जेपी : एक ऐसे महानायक, जिनकी दहाड़ से ध्वस्त हो गया था ‘दुर्गा’ का दुर्ग !

Written by

अहमदाबाद 11 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। 11 जनवरी, 1966 को तत्कालीन सोवियत संघ (USSR) यानी रूस में उज़्बेकिस्तान के ताश्कंद से जब यह ख़बर आई कि भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का निधन हो गया, तो राजधानी दिल्ली सहित पूरा देश स्तब्ध रह गया। जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद तत्कालीन कांग्रेस में शास्त्री ही सबसे बड़े नेता थे, परंतु उनके असामयिक निधन ने कांग्रेस और देश में अचानक नेतृत्व शून्यता खड़ी कर दी। आपात स्थिति से रास्ता निकालते हुए कांग्रेस ने शास्त्री की जगह गुलज़ारी लाल नंदा को कार्यवाहक प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया, परंतु देश और कांग्रेस की नज़रें और आशाएँ तो ‘गूंगी गुड़िया’ पर टिक गई थीं।

जी हाँ। पिता नेहरू के साथ निरंतर साये की तरह रहने वालीं इंदिरा गांधी एक समय अपनी कम बोलने की आदत के कारण ‘गूंगी गुड़िया’ के रूप में जानी जाती थीं, परंतु जब कांग्रेस ने 24 जनवरी, 1966 को इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में देश के सिंहासन पर बैठाया, तो इसी गूंगी गुड़िया ने दुर्गा का अवतार धर लिया और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में न केवल पाकिस्तान को धूल चटा दी, अपितु उसके दो टुकड़े भी कर दिए। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में रूस को छोड़ पूरी दुनिया पाकिस्तान के साथ थी। इसके बावजूद इंदिरा के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को आत्म-समर्पण करने के लिए विवश कर दिया। इसी के चलते इंदिरा गांधी तत्कालीन भारतीय राजनीति में आयरन लैडी (लौह महिला) के रूप में उभरीं। उनकी लोकप्रियता चरम पर पहुँच गई। यहाँ तक कि लोग उन्हें साक्षात् दुर्गा का अवतार तक बताने लगे। इंदिरा के नेतृत्व में पूरे देश में कांग्रेस छा गई और इंदिरा गांधी लगभग अपराजेय बन गईं। यह इंदिरा के करिश्माई नेतृत्व का ही कमाल था कि कांग्रेस ने उनके नेतृत्व में लोकसभा चुनाव 1967 और 1971 में भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की। 1966 में भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने वालीं इंदिरा गांधी 1977 तक यानी 11 वर्षों तक इस पद पर रहीं।

दरकने लगा ‘दुर्गा’ का दुर्ग और जेपी ने की ‘संपूर्ण क्रांति’

इंदिरा गांधी ने एक लंबे समय तक भारत की सत्ता संभाली। इस दौरान उन्होंने गरीबी उन्मूलन सहित कई क्षेत्रों में काम किया, परंतु दीर्घावधि शासन के साइड इफेक्ट्स भी दिखाई देने लगे और धीरे-धीरे उनके कार्यकाल के दौरान देश में अनेक भ्रष्टाचार और घोटाले पनपने लगे। इंदिरा गांधी एक मज़बूती के साथ देश को नेतृत्व दे रही थीं, परंतु जनता में धीरे-धीरे सत्ता विरोधी लहरें उठने लगी थीं। यद्यपि कांग्रेस में इंदिरा के विरुद्ध ख़ुलेआम आवाज़ उठाने का किसी नेता में साहस नहीं किया था, परंतु एक व्यक्ति ने यह साहस किया और उनका नाम था जयप्रकाश नारायण यानी जेपी। जयप्रकाश ने समाज में फैली ग़रीबी, परिवारवादी राजनीति, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी को लेकर इंदिरा सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। जयप्रकाश ने यह तय कर लिया था कि इंदिरा की सत्ता को जड़ से उखाड़ फेंकना है और इसी काम को सफल बनाने के लिए उन्होंने पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान से ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का बिगुल बचा दिया। गांधी मैदान में उपस्थित लाखों लोगों ने उनके एक आवाह्न पर जात-पात, तिलक, दहेज और सभी धर्मों के भेद-भाव भुला दिए। इतना ही नहीं, लोगों ने अपने जनेऊ तोड़ एक साथ इस आन्दोलन का समर्थन किया। चारों दिशाओं में बस एक ही नारा ‘जात-पात तोड़ दो, तिलक-दहेज छोड़ दो। समाज के प्रवाह को नयी दिशा में मोड़ दो’ गूंज उठा। बिहार से उठी ‘सम्पूर्ण क्रांति’ की चिनगारी देश के कोने-कोने में आग बन कर भड़क उठी। जय प्रकाश नारायण की एक हुंकार पर नौजवानों का जत्था सड़कों पर निकल पड़ा और “सम्पूर्ण क्रांति” की लपटों से केन्द्र में इंदिरा की सत्ता झुलसने लगी। जयप्रकाश का कहना था कि “सम्पूर्ण क्रांति” कोई एक अकेली क्रांति नहीं है, अपितु ये 7 क्रांतियाँ राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक क्रांति से मिल कर बनी है। हम जयप्रकाश नारायण को इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज उनकी 117वीं जयंती है।

मार्क्सवाद से प्रभावित थे जेपी

जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर, 1902 को बिहार में छपरा के सिताब दियारा स्थित सारण में हुआ था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पटना में ही की। स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही छोटी उम्र में वे स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में कूद पड़े थे। उसी समय बिहार विद्यापीठ भारत की स्वतंत्रता के लिए काम कर रही थी, जिसे प्रतिभाशाली युवाओं को प्रेरित करने के लिए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और सुप्रसिद्ध गांधीवादी डॉ. अनुग्रह नारायण सिन्हा ने स्थापित किया था। बिहार विद्यापीठ के कार्यों से प्रभावित होकर जयप्रकाश इस संस्थान से जुड़ गए और भारत स्वतंत्रता संग्राम के काम करने लगे। 1920 में उनका विवाह बिहार के प्रसिद्ध गांधीवादी बृज किशोर प्रसाद की पुत्री प्रभावती के साथ हुआ, परंतु गांधीवाद से प्रभावित प्रभावती कस्तूरबा गांधी के आश्रम में ही रहती थी। विवाह के 2 वर्ष बाद 1922 में जयप्रकाश उच्च शिक्षा लेने के लिए अमेरिका चले गए। जहाँ उन्होंने 1922-1929 के मध्य कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय बरकली और विसकांसन विश्वविद्यालय में समाज-शास्त्र का अध्ययन किया। महँगी पढ़ाई के खर्चों को वहन करने के लिए उन्होंने खेतों, कम्पनियों और रेस्टोरेंट में भी काम किया। अनततः सभी कठिनाईयों को पार करने के बाद उन्होंने एस.ए की उपाधि प्राप्त की। समाज शास्त्र के अध्ययन के दौरान वे मार्क्स के समाजवाद से काफी प्रभावित हुए और मार्क्सवाद में पीएचडी करने की ठानी, परंतु उसी दौरान उनकी माता की सेहत बिगड़ गई और वे भारत वापस लौट आए।

स्वतंत्रता आंदोलन में जेपी की महत्वपूर्ण भूमिका

1929 में जब वे अमेरिका से लौटे, तो भारतीय में स्वतंत्रता संग्राम चरम पर था। उसी दौरान उनकी भेंट जवाहर लाल नेहरू से हुई और वे नेहरू के साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कार्य में पुनः जुट गए। 1932 में जब महात्मा गांधी, नेहरू और अन्य महत्त्वपूर्ण कांग्रेसी नेता जेल चले गए, तब उन्होंने भारत में अलग-अलग स्थानों पर स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया। सितम्बर 1932 में मद्रास से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और नासिक के जेल में भेज दिया गया। वहाँ उनकी भेंट मीनू मसानी, अच्युत पटवर्धन, एन. सी. गोरे, अशोक मेहता, एम. एच. दाँतवाला, चार्ल्स मास्कारेन्हास और सी. के. नारायण स्वामी जैसे उत्साही कांग्रेसी नेताओं से हुई। जेल में रहकर उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सी. एस. पी.) का गठन किया, जो संपूर्ण रूप से एक समाजवादी पार्टी थी। 1939 में विश्व युद्ध के दौरान जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध लोक आन्दोलन का नेृतत्व किया। इस आंदोलन में सफल नेतृत्व देने के बाद जयप्रकाश नारायण अब लोकनायक जयप्रकाश नारायण बन चुके थे। अंग्रेज़ों तक इस्पात (स्टील) न पहुँचे, इसलिए उन्होंने टाटा स्टील कम्पनी में हड़ताल करा दी, इसके लिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 9 महीने की कैद की सज़ा सुनाई गई। उन्हें बन्दी बनाकर मुम्बई की आर्थर जेल और दिल्ली की कैम्प जेल में रखा गया। 1942 में जब गांधी जी ने मुंबई से भारत छोडो आंदोलन की घोषणा की तब इसकी सूचना मिलते ही वे आर्थर जेल से भाग निकले। उन्होंने नेपाल जाकर आज़ाद दस्ते का गठन किया और उसे प्रशिक्षण दिया। सितम्बर 1943 में एक बार फिर उन्हें पंजाब की एक चलती ट्रेन में गिरफ्तार कर लिया गया। 16 महीने बाद यानी जनवरी 1945 में उन्हें आगरा जेल में स्थान्तरित कर दिया गया। इसके उपरान्त गांधीजी ने यह स्पष्ट कर दिया था कि डॉ. लोहिया और जयप्रकाश की रिहाई के बिना अंग्रेज सरकार से कोई समझौता नहीं किया जाएगा, जिसके परिणामस्वरूप दोनों को अप्रैल-1946 में मुक्त कर दिया गया।

कांग्रेस के साथ आरंभ किया राजनीतिक जीवन

जयप्रकाश नारायण ने 1948 में कांग्रेस के समाजवादी दल का नेतृत्व किया और बाद में गांधीवादी दल के साथ मिलकर समाजवादी सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) की स्थापना की। 19 अप्रैल, 1954 को उन्होंने बिहार में विनोबा भावे के सर्वोदय आन्दोलन के लिए अपना जीवन समर्पित करने की घोषणा की। 1957 में उन्होंने लोकनीति के पक्ष में राजनीति छोड़ दी, परंतु उसके बाद भी उनका मन सदैव देश के कल्याण में लगा रहा और 1960 में वे राजनीति में पुनः सक्रिय हो गए। उस समय देश में इंदिरा गाँदी देश की सत्ता चला रही थीं, परंतु जयप्रकाश को इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियाँ रास नहीं आ रही थीं। उन्होंने इसका विरुद्ध करना शुरू कर दिया। वे अब 72 वर्ष के हो चुके थे। बढ़ती उम्र के साथ उनका स्वस्थ्य भी बिगड़ने लगा। गिरते स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने बिहार में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन किया और 1974 में किसानों के बिहार आन्दोलन में उन्होंने तत्कालीन राज्य सरकार से इस्तीफे की मांग की। सरकार लगातार उनके माँगो और उनके आन्दोलन की अनदेखी करती रही जो बाद में उसे सत्ता खो कर चुकाना पड़ा। जयप्रकाश ने इंदिरा की सरकार को सत्ता से बाहर करने की निर्णय लिया और इसके चलते उन्होंने एक विशाल सभा का आयोजन किया।

‘संपूर्ण क्रांति’ से डोला इंदिरा का सिंहासन

5 जून, 1974 को इस सभा में जयप्रकाश ने पहली बार ‘सम्पूर्ण क्रांति’ के दो शब्दों का उच्चारण किया। क्रांति कोई नया शब्द नहीं था, परंतु ‘सम्पूर्ण क्रांति’ नया था। सांयकाल पटना के गांधी मैदान पर जयप्रकाश नारायण ने बेहद भावातिरेक में लगभग पांच लाख लोगों आह्वान किया। ये आन्दोलन देश की गिरती हालत, प्रशासनिक भ्रष्टचार, महँगाई, बेरोजगारी, अनुपयोगी शिक्षा पद्धति को जड़ से मिटाने के लिए शुरू किया गया था। सभा के संबोधित करते हुए जयप्रकाश ने कहा ‘यह क्रांति है मित्रों! और सम्पूर्ण क्रांति है। विधान सभा का विघटन मात्र इसका उद्देश्य नहीं है। यह तो महज मील का पत्थर है। हमारी मंजिल तो बहुत दूर है और हमें अभी बहुत दूर तक जाना है। भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रांति लाना, आदि ऐसी चीजें हैं जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकतीं, क्योंकि वे इस व्यवस्था की ही उपज हैं। वे तभी पूरी हो सकती हैं जब सम्पूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए ‘सम्पूर्ण क्रांति’ आवश्यक है। इस व्यवस्था ने जो संकट पैदा किया है वह सम्पूर्ण और बहुमुखी (टोटल ऐण्ड मल्टीडाइमेंशनल) है, इसलिए इसका समाधान सम्पूर्ण और बहुमुखी ही होगा। व्यक्ति का अपना जीवन बदले, समाज की रचना बदले, राज्य की व्यवस्था बदले, तब कहीं बदलाव पूरा होगा। उनके नेतृत्व में जन मोर्चा ने गुजरात राज्य का चुनाव जीता। एक तरफ जेपी के नेतृत्व में पूरे देश में कांग्रेस व इंदिरा के विरुद्ध जनाक्रोश भड़क रहा था, उसी दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लोकसभा चुनाव 1971 में रायबरेली लोकसभा सीट से इंदिरा गांधी की जीत को अवैध घोषित कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले को बरकरार रखा, जिसके चलते अब इंदिरा के पास कुर्सी छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, परंतु इंदिरा ने 25 जून, 1975 को भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी। इसके साथ ही आंतरिक सुरक्षा क़ानून (मीसा) के तहत जयप्रकाश सहित अनेक विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। यद्यपि जयप्रकाश नारायण को 7 महीने बाद मुक्त कर दिया गया, परंतु 2 वर्षों तक जेपी के प्रयासों से एकजुट हुए विपक्ष ने लोकसभा चुनाव 1977 में अपराजेय मानी जाने वालीं इंदिरा गांधी को चुनाव में हरा दिया।

और लोकनायक ने कह दिया अलविदा

जयप्रकाश नारायण का निधन 8 अक्टूबर, 1979 को उनके निवास स्थान पटना में हृदय की बीमारी और मधुमेह के कारण हो गया। उनके सम्मान में तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने 7 दिन के लिए राष्ट्रीय शोक की घोषणा की। उनके सम्मान में हजारों लोग उनकी शोक यात्रा में शामिल हुए। 1998 में उन्हें मरणोपरान्त भारत रत्न से सम्मनित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें समाजसेवा के लिए 1965 में मैगससे पुरस्कार प्रदान किया गया था। रमन मैगसेसे पुरस्कार एशिया के व्यक्तियों एवं संस्थाओं को उनके अपने क्षेत्र में विशेष रूप से उल्लेखनीय कार्य करने के लिये प्रदान किया जाता है। इसे प्राय: एशिया का नोबेल पुरस्कार भी कहा जाता है। यह रमन मैगसेसे पुरस्कार फाउन्डेशन द्वारा फ़िलीपीन्स के भूतपूर्व राष्ट्रपति रमन मैगसेसे की याद में दिया जाता है। पटना के हवाई अड्डे का नाम उनके नाम पर रखा गया है। दिल्ली सरकार का सबसे बड़ा अस्पताल ‘लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल’ भी उनके नाम पर है।

Article Categories:
News

Comments are closed.

Shares