इसे कहते हैं लोकतंत्र, जिसमें एक ‘चौकीदार’ भी मालिक के माथे से ताज उतार कर अपने सिर पर सजा सकता है !

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विश्लेषण : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 24 मई, 2019। लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि इसमें कोई राजा नहीं और कोई रंक नहीं। हर किसी को समान अधिकार प्राप्त हैं। कोई भी अपनी योग्यता, क्षमता और कुशलता के बल पर कोई भी लक्ष्य प्राप्त कर सकता है। लोकतंत्र ने 2019 के लोकसभा चुनाव में अपनी यही खासियत दिखाई है। एक ओर जहाँ कांग्रेस का किला अमेठी ढह गया, वहीं मध्य प्रदेश में भी बड़ा उलटफेर हुआ और यहाँ सिंधिया राजघराने का गढ़ कहलाने वाली गुना लोकसभा सीट पर पहली बार भाजपा ने कब्जा जमाया है। यहाँ की जीत इसलिये भी सविशेष है कि यहाँ के मतदाताओं ने अपने राजा का घमंड उतारकर जहाँ उन्हें अर्श से फर्श पर ला दिया, वहीं उन्हीं राजा के एक सिपहसालार को जीत का तिलक लगाकर राजा के स्थान पर बिराजमान कर दिया, अर्थात् गुना का सांसद चुन लिया।

कांग्रेस का गुना का गढ़ भी हुआ ध्वस्त

मध्य प्रदेश में ग्वालियर और गुना सिंधिया राजघराने के गढ़ माने जाते हैं। गुना से तीन बार सांसद रह चुके और चौथी बार संसदीय चुनाव में उतरे कांग्रेस प्रत्याशी ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने गुना से निर्दलीय चुनाव लड़कर इस सीट को अपना गढ़ बनाया था, वह यहाँ से 6 बार सांसद चुनी गईं। उनके बाद उनके पुत्र माधवराव सिंधिया भी यहाँ से 4 बार सांसद चुने जा चुके हैं। यही कारण है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया भी अपनी जीत के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त थे और जब कांग्रेस ने उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाकर वहाँ चुनाव प्रचार करने की जिम्मेदारी सौंपी, तो वह वहाँ चले गये और उनकी अनुपस्थिति में उनकी धर्मपत्नी प्रियदर्शनी राजे सिंधिया ने गुना में अपने पति के लिये प्रचार की कमान संभाली थी।

सिंधिया परिवार की बहू ने उड़ाया मज़ाक

भाजपा ने गुना से उस के. पी. यादव को टिकट दिया, जो कभी ज्योतिरादित्य सिंधिया के ही सांसद प्रतिनिधि (MP REPRESENTATIVE) और फैन थे। सरल भाषा में कहें, तो के. पी. यादव सिंधिया के कर्मचारी या लोकसभा चुनाव 2019 में सबसे चर्चित शब्द चौकीदार ही थे। पेशे से एमबीबीएस डॉक्टर कृष्ण पालसिंह यादव (डॉ. के. पी. यादव) को भाजपा ने टिकट दिया तो सिंधिया की पत्नी प्रियदर्शिनी राजे सिंधिया ने भाजपा और उसके प्रत्याशी दोनों का मज़ाक उड़ाया और अपने ऑफिसियल ट्वीटर हैंडल पर डॉ. के. पी. यादव का कार में बैठे ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ सेल्फी लेने वाला फोटो रखकर कमेंट लिखी कि जो कभी ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ सेल्फी लेने के लिये उनकी कार के पीछे भागता था, उसे भाजपा ने अपना प्रत्याशी बनाया है, वह ज्योतिरादित्य सिंधिया को भला क्या चुनौती देगा ? परंतु यहीं पर वह राजा और रंक का फर्क करके बड़ी भूल कर बैठी और मतदाताओं ने उनकी इस सोच को ग़लत साबित कर दिया।

ऐसे ढह गया सिंधिया घराने का किला

मध्य प्रदेश में लोकसभा की 28 सीटों में से भाजपा ने 2014 में 26 सीटों पर जीत दर्ज की थी। उसी भाजपा ने 2019 में 28 में से 27 सीटों पर कब्जा किया है। इसमें गुना की हाईप्रोफाइल सीट भी शामिल है। जहाँ 2011 की जनगणना के अनुसार कुल 16,05,613 मतदाता हैं, इनमें 8,57,327 पुरुष व 7,48,265 महिला मतदाता हैं। इनमें से 52.1 प्रतिशत मतदाताओं ने डॉ. के. पी. यादव को वोट दिया और सिंधिया को 41.5 प्रतिशत मतदाताओं ने चुना, यानी यादव को 6,14,049 वोट मिले और ज्योतिरादित्य सिंधिया को 4,88,500 वोट प्राप्त हुए। इस प्रकार यादव ने ज्योतिरादित्य सिंधिया पर 1,25,549 वोटों से शानदार जीत दर्ज की। आपको बता दें कि इसी सीट पर 2014 में ज्योतिरादित्य सिंधिया को 5,17,036 वोट मिले थे और उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी भाजपा प्रत्याशी जयभान सिंह पवैया को 1,20,792 वोटों से हराया था। भाजपा प्रत्याशी पवैया को 3,96,244 वोट ही मिले थे। इस सीट पर बसपा प्रत्याशी पिछली बार की तरह इस बार भी तीसरे नंबर पर रहा, जिसे 37,530 वोट मिले। 2014 में बसपा प्रत्याशी को 27,412 वोट मिले थे।

आपको बता दें कि डॉ. के. पी. यादव व्यवसाय से एमबीबीएस डॉक्टर हैं। उनका परिवार लंबे समय से राजनीति में सक्रिय है। उनके पिता रघुवीरसिंह यादव गुना जिला पंचायत के 4 बार अध्यक्ष रहे हैं। डॉ. यादव 2004 से राजनीति में आये। वह ज्योतिरादित्य सिंधिया के फैन थे और मेहनत करके सिंधिया के खास बन गये, उन्हें सिंधिया का सांसद प्रतिनिधि बनने का भी मौका मिला। उन्हें विधायक बनने का एक अवसर भी मिला था और विधायक महेन्द्रसिंह कालूखेड़ा के निधन से रिक्त हुई मुंगावली विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में उन्हें टिकट मिलने की पूरी संभावना थी, सिंधिया ने भी उनसे कह दिया था कि टिकट मिल जाएगा। इसलिये उन्होंने अपना प्रचार भी शुरू कर दिया था, परंतु ऐन मौके पर पार्टी ने उनका टिकट काट दिया और बृजेन्द्रसिंह यादव को टिकट दे दिया, वह जीतकर विधायक भी बन गये। इसके बाद वह नाराज हुए और पिछले साल भाजपा में शामिल हो गये। भाजपा ने 2018 में प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में टिकट भी दिया, परंतु बहुत नजदीक पहुँचने के बाद मात्र दो हजार वोटों के अंतर से हार गये। इसके बावजूद भाजपा ने उन पर भरोसा बनाये रखा और इस बार उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ने का मौका दिया, जिसमें जीत दर्ज करके उन्होंने भाजपा को गुना की हाई प्रोफाइल सीट भेंट की।

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