‘शुद्ध सनातनी’ सर्वपल्ली राधाकृष्णन : भारतीय अध्यात्म-ज्ञान परम्परा के एक उत्तम संवाहक

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* भारत मना रहा 58वाँ शिक्षक दिवस

* दुनिया 5 अक्टूबर को मनाएगी अंतरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस

* दुनिया में शिक्षकों की मांग और अधिकार की लड़ाई

* भारत में शिक्षकों मान और सम्मान की उच्चादर्श परम्परा

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 5 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। पूरी दुनिया आज से ठीक एक महीने बाद यानी 5 अक्टूबर को 26वाँ विश्व शिक्षक दिवस मनाएगी, परंतु भारत में आज 5 सितंबर, 2019 को 58वाँ शिक्षक दिवस मनाया जा रहा है। शिक्षक दिवस मनाने के विषय में भारत दुनिया से ADVANCE है। जानते हैं क्यों ? क्या आप यह भी जानते हैं कि दुनिया के और भारत के शिक्षक दिवस में क्या अंतर है ? क्या आप यह जानते हैं कि किस तरह विश्व शिक्षक दिवस और राष्ट्रीय शिक्षक दिवस की मूल अवधारणा में भारतीय संस्कृति और गुरु-शिष्य परम्परा का हिमालय से ऊँचा अंतर है ?

हम आपको बताते हैं। भारत ने राष्ट्रीय शिक्षक दिवस मनाने का निर्णय 13 मई, 1962 को ही कर लिया था, जबकि विश्व शिक्षक दिवस मनाने का निर्णय 4 वर्ष बाद 5 अक्टूबर, 1966 को किया गया था और इसका आरंभ 28 साल बाद हुआ यानी पहला विश्व शिक्षक दिवस 5 अक्टूबर, 1994 को मनाया गया। विश्व शिक्षक दिवस और भारतीय शिक्षक दिवस में सबसे बड़ा अंतर यह है कि विश्व शिक्षक दिवस दुनिया भर के शिक्षक मनाते हैं, जबकि भारतीय शिक्षक दिवस विद्यार्थी मनाते हैं। विश्व शिक्षक दिवस मनाने का उद्देश्य शिक्षकों के अधिकार, उत्तरदायित्व, भर्ती, रोजगार, सीखने और सिखाने संबंधी अवधारणाओं पर आधारित है। इसका अर्थ यह हुआ कि विश्व शिक्षक दिवस मनाने का उद्देश्य शिक्षकों को उचित मान-सम्मान दिलाना है और यह दिवस उसी तर्ज पर शिक्षक मनाते हैं, जिस तरह मज़दूर दिवस को मज़दूर ही मनाते हैं। दूसरी तरफ भारत में मनाया जाने वाला शिक्षक दिवस शिक्षक नहीं मनाते। भारत में विद्यार्थी अपने शिक्षक का दिवस मनाते हैं। विद्यार्थी शिक्षक दिवस पर अपने निर्माता यानी शिक्षक को मान-सम्मान देते हैं, उनकी पूजा करते हैं, उनके आदर्शों को याद करते हैं और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। यही बुनियादी फर्क़ है विश्व शिक्षक दिवस और भारतीय शिक्षक दिवस में।

भारत में ऐसे हुआ शिक्षक दिवस का सूत्रपात

भारत में शिक्षक दिवस भारतीय संस्कृति के संवाहक, विख्यात शिक्षाविद्, महान दार्शनिक और एक आस्थावन सनातन धर्म हिन्दू विचारक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में मनाया जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में अपने महान कार्यों के लिए भारत सरकार ने राधाकृष्णन को 1954 में ही अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से अलंकृत कर दिया था। आज राधाकृष्णन की 131वीं जयंती है। 5 सितंबर, 1888 को तत्कालीन मद्रास (अब तमिलनाडु) के तिरुट्टनी गाँव में हुआ था, जो आज एक शहर बन चुका है और तिरुथनी मुरुगन मंदिर के लिए विख्यात है। तत्कालीन मद्रास से 64 किलोमीटर दूर स्थित तिरुट्टनी में ब्राह्मण परिवार में जन्मे राधाकृष्णन ने 8 वर्ष गाँव में ही बिताए। पिता सर्वपल्ली वीरास्वामी और माता सीताम्मा के पुत्र राधाकृष्णन ने 1896-1900 के मध्य तिरुपति स्थित क्रिश्यिन मिशनरी संस्थान लुथर्न मिशन स्कूल में अध्य किया। 1900 से 1904 के बीच उनकी शिक्षा वेल्लूर में हुई। बाद की शिक्षा उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में प्राप्त की। 12 वर्षों के अध्ययनकाल में राधाकृष्णन को बाइबिल के महत्वपूर्ण अंश याद हो गए। इसी दौरान उन्होंने वीर सावरकर और स्वामी विवेकानंद का भी अध्ययन किया। राधाकृष्णन को सनातन धर्म हिन्दू दर्शन शास्त्र की शिक्षा अपने पिता सर्वपल्ली वीरास्वामी से विरासत में मिली थी। इसीलिए ईसाई मिशनरी स्कूल में शिक्षा लेने के बावजूद उनका झुकाव भारतीय दर्शन शास्त्र यानी अध्यात्म की ओर अधिक था। उन्होंने दर्शन शास्त्र में एमए किया और 1916 में मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में दर्शन शास्त्र के सहाक प्राध्यापक नियुक्त हुए, फिर प्राध्यापक बने। राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से पूरे विश्व को भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित कराया, जो मानव को मुक्ति, मोक्ष और जीवन मुक्त दशा प्रदान करता है। उनके इन्हीं गुणों के फलस्वरूप डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के द्वितीय राष्ट्रपति बने। 13 मई, 1962 को जब राधाकृष्णन ने भारत के राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण की, उसी वर्ष से भारत सरकार ने उनके जन्म दिवस यानी 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों के मन में अपने निर्माता-मार्गदर्शक शिक्षक के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना था और यही कारण है कि पिछले 58 वर्षों से भारत में शिक्षक दिवस पर हर विद्यार्थी अपने शिक्षक को अवश्य याद करता है, कोई उनसे मिल कर उन्हें सम्मानित करता है, तो कोई अपने आदर्श शिक्षक का आख्यान करता है।

दुनिया की लड़ाई अधिकारों की, भारत में आदर्शों की पूजा

अब बात करते हैं विश्व शिक्षक दिवस की। इसका सूत्रपात 5 अक्टूबर, 1966 को फ्रांस की राजधानी पेरिस में आयोजित अंतरसरकारी सम्मेलन में हुआ था। इस सम्मेलन में टीचिंग इन फ्रीम संधि पर हस्ताक्षर किए गए। इसी बात से आप अनुमान लगा सकते हैं कि विश्व शिक्षक दिवस का उद्देश्य शिक्षकों की स्वायत्तता, अधिकारों और समस्याओं को लेकर संघर्ष करने का है। टीचिंग इन फ्रीडम यानी स्वतंत्रता के बीच शिक्षा संधि में शिक्षकों के अधिकार एवं जिम्मेदारी, भर्ती, रोजगार, सीखने और सिखाने के माहौल से संबंधित सिफारिशें की गई थीं। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक व सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) ने 5 अक्टूबर, 1994 से विश्व शिक्षक दिवस मनाने की घोषणा की।

वैसे दुनिया के अलग-अलग देशों में शिक्षक दिवस अलग-अलग दिनों पर मनाया जाता है, परंतु हम यहाँ विश्व शिक्षक दिवस और भारतीय शिक्षक दिवस के मूलभूत अंतर को समझाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसमें विश्व में जहाँ शिक्षक अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए विश्व शिक्षक दिवस मनाता है, वहीं भारत में विद्यार्थी अपने आदर्श शिक्षक को सम्मानित करने के लिए शिक्षक दिवस मनाते हैं।

क्या है सर्वपल्ली का महत्व ?

13 मई, 1962 को राष्ट्रपति बने डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन 13 मई, 1967 यानी पाँच वर्ष तक इस पद पर रहे। इससे पूर्व वे 13 मई, 1952 से 12 मई, 1962 तक भारत के उप राष्ट्रपति रहे। मूलत: इनका नाम राधाकृष्णन है, परंतु उनके नाम के आगे सर्वपल्ली के होने के पीछे एक विशेष कारण और महत्व है। वास्तव में राधाकृष्णन के पूर्वज आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले के सर्वपल्ली गाँव में रहते थे। 18वीं शताब्दी में उन्होंने तिरुट्टनी गाँव में निष्क्रमण किया, परंतु वे चाहते थे कि उनके नाम के साथ उनके जन्मस्थल के गाँव का बोध भी सदैव रहना चाहिए। इसीलिए राधाकृष्णन के पूर्वजों ने सर्वपल्ली गाँव छोड़ने के बाद अपने नाम से पहले सर्वपल्ली शब्द धारण किए रखा। यही कारण है कि राधाकृष्णन के पिता का नाम सर्वपल्ली वीरास्वामी था, तो राधाकृष्णन के नाम के आगे भी सर्वपल्ली लगाने की परंपरा जारी रही।

अज्ञान को दूर करने वाला ही सच्चा ज्ञान

भारतीय दर्शन शास्त्र यानी अध्यात्म में मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य स्वयं को जानना होता है, जिसे हम स्वयं का साक्षात्कार, ईश्वर से एकाकार, जीते-जी मोक्ष, मुक्ति और जीवनमुक्त दशा आदि भी कहते हैं। भारतीय फिलोसॉफी का गूढ़ अध्ययन कर चुके राधाकृष्णन यह भली-भाँति जान-समझ चुके थे कि जीवन बहुत ही अल्पकालिक है और इसमें व्याप्त खुशियाँ भी अनिश्चित हैं। मृत्यु अटल सत्य है, जो हर सम्पन्न-विपन्न को अपना ग्रास बनाती है। किसी प्रकार का भेद नहीं करती है। सच्चा ज्ञान वही है, जो आपके अंदर के अज्ञान को समाप्त करता है। सादगीपूर्ण सन्तोषवृत्ति का जीवन अमीरों के अहंकारी जीवन से बेहतर है, जिनमें असन्तोष का निवास है। एक शान्त मस्तिष्क बेहतर है, तालियों की उन गड़गड़ाहटों से; जो संसदों एवं दरबारों में सुनायी देती हैं। वस्तुत: इसी कारण डॉ॰ राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के नैतिक मूल्यों को समझ पाने में सफल रहे, क्योंकि वे मिशनरियों द्वारा की गई आलोचनाओं के सत्य को स्वयं परखना चाहते थे। इसीलिए कहा गया है कि आलोचनाएँ परिशुद्धि का कार्य करती हैं। सभी माताएँ अपने बच्चों में उच्च संस्कार देखना चाहती हैं। इसी कारण वे बच्चों को ईश्वर पर विश्वास रखने, पाप से दूर रहने एवं मुसीबत में फँसे लोगों की मदद करने का पाठ पढ़ाती हैं। डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने यह भी जाना कि भारतीय संस्कृति में सभी धर्मों का आदर करना सिखाया गया है और सभी धर्मों के लिये समता का भाव भी हिन्दू संस्कृति की विशिष्ट पहचान है। इस प्रकार उन्होंने भारतीय संस्कृति की विशिष्ट पहचान को समझा और उसके काफ़ी नज़दीक हो गये। डॉ॰ राधाकृष्णन समूचे विश्व को एक विद्यालय मानते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है। अत: विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबन्धन करना चाहिए। ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में दिये अपने भाषण में डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था- “मानव को एक होना चाहिए। मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति तभी सम्भव है जब देशों की नीतियों का आधार पूरे विश्व में शान्ति की स्थापना का प्रयत्न हो।” डॉ॰ राधाकृष्णन अपनी बुद्धि से परिपूर्ण व्याख्याओं, आनन्ददायी अभिव्यक्तियों और हल्की गुदगुदाने वाली कहानियों से छात्रों को मन्त्रमुग्ध कर देते थे। उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारने की प्रेरणा वह अपने छात्रों को भी देते थे। वह जिस भी विषय को पढ़ाते थे, पहले स्वयं उसका गहन अध्ययन करते थे। दर्शन जैसे गम्भीर विषय को भी वह अपनी शैली से सरल, रोचक और प्रिय बना देते थे।

भारत की सनातन संस्कृति के संवाहक

1909 में 21 वर्ष की उम्र में डॉ॰ राधाकृष्णन ने मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज में कनिष्ठ व्याख्याता के तौर पर दर्शन शास्त्र पढ़ाना प्रारम्भ किया। यह उनका परम सौभाग्य था कि उनको अपनी प्रकृति के अनुकूल आजीविका प्राप्त हुई थी। यहाँ उन्होंने 7 वर्ष तक न केवल अध्यापन कार्य किया अपितु स्वयं भी भारतीय दर्शन और भारतीय धर्म का गहराई से अध्ययन किया। उन दिनों व्याख्याता के लिये यह आवश्यक था कि अध्यापन हेतु वह शिक्षण का प्रशिक्षण भी प्राप्त करे। इसी कारण 1910 में राधाकृष्णन ने शिक्षण का प्रशिक्षण मद्रास में लेना आरम्भ कर दिया। इस समय इनका वेतन मात्र 37 रुपये था। दर्शन शास्त्र विभाग के तत्कालीन प्रोफ़ेसर राधाकृष्णन के दर्शन शास्त्रीय ज्ञान से काफ़ी अभिभूत हुए। उन्होंने उन्हें दर्शन शास्त्र की कक्षाओं से अनुपस्थित रहने की अनुमति प्रदान कर दी। लेकिन इसके बदले में यह शर्त रखी कि वह उनके स्थान पर दर्शनशास्त्र की कक्षाओं में पढ़ा दें। तब राधाकृष्ण ने अपने कक्षा साथियों को तेरह ऐसे प्रभावशाली व्याख्यान दिये, जिनसे वे शिक्षार्थी भी चकित रह गये। इसका कारण यह था कि उनकी विषय पर गहरी पकड़ थी, दर्शन शास्त्र के सम्बन्ध में दृष्टिकोण स्पष्ट था और व्याख्यान देते समय उन्होंने उपयुक्त शब्दों का चयन भी किया था। 1912 में डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की “मनोविज्ञान के आवश्यक तत्व” शीर्षक से एक लघु पुस्तिका भी प्रकाशित हुई जो कक्षा में दिये गये उनके व्याख्यानों का संग्रह था। इस पुस्तिका के द्वारा उनकी यह योग्यता प्रमाणित हुई कि “प्रत्येक पद की व्याख्या करने के लिये उनके पास शब्दों का अतुल भण्डार तो है ही, उनकी स्मरण शक्ति भी अत्यन्त विलक्षण है।”

1928 में पहली बार नेहरू से मिले राधाकृष्णन

जब डॉ॰ राधाकृष्णन यूरोप एवं अमेरिका प्रवास से पुनः भारत लौटे तो यहाँ के विभिन्न विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियाँ प्रदान कर उनकी विद्वत्ता का सम्मान किया। 1928 की शीत ऋतु में इनकी प्रथम मुलाक़ात पण्डित जवाहर लाल नेहरू से उस समय हुई, जब वह कांग्रेस पार्टी के वार्षिक अधिवेशन में सम्मिलित होने के लिये कलकत्ता आए हुए थे। यद्यपि सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय शैक्षिक सेवा के सदस्य होने के कारण किसी भी राजनीतिक संभाषण में हिस्सेदारी नहीं कर सकते थे, तथापि उन्होंने इस वर्जना की कोई परवाह नहीं की और भाषण दिया। 1929 में इन्हें व्याख्यान देने हेतु ‘मानचेस्टर विश्वविद्यालय’ द्वारा आमन्त्रित किया गया। इन्होंने मानचेस्टर एवं लन्दन में कई व्याख्यान दिये। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन सन् 1931 से 1936 तक आन्ध्र विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर रहे, ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय में 1936 से 1952 तक प्राध्यापक रहे, कलकत्ता विश्वविद्यालय के अन्तर्गत आने वाले जॉर्ज पंचम कॉलेज के प्रोफेसर के रूप में 1937 से 1941 तक कार्य किया, सन् 1939 से 48 तक काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय के चांसलर रहे, 1953 से 1962 तक दिल्ली विश्‍वविद्यालय के चांसलर रहे औक
1946 में युनेस्को में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

जब मध्य रात्रि में 12 बजे समाप्त किया संबोधन

सर्वपल्ली राधाकृष्णन की यह प्रतिभा थी कि स्वतंत्रता के बाद इन्हें संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया। वे 1947 से 1949 तक इसके सदस्य रहे। इसी समय वे कई विश्वविद्यालयों के चेयरमैन भी नियुक्त किये गये। अखिल भारतीय कांग्रेसजन यह चाहते थे कि सर्वपल्ली राधाकृष्णन अराजनीतिक व्यक्ति होते हुए भी संविधान सभा के सदस्य बनाये जायें। जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि राधाकृष्णन के संभाषण एवं वक्तृत्व प्रतिभा का उपयोग 14 – 15 अगस्त 1947 की रात्रि को उस समय किया जाये, जब संविधान सभा का ऐतिहासिक सत्र आयोजित हो। राधाकृष्णन को यह निर्देश दिया गया कि वे अपना सम्बोधन रात्रि के ठीक 12 बजे समाप्त करें, क्योंकि उसके पश्चात ही नेहरू के नेतृत्व में संवैधानिक संसद द्वारा शपथ ली जानी थी। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ऐसा ही किया और ठीक रात्रि 12 बजे अपने सम्बोधन को विराम दिया। पण्डित नेहरू और राधाकृष्णन के अलावा किसी अन्य को इसकी जानकारी नहीं थी। आज़ादी के बाद उनसे आग्रह किया गया कि वह मातृभूमि की सेवा के लिये विशिष्ट राजदूत के रूप में सोवियत संघ के साथ राजनयिक कार्यों की पूर्ति करें। इस प्रकार विजयलक्ष्मी पंडित का इन्हें नया उत्तराधिकारी चुना गया। पण्डित नेहरू के इस चयन पर कई व्यक्तियों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि एक दर्शनशास्त्री को राजनयिक सेवाओं के लिए क्यों चुना गया? उन्हें यह सन्देह था कि डॉक्टर राधाकृष्णन की योग्यताएँ सौंपी गई ज़िम्मेदारी के अनुकूल नहीं हैं। लेकिन बाद में सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने यह साबित कर दिया कि मॉस्को में नियुक्त भारतीय राजनयिकों में वे सबसे बेहतर थे। वे एक गैर परम्परावादी राजनयिक थे। जो मन्त्रणाएँ देर रात्रि होती थीं, वे उनमें रात्रि 10 बजे तक ही भाग लेते थे, क्योंकि उसके बाद उनके शयन का समय हो जाता था। जब राधाकृष्णन एक शिक्षक थे, तब भी वे नियमों के दायरों में नहीं बँधे थे। कक्षा में यह 20 मिनट देरी से आते थे और दस मिनट पूर्व ही चले जाते थे। इनका कहना था कि कक्षा में इन्हें जो व्याख्यान देना होता था, वह 20 मिनट के पर्याप्त समय में सम्पन्न हो जाता था। इसके उपरान्त भी यह विद्यार्थियों के प्रिय एवं आदरणीय शिक्षक बने रहे।

जब नेहरू ने राधाकृष्णन का चयन कर कांग्रेसियों को चौंकाया

1952 में सोवियत संघ से आने के बाद डॉक्टर राधाकृष्णन उप राष्ट्रपति निर्वाचित किये गये। संविधान के अंतर्गत उप राष्ट्रपति का नया पद सृजित किया गया था। नेहरू जी ने इस पद हेतु राधाकृष्णन का चयन करके पुनः लोगों को चौंका दिया। उन्हें आश्चर्य था कि इस पद के लिए कांग्रेस पार्टी के किसी राजनीतिज्ञ का चुनाव क्यों नहीं किया गया ? उप राष्ट्रपति के रूप में राधाकृष्णन ने राज्यसभा में अध्यक्ष का पदभार भी सम्भाला। सन 1952 में वे भारत के उप राष्ट्रपति बनाये गये। बाद में पण्डित नेहरू का यह चयन भी सार्थक सिद्ध हुआ, क्योंकि उपराष्ट्रपति के रूप में एक अराजनीतिज्ञ व्यक्ति ने सभी राजनीतिज्ञों को प्रभावित किया। संसद के सभी सदस्यों ने उन्हें उनके कार्य व्यवहार के लिये अत्यंत सराहा। इनकी सदाशयता, दृढ़ता और विनोदी स्वभाव को लोग आज भी याद करते हैं।

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