विशेष टिप्पणी : इस ‘कीचड़’ से दूर ही रहे ‘कमल’ तो अच्छा होगा…

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* कर्नाटक में PM मोदी और भाजपा के आदर्शों की कसौटी

* जोड़-तोड़ की गंदगी वाली ‘सरकार’ को अलविदा कहने का स्वर्ण अवसर

* नया जनादेश प्राप्त करके ही सत्ता प्राप्ति का मार्ग अपनाए भाजपा

कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 17 जुलाई, 2019 (युवाPRESS)। कमल कीचड़ से भरे पानी में ही खिलता है, परंतु फिर भी कीचड़ या पानी का स्पर्श नहीं करता। इसीलिए पुष्पों में कमल को सबसे शुद्ध माना गया है। यहाँ हम कोई पुष्प पुराण नहीं खोलने जा रहे, हम बात कर रहे हैं भारतीय राजनीति में सोलह कलाओं से खिले उस कमल की, जो सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) का चुनाव चिह्न है। अभी 1 महीना और 24 दिन पहले ही विविधताओं से भरे भारत देश ने जिस कमल चिह्न पर मन भर अपनी उंगलियाँ दबाईं और नरेन्द्र मोदी को दूसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में चुना, उस कमल का स्वच्छ राजनीति के प्रति उत्तरदायित्व निश्चित रूप से बढ़ गया है। समूची भाजपा और उसके सभी नेताओं को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसद के सेंट्रल हॉल में दिया गया उच्च स्तरीय भाषण भी अवश्य ही याद होगा, जो कमल को कीचड़ और पानी में रह कर भी शुद्ध रहने का संदेश देता है।

यह भूमिका इसलिए बांधनी पड़ी, क्योंकि पिछले कुछ दिनों से दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक में राजनीतिक उठापटक चल रही है और इस उठापटक में कसौटी हो रही है उस कमल की, जिसका नेतृत्व दल के रूप में भाजपा, प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी और अध्यक्ष के रूप में गृह मंत्री अमित शाह कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय राजनीति के पुराने ढर्रों को जिस प्रकार ध्वस्त किया है, उसे देखते हुए यह स्वयं पीएम मोदी का भी उत्तरदायित्व है कि वह स्वतंत्र भारत में 70 वर्षों से चली आ रही जोड़-तोड़ वाली सरकार की राजनीति को भी ध्वस्त करें और कर्नाटक में कीचड़ से सना कमल खिलाने का कोई प्रयास न करे।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 में जनता ने किसी एक दल को जनादेश नहीं दिया था, परंतु 225 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा 105 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में अवश्य उभरी थी। यह जनादेश निश्चित रूप से सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के विरुद्ध था, क्योंकि जनता ने कांग्रेस को 79 सीटें दी थीं, जबकि जनता दल सेकुलर (जदसे-JDS) को सबसे कम मात्र 37 सीटें मिली थीं। यद्यपि जनादेश सिद्धारमैया सरकार के विरुद्ध था, परंतु आँकड़ों के लिहाज़ से भाजपा पूर्ण बहुमत से 8 सीटें दूर रह गई थी। बस, फिर क्या था। 133 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी और उसके तथाकथित आधुनिक युवा अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने पूर्वजों की तर्ज पर ही अपनी राजनीति की और भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए हर तरह का समझौता करते हुए जेडीएस को सत्ता सौंप दी।

अब एच. डी. कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली कांग्रेस-जेडीएस सरकार संकट में है। आरोप लगाया जा रहा है कि भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बी. एस. येदियुरप्पा के इशारे पर कुमारस्वामी सरकार को अस्थिर किया गया है। राजनीतिक जोड़-तोड़ की यह घिसी-पिटी परम्परा यदि येदियुरप्पा ने नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में भी जारी रखी है, तो यह स्वयं प्रधानमंत्री के उच्च आदर्शों की बातों को सबसे बड़ी चुनौती है। दरअसल कांग्रेस और जेडीएस के कुल 15 विधायकों ने विधानसभा सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया है। यदि यह त्यागपत्र विधानसभा अध्यक्ष स्वीकार कर लें, तो सदन का संख्या बल घट कर 210 रह जाएगा। ऐसे में कुमारस्वामी सरकार अल्पमत में आ जाएगी और 105 सदस्यों वाली भाजपा आसानी से सरकार बना सकेगी, परंतु भाजपा का ऐसा करना भारत की नया मोड़ ले रही आधुनिक राजनीति में पुरानी गंदगी को दोबारा पनपने का पाप नहीं कहलाएगा ?

नया जनादेश ही कमल की शुद्धता पर मुहर लगा सकता है

कर्नाटक में विद्रोही विधायकों का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है। यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने आज के अपने आदेश में विधायकों का त्यागपत्र स्वीकार करने या न करने का निर्णय विधानसभा अध्यक्ष पर छोड़ दिया है, परंतु साथ ही विद्रोही विधायकों को सदन में उपस्थित रहने के लिए बाध्य न करने का आदेश भी दिया है। इसका सीधा तात्पर्य यह है कि गुरुवार को कर्नाटक विधानसभा में कुमारस्वामी सरकार के विश्वास मत प्रस्ताव के दौरान 15 विद्रोही विधायक अनुपस्थित रह सकते हैं और ऐसी स्थिति में कुमारस्वामी सरकार का पतन निश्चित हो जाएगा। बस, यहीं से भाजपा और कमल की कसौटी आरंभ होगी। कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 में जनता ने भाजपा को पूर्ण बहुमत से थोड़ा दूर रख कर जो भूल की, उसका पश्चाताप लोकसभा चुनाव 2019 में स्पष्ट दिखाई दिया, जिसमें जनता ने भाजपा को 28 में से 23 सीटें दीं। इसका सीधा अर्थ यह है कि कर्नाटक की जनता कांग्रेस-जेडीएस की गठबंधन या ठगबंधन राजनीति से परेशान है। ऐसे में यदि कुमारस्वामी सरकार गिर जाती है, तो भाजपा और येदियुरप्पा को नई सरकार के गठन का प्रयास नहीं करना चाहिए। भाजपा को अपने कमल को शुद्ध रखना है, तो जोड़-तोड़ वाली गंदी राजनीति के कीचड़ से उसे बचाना होगा। भाजपा और कमल के लिए प्रतिष्ठापूर्ण यही रहेगा कि विधानसभा को भंग कर दिया जाए। विधानसभा के मध्यावधि चुनाव हों और भाजपा नया जनादेश लेकर कर्नाटक की सत्ता पर विराजित हो। नया जनादेश लेकर सरकार का गठन करना ही कमल की शुद्धता पर मुहर लगा सकता है।

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