जानिए ऐसे ‘चिदंबरम’ को, जो माँ भारती के लिए ‘कोल्हू का बैल’ तक बन गए थे…

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* ओ. वी. चिदंबरम पिल्लै की 148वीं जयंती पर विशेष

अहमदाबाद 5 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। देश में इन दिनों पी. चिदंबरम का नाम बहुत चर्चा में है। वह चिदंबरम, जो कभी इस देश के गृह मंत्री और वित्त मंत्री रहे, आज जेल जाने से बचने के लिए कोर्ट-कचहरी के धक्के खा रहे हैं। कांग्रेस के दिग्गज नेता चिदंबरम 16 दिन पहले अचानक उस समय चर्चा में आ गए, जब 20 अगस्त 2019 को दिल्ली उच्च न्यायालय (HC) ने उन्हें अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। फिर क्या था, चिदंबरम अचानक लुप्त हो गए। चिदंबरम ने ऐसा आचरण किया, जिसकी सार्वजनिक जीवन में रहने वाले किसी छोटे-से व्यक्ति से भी तुलना नहीं की जा सकती। केन्द्र की सरकार में बड़े पदों पर काम कर चुके चिदंबरम ने कानून से आँख-मिचौली का जो खेल शुरू किया, वह लगभग 31 घण्टों तक चला। चिदंबरम की इस हरकत को पूरे देश ने देखा और उसकी घोर निंदा भी की कि यदि बड़े नेता ही कानून से भागने लगेंगे, तो आम आदमी में क्या संदेश जाएगा ? 20 अगस्त से लेकर आज तक चिदंबरम पहले जमानत के लिए गिड़गिड़ाते रहे और अब तिहाड़ जेल में जाने से बचने के लिए कानूनी दाव-पेच आज़मा रहे हैं। चिदंबरम के वकील कपिल सिब्बल तो अग्रिम ज़मानत लेने के लिए चिदंबरम की बढ़ती उम्र का हवाला देते हुए न्यायालय में गिड़गिड़ाने से भी नहीं चूके।

ख़ैर, आज हम कांग्रेस और उसके नेताओं द्वारा हीरो के रूप में पेश किए जा रहे भ्रष्टाचार के आरोपी पलानियप्पन चिदंबरम यानी पी. चिदंबरम की चर्चा नहीं करने जा रहे। वास्तव में चिदंबरम शब्द का अर्थ शिव का मुख और उदार होता है, परंतु पी. चिदंबरम में ऐसे कोई गुण दिखाई नहीं दिए हैं। हम तो आपको आज उस चिदंबरम के बारे में बताने जा रहे हैं, जो महान स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका नाम है वल्लिनयगन ओलगनाथन चिदम्बरम पिल्लै यानी वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै (V. O. Chidambaram Pillai), जिनकी आज 148वीं जयंती है। इन्हें VOC के नाम से भी जाना जाता है। ये वही पिल्लै थे, जिन्होंने ब्रिटिश दासता के बीच भारतीय जलयान उद्योग को सम्मानजनक स्थान दिलाया। पिल्लै तमिलनाडु के एक राजनेता और स्वतंत्रता संग्राम के वह सिपाही थे, जो माँ भारती के लिए कोल्हू तक में बैल की तरह जोते गए। वी. ओ. चिदम्बरम पिल्लै का जन्म 5 सितंबर, 1872 को तमिलनाडु राज्य के तूत्तुकुडी जिला में स्थित ओट्टपिडारम में वकील उलगनातन और परमाई अम्माल के घर हुआ था। व्यवसाय से वकील पिल्लै ने न सिर्फ अपने नाम में शामिल चिदंबरम शब्द सार्थक किया, अपितु माँ भारती की स्वतंत्रता के लिए अँग्रेजों से भी भिड़ गए।

पिल्लै का प्रण, ‘…अन्यथा समुद्र में डूब मरूँगा’

वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै ने तिरुचिरापल्ली में 1894 में कानून की पढ़ाई की। यह वह दौर था, जब भारत में स्वामी विवेकानंद और उनकी सनातन क्रांति का बोलबाला था। पिल्लै की मुलाकात इसी दौरान स्वामी विवेकानंद के आश्रम से जुड़े संत रामकृष्णांतर से हुई। रामकृष्णांतर से ही पिल्लै को स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने की प्रेरणा दी। इसी बीच 1890 में अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन और स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ, जिसका नेतृत्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता बालगंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय कर रहे थे। देश के लिए कुछ कर गुज़रने की ठान चुके पिल्लै तिलक के सम्पर्क में आए और 1892 में उनके शिष्य बन गए। दूसरी तरफ ब्रिटिश सरकार ने पिल्लै को मद्रास प्रेसिडेंसी का मुख्य प्रवक्ता नियुक्त किया, परंतु पिल्लै स्वतंत्रता और स्वदेशी आंदोलन में कूद चुक थे। इसीलिए उन्होंने स्वदेशी प्रचार सभा, धर्म संघ नेसवु सालै, नेशनल गोडौन, मद्रास एग्रो इन्ड्स्ट्रियल लिमिटेड और देशाभिमान संगम जैसी संस्थाओं का निर्माण किया। अक्टूबर-1906 में उन्होंने स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कम्पनी का पंजीकरण कराया। उस समय कंपनी की पूंजी 10 लाख रुपये थी। कंपनी के शेयरों की संख्या 40 हज़ार और प्रत्येक शेयर का मूल्य 25 रुपए था। कंपनी के शेयर कोई भी एशिया निवासी ख़रीद सकता था। प्रारंभ में कंपनी के पास अपना कोई पानी का जहाज (जलयान) नहीं था। पिल्लै ने एक सायलॉन स्टीमर कम्पनी से किराए पर जहाज लिए, परंतु ब्रिटिश शासक पिल्लै के जलान उद्योग में बढ़ते कदम से घबरा गए। इसीलिए ब्रिटिश इंडिया स्टीम नेविगेशन कम्पनी (BISNC) ने सायलॉन स्टीमर कम्पनी पर दबाव डाल कर पिल्लै के साथ पट्टा रद्द करवा दिया। पट्टा रद्द होने के बाद पिल्लै ने अपना जलयान ख़रीदने का निर्णय किया। जलयान ख़रीदने के लिए पिल्लै इस प्रण के साथ भारत भ्रमण को निकल पड़े, ‘मैं जहाज के साथ ही लौटूँगा, अन्यथा समुद्र में डूब मरूंगा’ और पिल्लै ने अपने प्रण को सत्य सिद्ध कर दिखाया, जब वे SS GALLIA नामक जलयान के साथ लौटे। उन्होंने यह एसएस जलयान फ्रांस से ख़रीदा था। बीआईएसएनसी अब पिल्लै को ख़रीदने का जुगाड़ करने लगी, परंतु पिल्लै किसी भी तरह के प्रलोभन में नहीं आए। ब्रिटिश व्यापारियों और राजशाही सत्ता के विरोध के बावजूद पिल्लै का स्वदेशी जलयान एसएस नियमित रूप से तूत्तुक्कुडी और श्रीलंका के बीच चलता रहा। इसी दौरान पिल्लै ने तूत्तुक्कुडि में कोरल मिल में मजदूरों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ मोर्चा खोला। पिल्लै 23 फरवरी 1908 को कोरल मिल पहुँचे और कम वेतन और मजदूरों के साथ सख्त काम की शर्त हटाने को लेकर तीख़ा और ज्वलंत भाषणा दिया। पिल्लै के इस जोशीले भाषण ने अत्याचार सह रहे श्रमिकों को झकझोर दिया। पिल्लै के के नेतृत्व में मिल में 9 दिनों तक हड़ताल चली। अंततः मिल मैनेजर ने वेतन बढाने, काम के घंटों को कम करने और रविवार की छ्ट्टी देने की श्रमिकों की मांग स्वीकार कर ली।

4 वर्षों के कारावास में 40 वर्षों जैसी यातनाएँ झेलीं

पिल्लै की व्यावसायिक के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियाँ बढ़ती देख अँग्रेज तितमिला उठे। 190 में बंगाल के विभाजन के विरुद्ध क्रांति चल रही थी। इसी दौरान क्रांतिकारी बिपिन्चंद्र पाल को गिरफ्तार किया गया था। पाल की रिहाई के लिए क्रांतिकारियों ने आंदोलन छेड़ रखा था, जिसके आगे झुक कर अंग्रेज सरकार ने पाल को रिहा कर दिया था। पाल की रिहाई का उत्सव मनाने के लिए आयोजित कार्यक्रम में पिल्लै भी पहुँचे और उन्होंने ऐसा दमदार भाषण दिया, जिसे सुन कर अँग्रेज अधिकारी पिल्लै को बातचीत के बहाने बुलाया और चेतावनी दी कि वे मौन हो जाएँ। पिल्लै ने उनकी चेतावनी को नज़रअंदाज़ कर दिया, जिसके चलते 12 मार्च, 1908 को पिल्लै और उनके सहपाठी सुब्रमण्य सिवा को गिरफ़्तार कर लिया गया। उन पर भारतीय दण्ड संहिता (IPC) की धारा 123ए और 153ए के अंतर्गत ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ बोलने और सिवा को संरक्षण देने का मुकदमा दर्ज हुआ। पिल्लै को देशद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास (40 वर्ष) की सजा सुनाई गई। हाई कोर्ट में अपील के बाद पिल्लै की सजा कम होकर 4 वर्ष गई और उन्हें कोयम्बटूर सेंट्रल जेल भेज दिया गया। 9 जुलाई, 1908 से 1 दिसम्बर, 1910 तक पिल्लै इसी जेल में रहे और 1 दिसम्बर, 1910 से 24 दिसम्बर, 1912 तक वे कन्नूर जेल में रहे। जेल में इन 4 वर्षों के दौरान पिल्लै को कठोर यातनाएँ दी गईं। यहाँ तक कि पिल्लै का स्वास्थ्य भी बुरी तरह लड़खड़ा गया। इतिहासकार और तमिल विद्वान आर. ए. पद्मनाभन ने लिखा है, ‘कारावास के दौरान पिल्लै को कोल्हू में बैल की जगह जोता गया। पिल्लै कड़ी धूप में कोल्हू खींच कर तेल निकालते थे। सजा पूरी होने के बाद 24 दिसम्बर 1912 को वे रिहा कर दिे गए। सन् 1932 में पिल्लै तूत्तुक्कुडी चले गए और शेष जीवन लेखन और तमिल पुस्तक प्रकाशन बिताया। वीओसी, कप्पलोट्टिय तमिलन और सेक्किलुत्त सेम्मल के नाम से विख्यात पिल्लै को स्तंत्रता के बाद कई तरह के सम्मानों से सम्मानित किया गया। उनके नाम से डाक टिकट जारी किए गए, जगह-जगह प्रतिमाओं का निर्माण कराया गया। वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै पर सन् 1961 में श्री. बी. आर. पन्तलू ने ‘कप्पलोट्टिय तमिलन’ नाम से फिल्म भी बनाई गई। पिल्लै का 18 नवम्बर, 1936 को तूतुकुडी में निधन हो गया।

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