संन्यासी सम्राट : हर ‘परिवार और वाद’ पर भारी पड़े ‘निर्परिवार और निर्विवाद’ नरेन्द्र !

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मोदी : अष्टावक्र के महावाक्य ‘जिसका इस जगत में कुछ नहीं, उसका पूरा जगत है’ को साकार किया

मोदी : ‘मेरा कुछ नहीं’ कह कर 130 करोड़ो लोगों को ही बना लिया परिवार

मोदी : डिवाइडर इन चीफ नहीं, युनिफाइयर इन चीफ

मोदी : विविधतापूर्ण भारत को जाति और धर्म की बेड़ियों से मुक्ति दिलाई

मोदी : परिवारवादी-वंशवादी नेताओं को दिखा दिया, ‘दल से ऊँचा देश’

मोदी : व्यक्ति विरोध की अंधी राजनीति करने वालों की आँखें खोलीं

मोदी : हवाई विरोध और गालियों से विचलित हुए बिना सतही समर्थन को पहचाना

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 25 मई, 2019। लोकसभा चुनाव 2019 अब समाप्त हो चुका है। अंतिम परिणाम आ चुके हैं। देश की जनता ने नरेन्द्र मोदी को ही फिर से प्रधानमंत्री बनाने का जनादेश दिया है। नरेन्द्र मोदी जिस भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) के नेता हैं, उस पार्टी को 303 सीटें मिलीं यानी स्पष्ट बहुमत मिला। नरेन्द्र मोदी जिस राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग-NDA) के नेता हैं, उस गठबंधन को 354 सीटें मिलीं।

लोकसभा चुनाव 2014 के बाद लोकसभा चुनाव 2019 में पुनः मिली भव्य विजय पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सबसे पहली प्रतिक्रिया थी, ‘आपने (जनता ने) इस फ़कीर की झोली भर दी।’ कितना सही और सटीक कहा प्रधानमंत्री ने। पिछले 17 वर्षों 7 महीनों ओर 18 दिनों से लगातार दैनिक 18 घण्टे काम कर रहे नरेन्द्र मोदी ने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए भी गुजरात को देश में और गुजरात की उपलब्धि को देश की उपलब्धि से जोड़ा, तो देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद भी देश में रह कर और देश से बाहर जाकर भी केवल और केवल भारत के लिए ही सब कुछ किया। भारत ने नरेन्द्र मोदी से पहले अब तक 14 प्रधानमंत्री देखे हैं और जवाहरलाल नेहरू से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह तक सभी प्रधानमंत्रियों की उनकी परिवार के साथ तसवीरें देखी होंगी। परिवार के साथ सबसे अधिक तसवीरें कदाचित नेहरू से अधिक किसी की नहीं होंगी, जिसमें अक्सर उनके माता-पिता, पत्नी, पुत्र, पुत्रवधु, नाती-पोते देखे जा सकते हैं, तो दूसरे नंबर पर इंदिरा और राजीव गांधी रहे, जिनकी पारिवारिक तसवीर देखी जा सकती है। यहाँ तक कि अविवाहित अटल बिहारी वाजपेयी भी अपने एक परिवार से बंधे हुए थे। यहाँ किसी की देशभक्ति पर संदेह करने की चेष्टा नहीं है, परंतु परिवार होते हुए भी निर्लेप और निर्परिवार रहने वाले नरेन्द्र मोदी के उस संन्यस्त पहलू को उजागर करने का प्रयास है, जो भारत की जनता को अनादि काल से आकर्षित करता है। यदि देश ने गुजरात से लेकर केन्द्र की रानीति में 17 वर्ष और 7 महीने से कार्यरत् भारत के 15वें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कोई सपरिवार तसवीर नहीं देखी है, तो उनका यही सांसारिक संन्यास देश के सभी 14 पूर्व प्रधानमंत्रियों से उन्हें अलग बनाता है।

यदा-कदा अपनी जननी हीराबेन से मिलने पहुँचने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के परिवार में उनकी माता के अलावा उनकी पत्नी, 4 छोटे-बड़े भाई, एक बहन और कई नाती-पोते हैं। क्या आपने मोदी और हीराबेन की तसवीर के अलावा प्रधानमंत्री की कोई पारिवारिक तसवीर देखी है ? आपका उत्तर होगा, ‘नहीं’। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के स्वयंसेवक से लेकर जनसंघ और भाजपा के कार्यकर्ता-नेता बने रहने तक भी मोदी ने सदैव वैराग्य का रास्ता अपनाया और जब जननेता बने, तो जनता को ही परिवार बना लिया, जिस जनता में उनका अपना निजी परिवार भी शामिल है। मोदी ने अपने इस सिद्धांत से भारत की गुरु-शिष्य परम्परा में राजा जनक और गुरु अष्टावक्र के बीच हुए संवाद में अष्टावक्र की कही गई उस बात को सार्थक करके दिखाया, जिसमें अष्टावक्र कहते हैं, ‘जिसके जीवन का मंत्रलेख है कि जगत में उसका कुछ नहीं है, वह सारे जगत का सम्राट है।’ यही कारण है कि मोदी की लगातार दूसरी जीत के बाद भारत के कई लोगों ने उन्हें ‘फ़कीर बादशाह’ यानी ‘संन्यासी सम्राट’ की संज्ञा दी।

भारत के इतिहास में नरेन्द्र मोदी से पहले कांग्रेस-भाजपा सहित कई राजनीतिक दलों के नेताओं को देश का नेतृत्व करने का अवसर मिला, परंतु नरेन्द्र मोदी ने देश की राजनीति की मूल भावना को ‘सबका साथ-सबका विकास’ के नारे से उजागर कर दिया। यह ऐसा नारा है, जिसमें धर्म-सम्प्रदाय-जाति में बँटे भारत को एकछत्र के नीचे ला खड़ा किया। वोट बैंक की बेड़ियों में बांधे गए भारत के इस विशाल जनसमुदाय को नरेन्द्र मोदी ने अपने इस एक नारे से वर्षों नहीं, अपितु सदियों से पड़ी बेड़ियों से मुक्त कराया और एकता के सूत्रधार बने। मतदान के दौरान दुनिया की प्रसिद्ध TIME मैगज़ीन में एक नासमझ पत्रकार ने नरेन्द्र मोदी को ‘डिवाइडर इन चीफ’ यानी विघटनकारी-विभाजनकारी मुखिया ठहराया था, परंतु देश की जनता ने इस नादान, व्यक्तिगत राग-द्वेष से पीड़ित और पत्रकारिता का मूल धर्म भूल जाने वाले इस पत्रकार के समक्ष नरेन्द्र मोदी को युनिफायर इन चीफ या एकसूत्र में बांधने वाला साबित किया। चुनाव परिणामों ने देश में तीन वर्षों से नरेन्द्र मोदी की नीति और नीयत नहीं, अपितु केवल नाम का विरोध करने की गंदी राजनीति की। मोदी को रोकने के लिए किसी ने नैतिकता के सभी मानदंडों को ताक पर रख कर गठबंधन किया, तो कोई गाली-गलौच की सीमा तक गिर गया, परंतु नरेन्द्र मोदी अविचलित रहे और उन्होंने हवा में किए जा रहे वार-प्रहार पर नहीं, अपितु सतही समर्थन जुटाने पर ध्यान दिया। मोदी के नाम पर विरोध करने वालों को बता दिया कि जनता के मन में मोदी का नाम ही चल रहा था और इसी एक नाम ने पूरे देश को एकजुट कर धर्म-जाति-वंशवाद जैसी बेड़ियों से ऊपर उठ कर देश के लिए भला सोचने पर विवश कर दिया। इस चुनाव में मोदी नहीं, बल्कि देश जीता है।

नरेन्द्र मोदी पर पत्नी होने के बावजूद उनसे दूरी बनाए रखने को लेकर विरोधी निजी हमले भी करते रहे, परंतु ऐसी कुचेष्टा करने वालों ने इस बात पर ग़ौर नहीं किया कि निर्परिवार मोदी ने जब पूरे देश को ही अपना परिवार बना लिया, तो देश में उनका परिवार कहाँ अलग है ? जब वे सबका साथ-सबका विकास की बात करते हैं, तो उस ‘सब’ में सभी आ जाते हैं, फिर किसी का कोई भी धर्म, सम्प्रदाय या जाति हो। मोदी का यह सीधा सिद्धांत व्यक्ति विरोध की ज्वाला में झुलस रहे नेताओं के गले नहीं उतरा। वे तो 20वीं सदी में ही जीते रहे और धर्म तथा जाति के नाम पर बनाई गई अपनी वोट बैंक के भरोसे बैठे रहे और सभी को मुँह की खानी पड़ी। इतना ही नहीं, एक तरफ नरेन्द्र मोदी और सम्पूर्ण भाजपा जनसंघ के जमाने से वंशवाद की धुर-विरोधी रही और मोदी-शाह की जोड़ी ने तो वंशवाद के फेर में फँसी जनता को इस बंधन से भी मुक्त करा दिया। देश के कुछ नेताओं ने अपने दलों को अपने परिवार की जागीर बना लिया। कोई भी दल देश के लिए होता है, देश दल के लिए नहीं होता, परंतु बड़े-बड़े राजनीतिक दलों में कूट-कूट कर परिवारवाद और वंशवाद को आगे बढ़ाया गया। नेहरू के बाद बेटी इंदिरा, इंदिरा के बाद बेटा राजीव, राजीव के बाद पत्नी सोनिया, सोनिया के बाद पुत्र राहुल, राहुल के बाद संभवतः बहन प्रियंका, मुलायम के बाद पुत्र अखिलेश, ममता बैनर्जी के बाद भतीजे अभिषेक बैनर्जी, फारूक़ अब्दुल्ला के बाद पुत्र उमर अब्दुल्ला, चौधरी चरण सिंह के बाद पुत्र अजित सिंह, शरद पवार के बाद पुत्री सुप्रिया सुले, बाल ठाकरे के बाद पुत्र उद्धव ठाकरे के बाद पुत्र आदित्य ठाकरे, एच. डी. देवे गौड़ा के बाद पुत्र एच. डी. कुमारस्वामी, बीजू पटनायक के बाद पुत्र नवीन पटनायक, लालू यादव के बाद पुत्र तेजस्वी यादव, प्रकाश सिंह बादल के बाद पुत्र सुखबीर सिंह बादल आदि इत्यादि। बहुत लम्बी सूची है, जो कदाचित समाप्त नहीं होगी। दूसरी तरफ 1980 में स्थापित भाजपा को देख लीजिए, जिसके प्रथम अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी थे, जिनके परिवार का कोई सदस्य भाजपा में नहीं था। उनके बाद लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे, बंगालू लक्ष्मण, जना कृष्णमूर्ति, वेंकैया नायडू, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और अमित शाह। किसी का भी आपस में कोई पारिवारिक संबंध नहीं है।

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