले की दलीलें 6 अगस्त से प्रति दिन सुनने की शुरुआत की थी। बुधवार को 4 बजे दलीलों का सिलसिला समाप्त हो गया और सुनवाई पूर्ण घोषित कर दी गई।

सर्वोच्च अदालत ने अपना फैसला सुनाने से पहले दोनों पक्षों को मोल्डिंग ऑफ रिलीफ के तहत लिखित हलफनामा जमा कराने के लिये 3 दिन का समय दिया है। चूँकि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) रंजन गोगोई इसी साल 17 नवंबर को सेवा निवृत्त हो रहे हैं, इसलिये उनकी निवृत्ति से पहले 15 नवंबर तक इस विवादास्पद मामले का फैसला आने की उम्मीद की जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट में किस मामले की हुई सुनवाई ?

दरअसल 491 साल पुराने राम मंदिर और बाबरी मस्ज़िद विवाद की सुनवाई पहले फैजाबाद की निचली अदालत में हुई, फिर यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में गया। हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिस पर शीर्ष अदालत ने सुनवाई की है। दरअसल मुस्लिम पक्ष की दलील भारतीय कानून के ‘रेस ज्युडिकाटा’ सिद्धांत पर आधारित है। इसके अंतर्गत एक बार यदि किसी मामले का कोर्ट में निपटारा हो जाता है तो उसे बार-बार नहीं उठाया जा सकता। यह दलील मुस्लिम पक्ष इसलिये उठाता आ रहा है, क्योंकि फैजाबाद की स्थानीय निचली कोर्ट ने आंशिक रूप से मुस्लिम पक्ष के समर्थन में फैसला दिया था। वास्तव में 1885 में महंत रघुवर दास ने विवादित इमारत के बाहर राम चबूतरा पर एक छोटा-सा मंदिर बनाने की माँग की थी। उनका कहना था कि इससे राम के दर्शनों के लिये आने वाले लोगों को सुविधा होगी। फैजाबाद के जिला जज ने इस पर फैसला देते हुए मंदिर बनाने की इजाज़त देने से मना कर दिया था। हालाँकि जज ने माना था कि मस्ज़िद हिंदुओं के पवित्र स्थान पर बनी है, परंतु उन्होंने कहा था कि सैकड़ों साल बाद स्थिति में बदलाव नहीं किया जा सकता। मुस्लिम पक्ष की दलीलें फैजाबाद कोर्ट की इसी एक मात्र लाइन पर आधारित हैं। 1886 में फैजाबाद कोर्ट से आए फैसले को आधार बनाते हुए मुस्लिम पक्ष के वकील शेखर नाफड़े का कहना था कि अब 70 साल बाद दाखिल हुई याचिकाओं पर सुनवाई ही नहीं करनी चाहिये थी। जब मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में पहुँचा तो यहाँ भी मुस्लिम पक्ष ने यही दलील दी, जिसे वहाँ की तीन जजों की पीठ ने खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने माना था कि रघुवर दास ने याचिका व्यक्तिगत रूप से की थी। उनकी याचिका को पूरे हिंदू समाज की याचिका नहीं कहा जा सकता। इससे दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई बंद करने का तो सवाल ही नहीं उठता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अयोध्या की विवादित 2.77 एकड़ भूमि को भगवान राम की जन्मभूमि माना था और चूंकि वर्षों से मुस्लिम समाज भी यहाँ नमाज पढ़ता था। इसलिये 30 सितंबर 2010 को हाईकोर्ट ने इस ज़मीन को निर्मोही अखाड़ा, रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बाँटने का फैसला किया था। इसके बाद हाईकोर्ट के इस फैसले को दोनों ही पक्षों ने मानने से इनकार कर दिया था और दिसंबर 2010 में दोनों पक्षों से कुल 14 याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी। इन याचिकाओं पर मई-2011 में सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी और अयोध्या में यथास्थिति बनाये रखने का आदेश दिया था। 2011 से 2019 तक यह मामला सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग कारणों से लटका रहा और अंततः अदालत ने गत 6 अगस्त से अपनी-अपनी याचिकाओं के समर्थन में मजबूत प्रमाण और दलीलें पेश करने के लिये दैनिक सुनवाई शुरू की थी। सुप्रीम कोर्ट में भी मुस्लिम पक्ष की ओर से दलीलें ‘रेस ज्युडिकाटा’ सिद्धांत पर ही की गई हैं। जबकि हिंदू पक्ष के वकील के. परासरन ने इसके खिलाफ दलील दी कि सैकड़ों साल पहले ऐतिहासिक भूल की गई थी और मंदिर को ध्वस्त करके मस्ज़िद बनाकर भारत के इतिहास को दागदार किया गया था। इसलिये अदालत को चाहिये कि वह इस भूल को सुधार कर भारतीय इतिहास पर लगे दाग को मिटाए। राजीव धवन ने मस्ज़िद के पक्ष में बाबर के उस दस्तावेज का हवाला दिया जिसमें मस्ज़िद निर्माण के लिये लगान माफ किया गया था। इसके विरुद्ध हिंदू पक्ष के वकील विकास सिंह ने सुनवाई के अंतिम दिन पूर्व आईपीएस किशोर कुणाल की 2016 में प्रकाशित अयोध्या रिविज़िटेड पुस्तक अदालत में जमा करवाई और दलील दी कि पूर्व आईपीएस किशोर कुणाल ने 20 वर्ष तक अयोध्या मामले पर शोध किया है और ऐतिहासिक तथ्यों के साथ-साथ प्राचीन संस्कृत दस्तावेजों और पुरातात्विक अवशेषों को आधार बनाकर इस पुस्तक की रचना की है। इस पुस्तक में किशोर कुणाल ने दावा किया है कि अयोध्या में बनी बाबरी मस्जिद से बाबर का कोई लेना देना नहीं था और बाबरी मस्ज़िद 1660 में औरंगज़ेब के शासन काल में मंदिर को तोड़ कर बनाई गई थी। किशोर कुणाल ने पुस्तक में नक्शे के साथ प्रमाणिक रूप से सिद्ध किया है कि विवादित स्थल पर राम मंदिर का अस्तित्व था, जिसके प्रमाण भी उन्होंने इसी पुस्तक में दिये हैं। उन्होंने पुस्तक में से दिये गये ब्रिटेन की एक लाइब्रेरी में मौजूद 1810 के एक नक्शे की कॉपी भी अदालत के समक्ष पेश की, जिसे अदालत के सामने ही मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने फाड़ दिया। इससे सुनवाई के अंतिम दिन दोनों पक्षों के बीच काफी गहमागहमी भी हुई। सीजेआई गोगोई ने यहाँ तक कहा कि मुस्लिम पक्ष का व्यवहार अनुकूल नहीं है। यह अपने आप में बड़ा बयान है, जो मुस्लिम पक्ष के वकील की झुँझलाहट को दर्शाता है। नक्शे की कॉपी फाड़ने पर पूर्व आईपीएस किशोर कुणाल का भी बयान आया है। उन्होंने कहा कि धवन इंटेलेक्चुअल हैं। वे जानते हैं कि यदि नक्शा कोर्ट के सामने पेश होता तो उनका केस न के बराबर रह जाता। उन्होंने यह भी कहा कि धवन को दिक्कत थी तो उन्हें दिये गये समय के भीतर उस पर बात करनी चाहिये थी।

सुप्रीम फैसला तय करेगा कि अयोध्या में जन्मे थे राम या नहीं ?

अब जब अदालत में सुनवाई पूर्ण हो चुकी है, तो अब सबकी निगाहें अदालत की ओर से आने वाले फैसले पर टिकी हैं। अदालत में की गई दलीलों को लेकर विशेषज्ञों के बयान आने का सिलसिला शुरू हो चुका है। कुछ विशेषज्ञ दावा कर रहे हैं कि हिंदू पक्ष की ओर से मजबूत दलीलें की गई हैं तो कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि मुस्लिम पक्ष मजबूत स्थिति में है। ऐसे में अब फैसला आने तक दावों-प्रति दावों का यह दौर निरंतर जारी रहेगा। बहरहाल, अदालत में राम का पक्ष रखने वाले वकीलों की दलीलों पर आने वाला फैसला ही तय करेगा कि राम सुप्रीम कोर्ट में 9 साल से चल रही अपनी कसौटी पर खरे उतरे हैं या नहीं और अदालत का फैसला यह भी तय करेगा कि राम का जन्म अयोध्या में उसी जगह पर हुआ भी था या नहीं ?

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