बरसती रही गोलियाँ, परंतु न रुका ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष और न ही हाथ से छूटा ‘तिरंगा’

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आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 19 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। बंगाल शब्द सुनते ही हमारे मस्तिष्क में एक बांग्लादेश राष्ट्र और दूसरे भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल की छवि उभर आती है, परंतु स्वतंत्रता से पूर्व ये दोनों अविभाजित थे और इनकी पूरी भूमि बंगाल के नाम से जानी जाती थी। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान तत्कालीन बंगाल क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र तो था ही, साथ ही उसने कई ऐसे क्रांतिकारी भी दिए, जिन्होंने स्वाधीनता के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। ऐसी ही एक महान महिला क्रांतिकारिणी थीं मातंगिनी हाज़रा। वे भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाली बंगाल की वीरांगनाओं में से एक थीं। मातंगिनी एक ऐसी क्रांतिकारी महिला थीं, जिन्होंने अपने पूरे शरीर पर गोलियाँ खाने के बाद भी न तिरंगे को और न ही उसकी आन-बान-शान को ही गिरने दिया और वीरगति को प्राप्त हुईं। आज हम मातंगिनी को इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज उनकी 149वीं जयंती है।

बार-बार गोली लगने के बावजूद लगाया ‘वंदे मातरम्’ का नारा

1942 में जब गांधीजी ने तत्कालीन बंबई (अब मुम्बई) से ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ की घोषणा की, तो पूरा देश उनके आह्वान पर इस आंदोलन में चल पड़ा-जुट पड़ा। इस आंदोलन में जब मातंगिनी भी जुड़ीं, तब उनकी आयु 72 वर्ष की हो चुकी थी। आंदोलन के दौरान 8 सितंबर, 1942 को मिदनापुर जिले के तामलुक गाँव (वर्तमान पश्चिम बंगाल) में हुए एक प्रदर्शन में पुलिस की गोली से 3 स्वाधीनता सेनानी शहीद हो गए। इसके विरुद्ध क्रांतिकारियों ने 29 सितंबर, 1942 को एक बड़ी रैली निकालने का निर्णय लिया। इसके लिये मातंगिनी ने गाँव-गाँव में घूम कर रैली के लिए 6,000 लोगों को तैयार किया। कांग्रेस के सदस्यों ने मिदनापुर जिले के विभिन्न पुलिस स्टेशनों और अन्य सरकारी कार्यालयों पर कब्ज़ा करने योजना बनाई। यह योजना जिलों में ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकने और एक स्वतंत्र भारतीय राज्य की स्थापना करने की दिशा में पहला कदम था। 29 सितंबर, 1942 को तामलुक थाने पर कब्ज़ा करने के लिए 72 वर्षीय मातंगिनी हाज़रा 6 हजार समर्थकों, जिनमें अधिकतर महिलाएँ शामिल थीं, के एक जुलूस का नेतृत्व किया। जब जुलूस शहर के सरकारी डाक बंगले पर पहुँचा, तो पुलिस ने उन्हें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 144 के तहत तितर-बितर होने का आदेश दिया। पुलिस ने उन्हें चेतावनी दी की यदि वे जुलूस लेकर आगे बढ़ेंगे, तो गोलियाँ चलाई जाएँगी, परंतु मातंगिनी आगे बढ़ती रहीं और पुलिस ने उनके पैर में एक गोली मार दी। इसके बाद भी मातंगिनी आगे बढ़ीं और उन्होंने पुलिस से अपील की कि वह भीड़ पर गोलियाँ न चलाएँ। मातंगिनी एक चबूतरे पर खड़ी होकर नारे लगवाने लगीं, तो अब पुलिस की बंदूकें गरज उठीं। पुलिस ने मातंगिनी पर दूसरी गोली चलाई, जो उनके बायें हाथ में आ कर लगी। मातंगिनी लड़खड़ाने लगीं, परंतु उन्होंने स्वयं को संभालते हुए तिरंगे झण्डे को गिरने से पहले ही दूसरे हाथ में ले लिया। तभी दूसरी गोली उनके दाहिने हाथ में आ कर लगी। मातंगिनी अब भी ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष कर रही थीं और हाथ में तिरंगा लिए हुए थीं। तभी पुलिस ने तीसरी गोली सीधे उनके सिर के आर-पार उतार दी। बार-बार गोली लगने के बावजूद वे वंदे मातरम्, जय हो मातृभूमि का नारा लगाती रहीं। मातंगिनी की देह वहीं लुढ़क गई और वे वीरगति को प्राप्त हुईं। इस बलिदान से पूरे क्षेत्र में इतना आक्रोश उमड़ा कि 10 दिन के अंदर ही लोगों ने अंग्रेजों को वहाँ से खदेड़ दिया और वहाँ स्वाधीन सरकार स्थापित हो गई, जिसने 21 महीनों तक काम किया।

जुलूस से जागीं 62 वर्षीय ‘गांधी बूढ़ी’ हुईं लहुलुहान

मातंगिनी हाज़रा का जन्म 19 अक्टूबर, 1870 को तत्कालीन ब्रिटिश बंगाल (अब पश्चिम बंगाल) में तामलुक के निकट स्थित होगला गांव में एक अत्यंत निर्धन परिवार में हुआ था। गरीबी के कारण 12 वर्ष की अवस्था में ही उनका विवाह गाँव के ही 62 वर्षीय विधुर त्रिलोचन हाज़रा से कर दिया गया, पंरतु दुर्भाग्य ने उनका पीछा न छोड़ा। 6 वर्ष बाद ही 18 वर्ष की अल्पायु में ही वे विधवा हो गईं। मातंगिनी के कोई संतान नही थी। पति की पहली पत्नी से उत्पन्न पुत्र उनसे बहुत घृणा करते थे। अतः मातंगिनी एक अलग झोंपड़ी में रह कर मजदूरी करके अपना जीवन यापन करती थीं। गाँव वालों के दुःख-सुख में वे सदा सहभागी रहने लगीं। उनकी सहयोग करने की प्रवृत्ति के कारण गाँव वाले उन्हें माँ के समान पूज्य मानने लगे और उन्हें महात्मा गांधी के समकक्ष ‘गांधी बूढ़ी’ (old lady Gandhi) के नाम से पुकारने लगे। अब तक मातंगिनी समाज सेवा ही कर रही थीं। उनका ध्यान स्वतंत्रता आंदोलन की ओर नहीं गया था, परंतु तभी 19 जुलाई 1905 को भारत के तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल का विभाजन कर दिया। यह अंग्रेजों की “फूट डालो और शासन करो” नीति का ही एक अंग था। 1908 में इसके विरोध में सम्पूर्ण भारत में बंग-भंग आंदेलन शुरू हो गया। बंगाल का हर व्यक्ति इस आंदोलन का में कूद पड़ा। 1932 में जब गांधीजी के नेतृत्व में देश भर में स्वाधीनता आंदोलन चलाया गया, तो उनके बताए मार्ग पर चल कर बंगाल के क्रांतिकारियों ने भी जूलूस निकाल और संभाएँ कर ब्रिटिश शासन का विरोध करना शुरू किया। उसी दौरान क्रांतिकारियों का ‘वन्दे मातरम्’ का घोष करता हुआ एक जुलूस 62 वर्षीय मातंगिनी के घर के पास से निकला, तो मातंगिनी ने बंगाली परम्परा के अनुसार शंख ध्वनि से उसका स्वागत किया, परंतु वे स्वागत करके ठहर नहीं गईं। इस जुलूस ने इस ‘गांधी बूढ़ी’ को गांधीजी के आंदोलन के साथ जुड़ने की तत्क्षण प्रेरणा दी और वे इसी जुलूस के साथ चल पड़ीं। तामलुक के कृष्णगंज बाज़ार में पहुँच कर एक सभा हुई। वहाँ मातंगिनी ने सबके साथ स्वाधीनता संग्राम में तन, मन और धन से संघर्ष करने की शपथ ली। इसके बाद उन्होंने गांधीजी के ‘नमक सत्याग्रह’ में भाग लिया। इसमें अनेक व्यक्ति गिरफ्तार हुए, पंरतु मातंगिनी की वृद्धावस्था देखकर उन्हें छोड़ दिया गया। इस अवसर का लाभ उठाते हुए उन्होंने तामलुक की कचहरी पर चुपचाप जाकर तिरंगा झंडा फहरा दिया। इस कार्य के लिए अंग्रेज पुलिस अधिकारियों ने उनकी बहुत मिटाई की, उनके मुँह से रक्त निकलने लगा, परंतु उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और भारत माता की जय का उद्घोष करती रहीं।

संक्रामक महामारी के बीच सेवा यज्ञ चलाया

29 अगस्त, 1931 में गांधीजी लंदन में आयोजित होने वाले द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए निकल चुके थे और दूसरी तरफ जवाहर लाल नेहरू ने इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से करबंदी आंदोलन की शुरुआत की, जो कई प्रांतों से होते हुए 1933 में बंगाल पहुँचा, जहाँ आंदोलन का मोर्चा संभाले बैठी थीं मातंगिनी। 17 जनवरी, 1933 को ‘करबंदी आन्दोलन’ को समाप्त करने के अपने मंसूबे के साथ बंगाल का तत्कालीन गर्वनर एण्डरसन तामलुक आया। एण्डरसन के विरोध में क्रांतिकारियों ने प्रदर्शन किया, जिसमें मातंगिनी हाज़रा सबसे आगे काला झण्डा लिये डटी हुई थीं। वे ब्रिटिश शासन के विरोध में नारे लगा रही थीं। इस पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और 6 माह का सश्रम कारावास देकर मुर्शिदाबाद जेल में बंद कर दिया। 1935 में तामलुक गाँव भीषण बाढ़ के कारण संक्रामक रोगों हैजा और चेचक की चपेट में आ गया। मातंगिनी अपने प्राण की चिन्ता किये बिना राहत कार्य में जुट गयीं।

स्वतंत्रता के बाद मिला सम्मान

1947 में स्वतंत्रता अर्जित करने के बाद कई स्कूलों, उपनिवेशों और सड़कों का नाम मातंगिनी हाज़रा के नाम पर रखा गया। 1977 में स्वतंत्र भारत के कोलकाता में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। 2002 में भारत के डाक विभाग ने मातंगिनी हाज़रा के सम्मान में 5 रुपये का डाक टिकट भी जारी किया। दिसंबर-1974 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने तामलुक दौरे के दौरान मांतगिनी हाज़रा की मूर्ति का अनावरण कर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किये थे।

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