मिहिर सेन : दलीलें छोड़ ‘दरिया’ में उतरे और सात समंदर पार करने वाले दुनिया के प्रथम तैराक बने

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आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 16 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। मनुष्य अगर चाहे तो, वह सब कुछ प्राप्त कर सकता है, जिसके बारे में वह सोचता है और इच्छा रखता है। शर्त बस इतनी-सी है कि उसके इरादे बुलंद हों और लक्ष्य निश्चित हो और उसे करने के लिए वह स्वयं को अधिकारी बना ले, जो वह करना चाहता है। ऐसे दृढ़ संकल्पवान व्यक्ति के आड़े न ग़रीबी आती है और न ही कोई अवरोध उसके मार्ग को रोक सकता है। एक प्रहर का खाना खाकर भी वह अपने लक्ष्य के भेद सकता है। आज हम आपको इस लेख में एक ऐसे ही फौलाद़ी संकल्प वाले व्यक्ति से परिचित कराने जा रहे हैं, जिसने अपनी इच्छाशक्ति से पूरी दुनिया का दिल जीत लिया। उसनेकुली बन कर लोगों का बोझ उठाया, परंतु उसे बोझ को अपने संकल्प पर हावी नहीं होने दिया। यह ऐसा व्यक्ति था, जिसने अपनी जीत का तिरंगा भारत से लेकर इंग्लैंड तक लहराया।

चलिए, आप अधिक रहस्य न बनाते हुए आपको बता देते हैं कि इस दृढ़ संकल्पवान व्यक्ति का नाम है मिहिर सेन। वैसे मिहिर सेन को स्मरण करने के पीछे विशेष कारण है, क्योंकि आज उनकी 89वीं जयंती है, परंतु मिहर सेन जिस उपलब्धि के लिए स्मरण किए जाते हैं, वह उपलब्धि उन्होंने 12 सितंबर, 1966 को प्राप्त की थी। यही वह तारीख़ थी, जब भारत के इस साहसी समुद्री शूरवीर ने सात समंदर पार करके इतिहास रचा था और ऐसा करने वाले मिहिर सेन दुनिया के पहले व्यक्ति बने थे। आज से ठीक 53 वर्ष पहले 12 सितंबर, 1966 को मिहिर सेन ने सात समंदर पार करने का वह कारनाम कर दिखाया था, जो उनसे पहले कोई नहीं कर सका था। इसके साथ ही मिहिर सेन भारत सहित पूरे विश्व के इतिहास में सात समंदर पार करने वाले प्रथम तैराक के रूप में अंकित हो गए।

निर्धन डॉक्टर पिता ने पुत्र को बनाया वक़ील

मिहिर सेन का जन्म 16 नंवबर 1930 को तत्कालीन अविभाजित बंगाल राज्य (अब पश्चिम बंगाल) पुरुलिया में डॉ. रमेश सेनगुप्ता और लीलाबति के घर हुआ था। माता-पिता ने अपने नवजात बालक का नाम मिहिर रखा, जिसका अर्थ होता है सूर्य, परंतु माता-पिता उस समय नहीं जानते थे कि मिहिर एक दिन अपने नाम के अर्थ को अर्थपूर्ण सिद्ध कर देश और दुनिया में भारत का नाम रौशन करेगा। मिहिर जब 8 वर्ष के थे, तब उनके माता-पिता अविभाजित बंगाल के (अब ओडिशा) के कटक चले गए और वहीं बस गए। मिहिर ने कटक में ही अपनी स्कूली पढ़ाई की। मिहिर बचपन से ही पढ़ाई में कुशल और एक विचारशील प्रवृति के व्यक्ति थे। उन्हें कोर्ट-कचहरी और अदालतों में विशेष रुचि थी। यही कारण है कि डॉक्टर होने के बावजूद पिता रमेश सेनगुप्ता ने पुत्र मिहिर की वक़ील बनने की इच्छा तुरंत स्वीकार कर ली। वैसे भी उस दौर में डॉक्टरी से इतनी आमदनी नहीं हो पाती थी कि रमेश सेनगुप्ता अपने परिवार को उच्च कोटि की जीवनशैली और अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सकें, परंतु इसके बावजूद रमेश सेनगुप्ता ने मिहिर का भुवनेश्‍वर के उत्कल विश्वविद्यालय में दाखिला करा दिया। मिहिर ने अपनी वकालत की पढ़ाई पूरी की। कानून की डिग्री लेने के बाद मिहिर कलकत्ता चले गए और कलकत्ता हाईकोर्ट में बैरिस्टर के पद पर कार्य करने लगे।

जब मिहिर को इंग्लैंड में कुली का काम करना पड़ा

समय बीतता गया, पर चिंतनशील मिहिर का मनोन्वेषण जारी रहा। इसीलिए उन्होंने इंग्लैड जाकर लिंकन इन बार (Bar of Lincoln’s Inn ) में काम करने का विचार किया। यह दौर था 1950-51 का। मिहिर इसके लिए स्वयं को तैयार करना चाहते थे, परंतु उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह इंग्लैंड जा सकें। इसी दौरान मिहिर का भाग्य जागा। उन्हें उनका गॉर्ड फादर मिल गया। उनका नाम था तत्कालीन राजनेता, एविएटर और बिज़नेसमैन बिजयनंदा पटनायक यानी बीजू पटनायक। वही बीजू पटनायक, जो स्वतंत्र भारत में ओडिशा के मुख्यमंत्री रहे और आज उनके पुत्र नवीन पटनायक मुख्यमंत्री हैं। बीजू पटनायक ने मिहिर को इंग्लैंड भेजने के लिए 10 पॉण्ड (ब्रिटिश मुद्रा ) और इंग्लैंड जाने वाले जहाज की तृतीय श्रेणी का टिकट उपलब्ध कराया। 1950 में मिहिर इंग्लैंड रवाना हुए, परंतु वहां पहुँचने के बाद भी इंग्लैंड में रहना और लिंकन इन बार में दाखिला लेना आसान नहीं था, क्योंकि इसके लिए बड़ी रकम की आवश्यकता थी। मिहिर ने इस समस्या से निपटने के लिए इंग्लैंड के रेलवे स्टेशन पर कुली का काम शुरू कर दिया और उस काम से जो पैसे आते, उससे मिहिर अपना जीवन यापान करते थे।

भारत सरकार ने पहचाना मिहिर का कौशल

मिहिर लगभग एक साल तक इंग्लैंड में कुली का काम करते रहे। इसी दौरान भारत सरकार ने मिहिर की प्रतिभा को पहचाना और इंग्लैंड में भारतीय उच्चायोग स्थित इंडिया हाउस (India House at the Indian High Commission) में मिहिर को नियुक्त किया गया। अब धन की समस्या काफी हद तक हल हो चुकी थी और 21 नवंबर, 1951 को मिहिर ने लॉ की पढ़ाई करने के लिए लिंकन इन (Lincoln’s Inn) में दाखिला ले लिया। सोसाइटी ऑफ लिंकन इन लंदन के चार सराय कोर्ट में से एक है। लिंकन इन को दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पेशेवर न्यायाधीशों और वकीलों में से एक माना जाता है। मिहिर सेन पूरे दिन इंडिया हाउस में काम करते और रात में घर पर पढ़ाई करते। मिहिर लिंकन इन में व्याख्यान में भाग नहीं ले पाते थे और अपनी लाइब्रेरी से उधार ली गई पुस्तकों से स्वयं ही अध्ययन करते थे। 9 फरवरी, 1954 को उन्हें लिंकन इन के बार में बुलाया गया। इसी दौरान अंतर्राष्ट्रीय यूथ हॉस्टल में एक नृत्य समारोह में मिहिर सेन की भेंट ब्रिटिश मूल की बेला वेइंगटन से हुई। दोनों में प्रेम हुआ, जो बाद में विवाह में परिवर्तित हो गया।

फ्लोरेंस ने बदल दिया मिहिर का फंडा

मिहिर के जीवन की गाड़ी वक़ालत की पटरी पर अच्छी तरह चल रही थी, परंतु इसी दौरान इंग्लैंड के एक समाचार पत्र में उन्होंने फ्लोरेंस चाडविक के बारे में एक लेख पढ़ा। फ्लोरेंस के बारे में पढ़ते ही मिहिर के जीवन में एक नया मोड़ आ गया। फ्लोरेंस चाडविक विश्व की पहली अमेरिकी महिला तैराक थीं, जिन्होंने 9 अगस्त 1950 को 31 वर्ष की आयु में 13 घंटे और 20 मिनट में फ्रांस से इंग्लैंड तक इंग्लिश चैनल को पार करने का कारनामा किया था। अमेरिकी तैराक गर्ट्रूड एडर द्वारा आयोजित इस प्रतियोगिता में फ्लोरेंस ने सभी पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए थे। इस लेख ने न सिर्फ मिहिर का सिर चकरा दिया, अपितु उन पर फ्लोरेंस चाडविक की तरह तैराकी में कुछ करने की धुन भी सवार कर दी। मिहिर ने अपने देश के लिए इस उपलब्धि को दोहराने का प्रण किया, परंतु उनके पास तैराकी का कोई अनुभव नहीं था। अतः उन्होंने फ्रीस्टाइल तकनीक में महारत हासिल करने के लिए इंग्लैंड के स्थानीय वायएमसीए (Young Men’s Christian Association ) में प्रेवेश लिया और तैराकी सीखी।

हर असफलता के बाद दुगुना हुआ हौसला

तैराकी सीखने के बाद मिहिर ने कई प्रयास किए, परंतु वह असफल रहे। 27 सितंबर, 1958 को 14 घंटे और 45 मिनट में इंग्लिश चैनल डोवर से कैलिस (Dover to Calais ) तैर कर पार कर दिखाया। इस उपलब्धि ने मिहिर को इंग्लिश चैनल पार करने वाला पहला भारतीय तैराक बन दिया। मिहार को इसके लिए 1959 में भारत लौटने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मिहिर ने फिर भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और अगला साहसिक कारनामा श्रीलंका के तलाईमन्नार से भारत के धनुष्कोटी तक तैराकी करके दिखाया। इस तैराकी की शुरूआत उन्होंने 6 अप्रैल, 1966 को को की और 25 घंटे 44 मिनट में पूरी की। यह पाल्क स्ट्रेट (Palk Strait) अनेक जहरीले साँपों तथा शार्क से भरी पड़ी थी। उनके इस साहसिक कार्य में भारतीय नौसेना ने भी सहयोग दिया। इसके बाद मिहिर सेन ने 24 अगस्त, 1966 को 8 घंटे 1 मिनट में ज़िब्राल्टर डार-ई-डेनियल को पार किया, जो स्पेन और मोरक्को के बीच है। ज़िब्राल्टर को तैर कर पार करने के साथ ही मिहिर ऐसा करने वाले एशिया के प्रथम तैराक बन गए।

अब सात समंदर थे मिहिर का लक्ष्य

वक़ालत छोड़ शानदार तैराक बन चुके मिहिर का अगला लक्ष्य सात समंदर थे। उन्होंने ठान लिया कि वह सात समंदर पार करेंगे। इसी बीच वह दिन भी आ गया, जो सात समंदर को तैर कर पार करने का सपना पूरा कराने वाला बना। सात समंदर पार करने की Palk Strait प्रतियोगित 1966 में भाग लेने के लिए मिहिर को 45 हजार रुपए की आवश्यकता थी, जो उन्हें भातीय नौसेना को भुगतान करने थे, परंतु मिहिर के संकल्प के आड़े धन की तंगी नहीं आई। मिहिर को कोलकाता दैनिक, द स्टेट्समैन सहित कुछ ऐसे प्रायोजक मिल गए, जिन्होंने आधी रकम मिहिर को उपलब्ध कराई, जबकि शेष आधी रकम तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मिहिर को दी।

और मिहिर ने रच दिया इतिहास

मिहिर सेन ने Palk Strait प्रतियोगिता में भाग लेते हुए 12 सितंबर, 1966 को 13 घंटे और 55 मिनट में 40 मील लंबी डारडानेल्स (गैलीपोली, यूरोप से सेडुलबिर, एशिया माइनर तक) पार कर इतिहास रच दिया। इस कारनामे के 9 दिन बाद यानी 21 सितंबर 1966 को 4 घंटे में बोस्फोरस (तुर्की) तैर कर पार करने वाले वह पहले भारतीय बन गए। मिहिर ने 29 अक्टूबर, 1966 को पनामा कैनाल को लम्बाई में तैरकर पार करना शुरू किया। लम्बाई में पार करने के कारण यह दूरी उन्होंने दो स्टेज में पार की। 29 अक्टूबर, 1966 को शुरू करके पनामा की तैराकी उन्होंने 31 अक्टूबर, 1966 को समाप्त की। पनामा कैनाल को पार करने के लिए उन्होंने 34 घंटे 15 मिनट तक तैराकी की। मिहिर सेन ने कुल मिलाकर 600 किलोमीटर की समुद्री तैराकी की। उन्होंने एक ही कलेण्डर वर्ष में 6 मील लम्बी दूरी की तैराकी करके नया कीर्तिमान स्थापित किया। पनामा तार कर पार करने वाले मिहिर पहले गैर-अमेरिकी और विश्व के तीसरे तैराकी बन गए। मिहिर सेन एक अतुलनीय तैराक थे, जिन्होंने अपनी हिम्मत और मेहनत के दम पर इतनी बड़ी तैराकी का जोखिम उठाया। वह एक्सप्लोरर्स क्लब ऑफ इंडिया के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने अपनी याददाश्त खो दी थी और कष्टपूर्ण जीवन व्यतीत किया। 11 जून, 1997 को मिहिर सेन का कोलकाता में 66 वर्ष की आयु में निधन हो गया। मिहिर को पद्मश्री से सम्मानित किया गया, पाँचों महाद्वीपों के सातों समुद्र तैर कर पार करने के लिए 1967 में मिहिर सेन को पद्‌मभूषण प्रदान किया गया।

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