‘इंटरनेट’बंदी कितना जायज ?

ban on internet

नई दिल्ली। एक तरफ इंटरनेट को मूलभूत अधिकार बनाने की कोशिश हो रही है। दूसरी तरफ बात-बात पर इंटरनेट बैन की खबर आम घटना बन चुकी है। इंटरनेट हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। आज देश में करीब 45 करोड़ लोगों तक इंटरनेट की पहुंच है। शायद यही वजह है कि इंटरनेट या सोशल मीडिया से अब सरकार और प्रशासन को डर लगने लगा है। क्योंकि इसके जरिए देश की एक तिहाई जनता की आवाज मुखर होने लगी है।

सोशल मीडिया के प्रभाव से डरने लगी है सरकारें

जब कभी इंटरनेट पर बैन लगाया जाता है तो सरकार और प्रशासन का  कहना होता है कि इस फैसले का मकसद अफवाहों को फैलने से रोकना है। हालात इतने बदल चुके हैं कि परीक्षाओं के दौरान भी इंटरनेट पर कुछ घंटे के लिए बैन लगा दिया जाता है। तर्क दिया जाता है कि नकल को रोकने के लिए ऐसा किया गया है। इसका मतलब साफ है कि हमारा सिस्टम उस लायक नहीं रह गया है कि परीक्षाओं के दौरान चोरी और लीक जैसी घटनाओं पर काबू पा सके। हालात जब इतने बदल चुके हैं तो इंटरनेट बैन से जुड़े कुछ अहम पहलुओं पर गौर करने का वक्त आ गया है।

क्या हवा और पानी पर भी लगने लगेगा बैन ?

आज जिन परिस्थितियों में इंटरनेट पर बैन लगाया जाता है वैसी परिस्थितियां पहले भी आती थीं। इसलिए इंटरनेट बैन एकमात्र तरीका नहीं है। हवा, पानी की तरह इंटरनेट जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। ऐसे में क्या हवा और पानी पर भी बैन लगाया जा सकता है ? हमारा बिजनेस बहुत हद तक इंटरनेट पर निर्भर है, ऐसे में एक दिन के बैन से हजारों करोड़ों का नुकसान होता है।इस नुकसान का जिम्मेदार कौन है ?

राजनीति में बेजा इस्तेमाल ठीक नहीं

बात अगर राजनीतिक दलों की करें तो सभी राजनीतिक दलों का सोशल मीडिया विंग चुनाव में अहम रोल प्ले करता है। सोशल मीडिया विंग का काम संगठित रूप से पार्टी के एजेंडे का प्रचार करना है। गलत चीजों को फैलाया जाता है, तथ्यों के साथ खिलवाड़ किया जाता है। जनभावनाएं भड़काई जाती हैं। कुल मिलाकर लोगों को बरगलाया जाता है और उन्हें वही सोचने के लिए मजबूर किया जाता है जो वे करवाना चाहते हैं।

‘आप’ का विस्तार इंटरनेट की देन है

इंटरनेट के जरिए राजनीति में कई तरह के बदलाव भी देखने को मिला है। आम आदमी पार्टी का उदय इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। तमाम न्यूज चैनल और न्यूज पेपर पार्टी के खिलाफ कवर कर रहे थे। इसके बावजूद सोशल मीडिया के जरिए पार्टी ने लोगों तक अपनी पहुंच बनाई, उनसे संवाद स्थापित किया और ऐतिहासिक जीत दर्ज की। Troll, जो अब साधारण घटना है उसके पीछे एक पूरा सिस्टम काम करता है और हम गलत को भी सही मानने लगते हैं। कोई राजनीतिक दल इससे अछूता नहीं है।

इंटरनेट पर बैन लोकतंत्र की भावना के खिलाफ

ऐसे में बात-बात पर इंटरनेट पर बैन की परंपरा ठीक नहीं है। इंटरनेट पर बैन लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। सरकार और प्रशासन को इस बारे में गंभीरता से सोचने की जरूरत है। इंटरनेट पर अगर गलत चीजें फैलाई जा सकती हैं तो सही चीजें भी फैलाई जा सकती हैं।  प्रशासन और सरकार को चाहिए कि बात-बात पर इंटरनेट पर बैन की आदत को बदले। इंटरनेट पर बैन लगाना पहला नहीं आखिरी फैसला होना चाहिए।

 

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