अध्यक्ष पद : भाजपा में नहीं बपौती, कांग्रेस में गांधी ही गारंटी !

* भाजपा, जहाँ 8 से 28 राज्यों तक पार्टी का दबदबा बनाने वाले अध्यक्ष के प्रति भी नहीं रखा जाता मोह

* कांग्रेस, जहाँ 415 से 44 सीटों पर ला देने वाले अध्यक्ष को रिझाने की होड़ है, क्योंकि वह ‘गांधी’ है

* देश के सभी ‘परिवारवादी’ दलों के लिए बड़ी सीख छिपी है भाजपा के आंतरिक लोकतंत्र में

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 3 जून, 2019। भारतीय राजनीति में आज के युग में सबसे पुराना और ऐतिहासिक दल है भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC), तो सबसे बड़ा और शक्तिशाली दल है भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP)। 28 दिसम्बर, 1885 को स्थापित यानी 133 वर्ष पुराना-ऐतिहासिक दल कांग्रेस जहाँ भारत की स्वतंत्रता यानी 15 अगस्त, 1947 से लेकर 23 मई, 2014 तक यानी 67 वर्षों में 54 वर्ष और 4 महीनों तक देश की सत्ता पर रहा, वहीं 6 अप्रैल, 1980 को स्थापित यानी मात्र 39 वर्षों से भाजपा के रूप में सक्रिय दल आज विश्व का सबसे बड़ा और शक्तिशाली दल है और साथ ही पिछले 5 वर्षों और 6 दिनों से सत्तारूढ़ है। यद्यपि एक तरफ कांग्रेस ने स्वतंत्र भारत के 72 वर्षों के इतिहास में कई बार हार झेली और सत्ता से बेदखल हुई, तो दूसरी तरफ भाजपा ने भी 2 से 303 तक सीटों की यात्रा में 6 वर्षों तक सफलतापूर्वक काम करने वाली अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार गँवाई।

इस प्रकार वर्तमान भारतीय राजनीति में सक्रिय इन सबसे बड़े दो राष्ट्रीय दलों यानी कांग्रेस और भाजपा के बीच सत्ता में आने और सत्ता गँवाने जैसी कई समानताएँ हैं, परंतु बात जब आंतरिक लोकतंत्र की आती है, तब कांग्रेस और भाजपा में एक बुनियादी फर्क़ उभर कर सामने आ जाता है। यह फर्क़ जहाँ कांग्रेस की मजबूती है, वहीं मजबूरी भी है, तो दूसरी तरफ भाजपा के लिए यह फर्क़ उसकी सबसे बड़ी मजबूती है। इस बुनियादी फर्क़ के कारण ही आज जहाँ 8 राज्यों से 28 राज्यों तक भाजपा का दबदबा बना कर सबसे सफल अध्यक्ष सिद्ध हुए अमित शाह को अनायास ही यह पद छोड़ देना पड़ेगा, क्योंकि अब शाह गृह मंत्री बन चुके हैं। दूसरी तरफ 415 सीटें जीतने का रिकॉर्ड बनाने वाली कांग्रेस को उपाध्यक्ष के रूप में 44 और अध्यक्ष के रूप में भी 52 सीटों तक सिमटा देने वाले राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाए रखने के लिए रिझाने की होड़ मची है, क्योंकि वे गांधी हैं।

भारतीय राजनीति में श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्यय, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे कई धुरंधर नेताओं ने 1951 में अखिल भारतीय जनसंघ (बीजेएस-BJS) की जो नींव रखी, वह 1977 में सत्ता तक तो पहुँची, परंतु उद्देश्य और लक्ष्य अभी बहुत दूर थे। इसीलिए 1980 में वाजपेयी, आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी सहित कई आधुनिक नेताओं ने भाजपा की स्थापना की, जिसने 1984 में अपने पहले चुनाव में जहाँ सिर्फ 2 सीटें हासिल की थीं, वहीं 2019 में वह 2014 की तुलना में अधिक प्रचंड बहुमत से दोबारा सत्ता में आई है। भाजपा की इस जीत का निश्चित रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को दिया जाना अप्रासंगिक नहीं है, परंतु इस महाविजय के पीछे है पार्टी का वह महान आंतरिक लोकतंत्र, जो जनसंघ में भी था और भाजपा में भी है। उसी लोकतंत्र के चलते आज 9 जुलाई, 2014 को अध्यक्ष बनने वाले अमित शाह को यह पद त्यागना पड़ सकता है, क्योंकि वे अब सरकार का हिस्सा हैं।

शाह : सफलता के झंडे गाड़े, फिर भी अनायास ही छोड़ देंगे अध्यक्ष पद

लोकसभा चुनाव 2014 में अमित शाह भाजपा के उत्तर प्रदेश प्रभारी बनाए गए थे। 15 मई, 2014 तक शाह केवल तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी के क़रीबी और गुजरात भाजपा के कद्दावर नेता थे, परंतु 16 मई, 2014 को आए लोकसभा चुनाव 2014 के परिणामों ने शाह को अचानक मोदी केन्द्रित राजनीति की धुरि बना दिया। शाह ने उत्तर प्रदेश में भाजपा को 80 में से 71 सीटें दिला कर मोदी और पूरी भाजपा का दिल जीत लिया। इसके बाद शाह ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और 9 जुलाई, 2014 को भाजपा अध्यक्ष बनाए जाने के बाद पाँच वर्ष से भी कम कार्यकाल में आज शाह के नेतृत्व में भाजपा ने न केवल 28 राज्यों में अपनी शासकीय या मुख्य विपक्षी उपस्थिति दर्ज कराई, अपितु लोकसभा चुनाव 2019 में 2014 से अधिक सीटें जीतीं। वाजपेयी से लेकर राजनाथ सिंह तक 9 भाजपा अध्यक्षों में किसी ने वह सफलता हासिल नहीं की, जो 10वें अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा को मिली। इसके बावजूद यह भाजपा का लोकतंत्र है कि एक व्यक्ति एक ही पद पर रह सकता है, अत: शाह गृह मंत्री बनने के बाद स्वत: ही अध्यक्ष नहीं बने रह सकेंगे। पार्टी और पीएम नरेन्द्र मोदी भी यह अच्छी तरह जानते थे। स्पष्ट है कि सोची-समझी रणनीति के तहत जहाँ शाह को मंत्रिमंडल में लिया गया, वहीं आने वाले महत्वपूर्ण राज्य विधानसभा चुनावों में शाह की आवश्यकता का मोह नहीं रखा गया। पार्टी में अध्यक्ष पद किसी व्यक्ति की बपौती नहीं हो सकता, भले ही किसी अध्यक्ष के नेतृत्व में पार्टी ने सफलताओं के झंडे ही क्यों न गाड़े हों।

विफलताओं का अंबार, फिर भी उमड़ रहा प्यार

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव 2019 में करारी हार के बाद अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया है, परंतु यह कैसा त्यागपत्र है, जो पार्टी में जाकर अटक गया है ? यह कैसा त्यागपत्र है, जिसे देने के बाद कांग्रेस पार्टी के नेताओं में राहुल गांधी को इस बात के लिए रिझाने की होड़ लगी है कि वे त्यागपत्र वापस ले लें। 19 जनवरी, 2013 को कांग्रेस उपाध्यक्ष बनने के साथ ही लगभग पूरी तरह पार्टी की कमान अपने हाथ में ले लेने वाले राहुल गांधी ने 16 दिसम्बर, 2017 को अध्यक्ष पद संभाला यानी अध्यक्ष-उपाध्यक्ष पद के रूप में अब तक के कुल 6 वर्षों के राहुल के कार्यकाल में 40 से अधिक चुनावों में कांग्रेस पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। अध्यक्ष बनने के बाद राहुल कुछ बढ़त बनाते दिखाई दिए, जब उन्होंने गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 में कांग्रेस की सीटें बढ़वाने में सफलता हासिल की, जब उन्होंने कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 में पार्टी की हार के बावजूद भाजपा को सत्ता में आने से रोकने में सफलता हासिल की और जब उन्होंने राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2018 में भाजपा को हरा कर सत्ता पर कांग्रेस को बैठाया। इन तीन राज्यों में जीत के अलावा राहुल के खाते में लोकसभा चुनाव 2014 से लेकर लोकसभा चुनाव 2019 तक और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में केवल हार का अंबार है। इसके बावजूद यह कांग्रेस पार्टी का लोकतंत्र है, जहाँ राहुल को त्यागपत्र पर वापस लेने के लिए रिझाया जा रहा है, क्योंकि वे गांधी हैं। कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए गांधी होना ही सबसे बड़ी गारंटी है। भले ही उसके नेतृत्व, उसकी अपरिक्वता, उसकी बचकाना हरकतों, ख़राब रणनीति के कारण पार्टी को हार पर हार मिली हो, फिर भी उसे रिझाने की होड़ लगी है।

परिवार से ऊपर दल और दल से ऊपर देश

भाजपा ने इस चुनाव में कई नए मानदंड स्थापित किए हैं। एक तरफ भाजपा, अमित शाह और नरेन्द्र मोदी भाजपा की स्थापना से लेकर चुनावों में टिकट बँटवारे से लेकर मोदी के दोबारा सत्ता में आने और शपथ ग्रहण समारोह में 8 हजार अतिथियों के बीच मोदी के परिवार के 8 लोगों तक को निमंत्रण नहीं देने जैसे कई कार्यों से बार-बार यह सिद्ध करने में सफल रही कि उसके लिए परिवार से ऊपर दल है, वहीं मोदी ने अमित शाह को गृह मंत्री बना कर यह सिद्ध कर दिया कि उनके लिए दल से ऊपर देश है। दूसरी तरफ करारी शिकस्त के बाद मंथन की बजाए त्यागपत्र के तमाशे में उलझे कांग्रेस के अलावा अन्य परिवारवाद आधारित राजनीतिक दलों में भी यह ड्रामा खूब हुआ। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी-TMC) अध्यक्ष ममता बैनर्जी ने भी स्वयं का त्यागपत्र, स्वयं को देकर, स्वयं ही अस्वीकृत कर दिया। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में जातिवादी गठबंधन करने वाले समाजवादी पार्टी (सपा-एसपी-SP) के अध्यक्ष अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी (बसपा-बीएसपी-BSP) अध्यक्ष मायावती इतने गहरे सदमे में हैं कि उन्होंने अध्यक्ष पद छोड़ने की नैतिकता दिखाने का भी साहस नहीं किया। ऐसे ही और भी कई दल हैं, जहाँ अध्यक्ष पद एक व्यक्ति और परिवार की बपौती है। ऐसे दलों को भाजपा से आंतरिक लोकतंत्र की सीख लेनी चाहिए।

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