“लला फिर आइयो खेलन होरी”-श्री अनंत बिहारी गोस्वामी जी

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भयंकर सर्दी, ठिठुरन और गगन-मण्डलसे झर-झर बहते ओसके शीतल कणोंको अपने आँचलमें समेटे माघमास विदा हुआ। रंग-रँगीले फाल्गुनमासका आगमन हुआ। वनप्रदेशमें मयूर नृत्य करने लगे, कदम्ब वृक्ष की डालपर बैठी कोयलके कण्ठसे सुरीले गीत सुनायी देने लगे। यमुनाके तटपर मृगोंके झुण्ड कुलाँचे भरने लगे। शीतल मन्द सुगन्धित वायुके झकोरे मानव-मनको आनन्दित करने लगे। पुष्प-वाटिकाओंमें खिले रंग-बिरंगे और सुगन्धित पुष्पोंपर भ्रमरोंके समूह गुंजारकर अपना हर्ष व्यक्त करने लगे। चारों ओर हर्ष और उल्लासकी बयार बहने लगी। ऐसे मनमोहक वातावरणमें ब्रजप्रदेशमें होलीकी मादकता सबसे रंगीन महोत्सवके रूपमें चहुँ ओर छा जाती है। इस उत्सवका शुभारम्भ होता है, जब सम्पूर्ण प्रदेशमें कहीं त्रजबालाएँ, कहीं ग्वाल-बाल और कहीं गोप-ग्वाले नाचते-गाते होलीके संगीतमय वातावरणमें मादकता और मस्ती भर देते हैं।

इस समय सारे ब्रजवासी लोकमर्यादा, पारम्परिक रीति-रिवाजों तथा अपनी प्राचीन संस्कृतिको सँजोकर मस्तीभरे संसारमें विचरण करने लगते हैं। आनन्दरूपी अथाह सागरकी उत्ताल तरंगें जाति, धर्म और अमीरी-गरीबीके सारे बन्धन तोड़कर समाजको प्रेमके रंगोंसे सराबोरकर एकाकार कर देती हैं। कान्हाकी लीला-स्थली ब्रजमण्डलमें इस उत्सवका हर रंग निराला होता है। सन्त ऋतुके आगमनके साथ ही भगवान्‌ श्रीकृष्ण और उनकी आह्लादिनी शक्ति श्रीराधारानी दिव्य स्वरूप धारणकर आज भी ब्रजमें ग्वाल-बाल और सखियोंके संग होलीका आनन्द लूटने पधारते हैं। श्रीराधारानी जब होली खेलती हैं, सारा आकाश गुलालके रंगोंसे ढक जाता है और श्रीकृष्णकी पिचकारीसे छूटे केसरके रंगसे धरतीमाता अपना श्रृंगार करती हैं ॥ नन्द्ग्राम, बरसाना,गोकुल, महावन, गोवर्धन, फालैन, दाऊजी, मथुरा और वृन्दावन आदि ब्रजक्षेत्रमें श्रीराधारानीके संग होली खेलकर श्रीकृष्ण अपने भक्तोंको आनन्दित करते हैं।

बांके बिहारी मंदिर के मुख्य सेवायत अनंत बिहारी गोस्वामी जी ने श्रीकृष्ण और राधाजी की होली लीला का वर्णन बताया कि श्रीवृन्दावनमें होलिकोत्सव प्रारम्भ हो गया, अनेक प्रकारके वाचद्यवृन्द मुखरित हो उठे। नन्दग्रामसे श्रीकृष्ण अपनी स्वर्णकी पिचकारीमें केसर रंग भरकर तथा बरसानासे श्रीराधारानी अपनी झोलीमें अबीर-गुलाल भरकर वृन्दावनमें प्रवेश करते हैं। जैसे ही दोनोंका आमना-सामना होता है, कान्हाने अपनी पिचकारीके रंगसे श्रीराधारानीकों सराबोर कर दिया और प्रियाजीने अपने दोनों हाथोंसे गुलाल-अबीरकी उनके ऊपर वर्षाकर उन्हें लाल रंगसे रँग दिया। श्रीराधा-माधवकी इस दिव्य लीलाके दर्शनकर सारी सृष्टि भाव-विभोर हो उठी। इस पर्वपर ब्रजबालाएँ लोक-लाज त्यागकर अपने कान्हाके साथ होली खेलनेको आतुर हो उठती हैं। इस प्रकार श्रीराधारानी अपने मोहनके मुखकी ओर गुलाल फेंककर अतिशय आनन्दका अनुभव कर रही हैं।

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