पीड़ाजनक प्रश्न : भारत का ‘भगत’, फिर भी क्यों नहीं मिला ‘शहीद’ का दर्जा ?

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* स्वतंत्र भारत में कांग्रेस सरकारों ने क्रांतिकारियों की घोर अवहेलना की ?

* मोदी सरकार धारा 18 में संशोधन कर देगी ‘सम्मानजनक’ न्याय ?

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 28 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। पूरा देश और एक ऐसे व्यक्ति को नमन कर रहा है, जिसकी पहचान उसके नाम से नहीं, अपितु ‘शहीद’ शब्द से होती है। जब हम हमारे चित्त और मुख से ‘शहीद’ का उद्गार करते हैं, अगले दो शब्द अपने आप ही ‘भगत सिंह’ के रूप में जुड़ जाते हैं। भारत का हर व्यक्ति कभी भी इस नाम को केवल भगत सिंह संधु कह कर नहीं संबोधित करता। यह नाम शहीद भगत सिंह के रूप में ही हमारे मुख से निकलता है। 23 मार्च, 1931 से अर्थात् पिछले 88 वर्षों से भारत के इस महान सपूत ने अपने वास्तविक नाम भगत सिंह संधु को शहीद भगत सिंह के रूप में परिवर्तित कर दिया।

पूरा देश आज शहीद भगत सिंह का स्मरण कर उन्हें नमन कर रहा है। उनके माँ भारती के लिए दिए गए बलिदान का स्मरण कर रहा है। हर भारतीय को इस बात का गर्व है कि भारत की भूमि पर एक ऐसे वीर सपूत ने जन्म लिया, जिसने मात्र 24 वर्ष की आयु में भारत की स्वतंत्रता के लिए चल रहे यज्ञ में अपने प्राणों की आहूति हँसते-हँसते दे दी। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार शहीद भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 बताया जाता है और इसीलिए आज उनकी 112वीं पुण्यतिथि पर हम भी शहीद भगत सिंह के जीवन से लेकर बलिदान तक के जुड़े कुछ ऐसे अनछुए पहलुओं के बारे में आपको बताने जा रहे हैं, जिनसे कदाचित आप अवगत नहीं होंगे।

क्यों दादी ने कहा, ‘भागों वाला बच्चा जन्मा है…’ ?

सबसे पहले मिलवाते हैं आपको शहीद भगत सिंह के उस पूरे परिवार से, जिसका हर सदस्य अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध क्रांतिकारी था। भगत सिंह को यह क्रांति विरासत में मिली थी। सामान्यत: भले ही भगत सिंह का जन्म दिवस 28 सितंबर, 1907 को माना जाता है, परंतु वास्तविकता यह है कि भगत सिंह संधु का जन्म पंजाब में लायलपुर जिले की जड़ाँवाला तहसील स्थित बंगा गाँव में एक जाट (सिख) परिवार में हुआ था। भगत सिंह का यह जन्म स्थल अब पाकिस्तान के पंजाब में है। उनके पिता का नाम किशन सिंह संधु और माता का नाम विद्यावती कौर था। वास्तव में भगत सिंह जिस दिन जन्मे, वह दिन था विक्रम संवत् 1964 आश्विन शुक्ल त्रयोदशी शनिवार अर्थात् 19 अक्टूबर, 1907 प्रात: 9.00 बजे। इधर भगत सिंह ने माता विद्यावती की कोख से जन्म लिया, उधर एक साथ तीन-तीन शुभ समाचार मिले। पहला समाचार यह कि भगत सिंह के काका अजीत सिंह को रिहा कर दिया गया है और वे भारत आ रहे हैं। दूसरा समाचार मिला कि पिता किशन सिंह नेपाल से लाहौर पहुँच गए हैं। तीसरी सुखद् घटना यह घटी कि काका सुवर्ण सिंह जेल से छूट कर घर पहुँच चुक थे। भगत सिंह के पिता किशन सिंह सहित कुल तीन भाई थे। भगत सिंह के जन्म के समय जब दादी जय कौर ने भगत सिंह का मुख देखा और उन्हें अपने तीन-तीन बेटों के अंग्रेजों की क़ैद से छूटने का सुखद् समाचार मिला, तो दादी जय कौर के मुँह से सहसा ही नवजात भगत सिंह के लिए यह उद्गार निकल पड़े, ‘बच्चा भागों वाला (भाग्यवान) पैदा हुआ है।’ बस, इसी भागों वाला या भाग्यवान शब्द के कारण इस नवजात शिशु का नाम भगत सिंह रखा गया।

देशभक्ति के रंग में रंगा हुआ था पूरा परिवार

भगत सिंह के सीने में देशभक्ति की चिनगारी बाहर से नहीं प्रविष्ट हुई थी, अपितु वे इस चिनगारी के साथ ही जन्मे थे, क्योंकि उनका पूरा परिवार देशभक्ति के रंग में रंगा हुआ था। उनके दादा सरदार अर्जुन देव अंग्रेजों के कट्टर विरोधी थे। अर्जुन देव के तीन पुत्र थे सरदार किशन सिंह (भगत सिंह के पिता), सरदार अजीत सिंह और सरदार स्वर्ण सिंह। ये तीनों भी देश भक्ति की भावना से ओतप्रोत थे। भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह ने 1905 के बंग-भंग के विरोध में लाला लाजपत राय के साथ मिल कर पंजाब में जन विरोध आंदोलन का संचालन किया। 1907 में, 1818 के तीसरे रेग्युलेशन एक्ट के विरोध में तीव्र प्रतिक्रियाएँ हुई। जिसे दबाने के लिये अंग्रेजी सरकार ने कड़े कदम उठाये और लाला लाजपत राय और इनके चाचा अजीत सिंह को जेल में डाल दिया गया। अजीत सिंह को बिना मुकदमा चलाये रंगून जेल में भेज दिया गया, जिसके प्रतिक्रिया स्वरुप सरदार किशन सिंह और सरदार स्वर्ण सिंह ने जनता के बीच में अंग्रेजों के विरुद्ध भाषण दिये, तो अंग्रेजों ने इन दोनों को भी जेल में डाल दिया। भगत सिंह के दादा, पिता और चाचा ही नहीं, इनकी दादी जय कौर भी बहुत बहादुर महिला थीं। वे सूफी संत अम्बा प्रसाद, जो उस समय के भारत के अग्रणी राष्ट्रवादियों में से एक थे, की बहुत बड़ी समर्थक थीं। एक बार जब सूफी संत अम्बा प्रसाद जी सरदार अर्जुन सिंह के घर पर रुके थे, उसी दौरान पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने के लिये आ गयी, किंतु भगत सिंह की दादी जय कौर ने बड़ी चतुराई से उन्हें बचा लिया। यदि भगत सिंह के बारे में गहनता से अध्ययन करें तो ये बात अत्यंत स्पष्ट है कि भगत सिंह पर उस समय की तत्कालिक परिस्थितियों और अपने पारिवारिक परिप्रेक्ष्य का गहरा प्रभाव था और ये बात और भी बड़ी है कि भगत सिंह इन सबसे कई कदम आगे निकले।

जलियाँवाला नरसंहार व लाला की हत्या ने झकझोरा

भगत सिंह को 13 अप्रैल, 1919 को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने बुरी तरह झकझोर दिया था। उस समय उनकी आयु मात्र 12 वर्ष थी। दु:ख और पीड़ा से व्याकुल बालक भगत 12 मील चल कर उस जलियाँवाला बाग पहुँचा, जहाँ हजारों निर्दोष लोगों का सामूहिक नरसंहार किया गया था। इसी के बाद भगत सिंह ने क्रांति का बिगुल फूँका था। इसके बाद वे रुके नहीं। उन्होंने क्रांतिकारियों के साथ मिल कर सबसे पहले लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लिया। साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिए हुए अहिंसक प्रदर्शनों के दौरान 30 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में अंग्रेजी पुलिस के लाठीचार्ज से लाला लाजपत राय बुरी तरह घायल हो गए थे और 17 नवम्बर, 1928 को उनकी मृत्यु हो गई थी। इसका ज़िम्मेदार था सहायक पुलिस अधीक्षक (ASP) जॉन सांडर्स (John Saunders)। भगत सिंह ने चंद्रशेखर आज़ाद व अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिल कर लाला लाजपत राय की हत्या का प्रतिशोध लेने के लिए योजना बनाई। योजना के अनुसार 17 दिसंबर, 1928 को तड़के 4.15 बजे जैसे ही सांडर्स लाहौर कोतवाली पहुँचा, राजगुरु ने एक गोली सीधे उसके सिर में मारी। सांडर्स ज़मीन पर ढेर हो गया, पर साँसें चल रही थीं। फिर भगत सिंह ने 3-4 गोलियाँ और दागीं और सांडर्स को मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद भगत सिंह क्रांति की रणभेरी बजाते हुए अंग्रेजी शासकों के विरुद्ध एक के बाद एक विद्रोह करते रहे, जिनमें दिल्ली की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की योजना शामिल है। भगत सिंह का इरादा केवल बम फेंक कर अंग्रेजी हुक़ूमत की चूलें हिलाना था। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और उनके साथियों ने केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंका। बम फटने के बाद भगत सिंह ने ‘इनक़लाब ज़िंदाबाद-साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’ के नारे लगाए और साथ लाए पर्चे हवा में उछाल दिए। भगत सिंह के पास वहाँ से भाग जाने का अवसर था, परंतु उन्होंने सीना चौड़ा कर ग़िरफ्तारी दी। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु तीनों को ग़िरफ्तार कर लिया गया और अंतत: 23 मार्च, 1931 को तीनों को फाँसी दे दी गई। फाँसी के फंदे की ओर बढ़ते हुए भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को गीत गुनगुना रहे थे, उसकी पंक्तियाँ हैं, ‘मेरा रँग दे बसंती चोला, मेरा रँग दे। मेरा रँग दे बसंती चोला। माय रँग दे बसंती चोला।’

पीड़ाजनक प्रश्न : ‘मोदी है, तो यह भी मुमकिन है ?’

आपको जान कर आश्चर्य होगा कि जिस भगत सिंह का नाम ‘शहीद’ शब्द लगाए बिना अधूरा है, उस भगत सिंह को स्वतंत्र भारत में आज तक शहीद का दर्जा नहीं दिया गया है !!! कारण वही है संविधान का अनुच्छेद 18, जो महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित करने से रोकता है। इस अनुच्छेद 18 के अंतर्गत सेना सेवाओं से जुड़ी उपाधियों के अतिरिक्त सभी प्रकार की उपाधियों का उन्मूलन किया गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि केवल सेना में शामिल लोग ही देश के लिए बलिदान देने पर शहीद कहलाएँगे। यही कारण है कि भारत सरकार ने न तो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्राणों का बलिदान देने वाले हजारों सेनानियों को शहीद का दर्जा दिया और न ही अर्धसैनिक बलों या पुलिस के जवानों को ही यह दर्जा दिया जाता है। नि:संदेह अनुच्छेद 18 भारत के सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, परंतु इसकी अतर्कसंगतता के कारण भगत सिंह, जिनका नाम शहीद लगाए बिना अधूरा है, को आज तक भारत सरकार की ओर से अधिकृत रूप से शहीद का दर्जा नहीं दिया गया। यद्यपि समय-समय पर इसकी मांग उठती रही है और यह आरोप भी लगते रहे हैं कि स्वतंत्रता के बाद सत्तारूढ़ होने वाली कांग्रेस सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले और गांधीजी के अहिंसक आंदोलन के विपरीत हिंसक क्रांति करने वाले भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस सहित कई क्रांतिकारियों की पूरी तरह अवहेलना की। नवम्बर-2018 में केन्द्रीय सूचना आयोग (CIC) ने भी केन्द्र सरकार से सिफारिश की थी कि भगत सिंह को शहीद का दर्जा देने को लेकर वह अपनी स्थिति स्पष्ट करे। तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु ने सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत प्राप्त एक आवेदन पर केन्द्र सरकार से यह सिफारिश की थी, परंतु केन्द्र सरकार और पंजाब सरकार दोनों ने अनुच्छेद 18 का हवाला देकर हाथ ऊँचे कर लिए, वहीं पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय (HC) भी भगत सिंह को शहीद का दर्जा देने की याचिका अनुच्छेद 18 का हवाला देकर ही ठुकरा चुका है। ऐसे में सुई घूम कर फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार पर आ जाती है। YUVAPRESS.COM फिर वही प्रश्न दोहरा रहा है कि जो मोदी सरकार जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने जैसा असंभव लगने वाला कार्य करने का साहस कर सकती है, वह क्या अनुच्छेद 18 में संशोधन करने का साहस दिखाएगी, जिससे महात्मा गांधी ही नहीं, अपितु देश के लिए स्वतंत्रता से पूर्व बलिदान देने वाले हजारों शहीदों को और स्वतंत्रता के बाद बलिदान देने वाले अर्धसैनिक बलों व पुलिस के जवानों को शहीद का दर्जा मिल सके ?

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