आज इस विक्रम को भी कीजिए याद, जिसने माँ भारती के लिए विदेशी नौकरी को मार दी थी लात

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आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 9 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। दो दिन पहले यानी 7 सितंबर 2019 को चंद्रयान 2 का विक्रम लैंडर अंतरिक्ष की दुनिया में इतिहास रचने से बस 2 कदम पीछे रह गया था, तब से बस इसरो के वैज्ञानिकों से लेकर आम आदमी तक विक्रम लैंडर की ही चर्चा कर रहा है। इसरो की पूरी टीम चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर को ढूँढने में लगी है, सब की ज़ुबाँ पर एक ही नाम के चर्चे हैं विक्रम लैंडर। लोग दुआएँ कर रहे हैं कि कोई चमत्कार हो जाए और इसरो का विक्रम लैंडर से पुनः संपर्क स्थापित हो जाए। यद्यपि विक्रम की स्थिति का पता चल गया है, परंतु विक्रम से संपर्क साधने में इसरो को अभी तक सफलता नहीं मिली है। वैसे आशा की जा रही है कि इसरे जल्द विक्रम से संपर्क करने में कामयाब हो जाए।

चंद्रयान 2 के ऑर्बिटर से गत 2 सितंबर को अलग हुए और 7 सितंबर की रात लगभग 1.55 बजे इसरो से संपर्कविहीन हो चुके लैंडर विक्रम को लेकर चर्चाओं का दौर तो अभी आगे भी जारी रहेगा, परंतु आज यानी 9 सितंबर को एक ऐसे विक्रम को भी याद करने का दिन है, जिसने माँ भारती के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिए। वह कोई और नहीं, वह थे कैप्टन विक्रम बत्रा, जिन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध में न सिर्फ इतिहास रचा, अपितु सदा-सदा के लिए अमर हो गए। कारगिल युद्ध के दौरान ‘दिल मांगे मोर’ डायलॉग के लिए विख्यात हुए विक्रम बत्रा मात्र 24 वर्ष की कम आयु में ही कैप्टन विक्रम बत्रा 7 जुलाई, 1999 को हम सब से हमेशा के लिए अपना संपर्क तोड़ गए। आज हम शहीद विक्रम को इसलिए स्मरण कर रहे हैं, क्योंकि भारत के तिरंगे की शान पर जान देने वाले कैप्टन विक्रम बत्रा का आज 45वाँ जन्म दिवस है। आइए जानते हैं भारत के इस वीर सपूत की वीरगाथा के कुछ किस्से।

भारत माता के लिए ठुकराई विदेशी नौकरी

विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितंबर, 1974 को हिमालय की गोद में बसे हिमाचल प्रदेश के पालमपुर निवासी जी. एल. बत्रा और कमलकांता बत्रा के घर हुआ था। जी. एल. बत्रा और कमलकांता ने पहली दो संतानों के रूप में बेटियों को जन्म दिया था, जबकि विक्रम अपने जुड़वाँ भाई विशाल के साथ पैदा हुए थे। माता कमलकांता की श्रीरामचरितमानस में गहरी आस्था होने के कारण इन जुड़वाँ भाइयों के प्यारे से पुकारे जाने के लिए नाम लव और कुश रखे गए। इनमें लव का मूल नाम विक्रम, जबकि कुश का मूल नाम विशाल रखा गया। बचपन से सैन्य स्कूल में पढ़ने की वजह से विक्रम में अनुशासन कूट-कूट कर भरा हुआ था। इतना ही नहीं, पिता से देश प्रेम की कहानियाँ सुन कर विक्रम में देश प्रम की भावना प्रबल होने लगी। विक्रम बचपन से ही पढ़ाई ही नहीं, टेबल टेनिस खेल में भी आगे थे। इसके साथ ही विक्रम सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे।

26 जनवरी, 1994 का दिन बना जीवन का नया मोड़

विक्रम बत्रा स्कूली शिक्षा पूरी होने के बाद चंडीगढ़ चले गए और दयानंद एंग्लो वेदिक (DAV) कॉलेज से विज्ञान विषय से स्नातक की पढ़ाई करने लगे। इसी दौरान विक्रम राष्ट्रीय छात्र दल (NATIONAL CADET CORE) यानी NCC के सर्वश्रेष्ठ सैन्य छात्र चुने गए और उन्हें गणतंत्र दिवस की परेड में भाग लेने वाले एनसीसी दल में शामिल किया गया। 26 जनवरी, 1994 को विक्रम बत्रा ने दिल्ली में आयोजित गंणतंत्र दिवस की परेड में हिस्सा लिया। परेड के बाद से ही विक्रम ने सेना में ही अपना करियर बनाने का मन बना लिया। फिर विक्रम ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। वे सेना में शामिल होने के लिए संयुक्त रक्षा सेवा (CDS) परीक्षा की तैयारी में जुट गए। इस दौरान विक्रम के जीवन में व्यक्तिगत उज्ज्वल भविष्य बनाने का एक बहुत बड़ा अवसर भी आया, जिस पर उन्होंने माँ भारती की सेवा के अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए लात मार दी। दरअसल विक्रम जब सीडीसी परीक्षा की तैयारी कर रहे थे, तभी उन्हें विश्व प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित हांगकांग मर्चेंट नेवी में नौकरी करने का ऑफर मिला, परंतु विक्रम के मनोमस्तिष्क में तो सेना में शामिल होकर भारत भूमि की रक्षा करने की धुन सवार थी। विक्रम ने हांगकांग मर्चेंट नेवी की इस पेशकश को तनिक भी सोच-विचार किए बिना सिरे से ठुकरा दिया। विक्रम को एक अन्य देश की मर्चेंट नेवी में जाने की बजाए माँ भारती की सेवा का विकल्प चुना और जुलाई 1996 में भारतीय सैन्य अकादमी (IMA), देहरादून में भर्ती हो गए।

जब विक्रम को उतारा गया कारगिल युद्ध के मैदान में

विक्रम ने सेना में अपने करियर की शुरूआत 6 दिसंबर 1997 को जम्मू के सोपोर में सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के रूप में की। दिल में देश के लिए कुछ कर गुज़रने के जुनून के साथ सेवा शुरू करने वाले विक्रम के जीवन में 2 साल बाद ऐसा मौका भी आया, जब माँ भारती ने उन्हें पुकारा। दरअसल 3 मई, 1999 को कश्मीर के कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठिया सैनिकों को खदेड़ने के लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय आरंभ किया, जिसे हम कारगिल युद्ध के नाम से भी जानते हैं। लगभग एक महीने बाद 1 जून 1999 का दिन विक्रम के जीवन में माँ भारता के लिए कुछ कर दिखाने का अवसर लेकर आया। यही वह दिन था, जब विक्रम और उनके साथियों की एक टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया। कारगिल युद्ध के दौरान विक्रम ने जिस साहस और पराक्रम का परिचय दिया, वह पूरे देश ने देखा।

जब विक्रम ने कहा, ‘दिल मांगे मोर’

विक्रम ने भारत में घुसपैठ कर बनाई गई पाकिस्तानी चौकियों को एक के बाद एक धूल-धूसरित करना शुरू किया। हम्प और राकी चोटियों पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के बाद विक्रम को अपनी टुकड़ी का कैप्टन बना दिया गया। इसके बाद श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को पाकिस्तानी सेना से मुक्त कराने की जिम्मेदारी कैप्टन बत्रा की टुकड़ी को सौंपी गई। यह चोटी अत्यंत दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद विक्रम बत्रा ने अपने साथियों के साथ इस पर तिरंगा फहराने का अभियान छेड़ दिया। अदम्य साहस और वीरता का परिचय देते हुए विक्रम के नेतृत्व वाली टुकड़ी ने अंतत: 20 जून, 1999 को तड़के 3.30 बजे पर इस अत्यंत महत्वपूर्ण चोटी से पाकिस्तानियों को खदेड़ कर कब्ज़ा कर लिया। विक्रम के लगातार बढ़ते कदमों से घबराए पाकिस्तानी सेना ने उनका कोडनेम शेरशाह रखा। कैप्टन विक्रम बत्रा ने जब चोटी 5140 से रेडियो के जरिए अपना विजय उद्घोष ‘यह दिल मांगे मोर’ कहा, तो सेना ही नहीं, अपितु पूरे भारत का सीना गर्व से चौड़ा हो गया और विक्रम का यह डायलॉग कारगिल युद्ध का विजय घोष बन गया। चोटी 5140 में भारतीय झंडे के साथ विक्रम बत्रा और उनकी टीम की तसवीरें मीडिया में छा गईं। अब विक्रम व उनकी टुकड़ी का अगल लक्ष्य था चोटी 4875, जिसे फतह करने के लिए विक्रम और उनकी टुकड़ी आगे बढ़ने लगी। विक्रम के टुकड़ी में महत्वपूर्ण साथी लेफ्टिनेंट अनुज नैयर भी शामिल थे। दोनों ने कई पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतारते हुए चोटी 4875 पर भी जीत तिरंगा फहरा दिया।

जान लड़ा दी जानी दोस्त के लिए

दुश्मनों की ओर बढ़ते हुए कई ऐसे मौके आए, जब विक्रम और उनके साथी दुश्मनों के आक्रमण का शिकार हुए। इसी दौरान मिशन लगभग पूरा होने को था, तभी 7 जुलाई, 1999 को अचानक विक्रम की टुकड़ी के लेफ्टिनेंट नवीन पर दुश्मनों ने आक्रमण किया। इस हमले में नवीन के दोनों पैर बुरी तरह घायल हो गए। विक्रम घायल नवीन को बचाने के लिए उनकी ओर लपके। नवीन ने विक्रम से कहा भी कि वह भाग जाए, अन्यथा पाकिस्तानी हमले का शिकार हो जाएँगे, परंतु विक्रम ने नवीन को नहीं छोड़ा। वे घायल नवीन को सुरक्षित से ला ही रहे थे कि दुश्मन की एक गोली ने विक्रम के सीने को लहुलुहान कर दिया। घायल विक्रम अंतत: वीरगति को प्राप्त हुए।

युद्ध के मैदान में जाने से पहले क्या कहा था विक्रम ने ?

युद्ध के मैदान में जाने से पहले विक्रम ने कहा था, ‘या तो मैं लहराते तिरंगे के पीछे आऊँगा या तिरंगे में लिपटा हुआ आऊँगा, पर मैं आऊँगा जरूर।’ विक्रम युद्ध जीत कर आये, परंतु तिरंगे के पीछे नहीं, अपितु तिरंगे में लिपटे हुए आए। कारगिल युद्ध में अपने अदम्य साहस और पराक्रम के लिए कैप्टन विक्रम बत्रा को 15 अगस्त 1999 को भारत सरकार ने मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया। जनरल वी. पी. मलिक ने अपनी पुस्तक ‘कारगिल : फ्रॉम सरप्राइज़ टू विक्ट्री’ में भी कैप्टन बत्रा का जिक्र करते हुए लिखा है कि विक्रम ने हैंड-टू-हैंड फाइट करते हुए पाकिस्तान के चार सैनिकों को मार गिराया और प्वाइंट 5140 पर कब्जा किया। इसके बाद रेडियो पर विक्ट्री कोड बोला, ‘यह दिल मांगे मोर…।

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