IRON LADY OF AMETHI : एक ऐसी ‘स्मृति’, जो कभी विस्मृत नहीं होगी !

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पाँच महीनों की नहीं, पाँच वर्षों की मेहनत से गिराया ‘गांधी’ का गढ़

सांसद के रूप में दुर्भाग्य से आन पड़े ‘कंधा’ देने के पहले काम से नहीं चूकीं

पाँच वर्षों तक कंधे से कंधा मिला कर चलने की गारंटी बन गया ‘कंधा’ देने काम

मोदी-शाह की देशव्यापी विजयी धमक पर भी भारी पड़ी अमेठी की विराट विजय

केवल 13 वर्षों की राजनीतिक यात्रा में ‘तीस मार खाँ’ बन गई टीवी की दुनिया की ‘तुलसी’

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 27 मई, 2019। वैसे भारत में आयरन लैडी ऑफ इंडिया की उपाधि दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नाम दर्ज है, परंतु लोकसभा चुनाव 2019 ने भारत में एक नई आयरन लैडी का उदय किया है। यह आयरन लैडी इतनी हैसियत तो नहीं रखती कि वह देश की आयरन लैडी कहला सके, परंतु उसने देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी के गढ़ और वर्तमान अध्यक्ष राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी में विराट विजय प्राप्त कर स्वयं को अमेठी की आयरन लैडी के रूप में निश्चित रूप से स्थापित किया है।

जी हाँ। हम बात कर रहे हैं स्मृति ईरानी की। स्मृति ईरानी को आपने संसद में भाषण करते देखा होगा, परंतु वह अब तक संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा की ही सदस्य थीं। स्मृति ईरानी 19 अगस्त, 2011 से आज तक यानी पिछले 8 वर्षों से राज्यसभा की गुजरात से निर्वाचित सदस्य हैं, परंतु 16 मई, 2019 के बाद वह पहली बार लोकसभा की सदस्य बन गई हैं, परंतु उनका लोकसभा में पहुँचना कोई सामान्य घटना नहीं है, क्योंकि स्मृति ईरानी ने गांधी परिवार के गढ़ को ढहा कर लोकसभा के लिए अपना मार्ग प्रशस्त किया है। सबसे पुरानी और ऐतिहासिक पार्टी कांग्रेस के गढ़ और पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को परास्त कर स्मृति ईरानी इस लोकसभा चुनाव 2019 में न केवल जायंट किलर सिद्ध हुई हैं, अपितु स्मृति की जीत वर्षों तक गांधी परिवार और वर्तमान में सक्रिय राजनेताओं सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के मन से कभी विस्मृत नहीं होगी।

कोमल ‘तुलसी’ की असली स्मृति को भाजपा ने पहचाना

वर्ष 1998 में ब्यूटी प्रेग्नेंट्स मिस इंडिया में भाग लेकर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने वालीं स्मृति ईरानी यह प्रतिस्पर्धा तो नहीं जीत सकीं, परंतु उन्होंने यहीं से छोटे पर्दे यानी टेलीविज़न की दुनिया में अभिनय यात्रा शुरू की। स्मृति ने मीका सिंह के ‘बोलियाँ’ आलबम के गीत ‘सावन में लग गयी आग’ के साथ अभिनय करियर की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने स्टार प्लस के दो धारावाहिकों ‘आतिश’ एवं ‘हम हैं कल आज और कल’ के साथ टीवी की दुनिया में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने डीडी मेट्रो पर प्रसारित होने वाले ‘कविता’ धारावाहिक में भी काम किया, परंतु अब तक स्मृति कोई विशेष पहचान नहीं बना पाई थीं। इस बीच वर्ष 2000 में एकता कपूर के स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ में स्मृति ने संस्कारी बहू तुलसी का अभिनय किया। 3 जुलाई, 2000 से 8 नवम्बर, 2009 तक सबसे लम्बी अवधि तक चले 1,844 एपिसोड वाले इस धारावाहिक ने स्मृति ईरानी को पूरे देश में तुलसी के रूप में विख्यात कर दिया। घर-घर में सास-बहुओं के बीच तुलसी के रूप में स्मृति सबके मानस पटल पर छा गईं। इसी बीच टीवी-फिल्मों के स्टार्स का चुनावी लाभ उठाने का कोई अवसर नहीं छोड़ने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) ने उनका हाथ थामा। तुलसी की ऊपरी पहचान में छिपी असली तेजतर्रार स्मृति को भाजपा ने पहचानने में देरी नहीं की।

मोदी का विरोध कर भटक गईं स्मृति

स्मृति ने वर्ष 2003 में भाजपा जॉइन की और एक ही वर्ष के भीतर वे महाराष्ट्र युवा भाजपा मोर्चा की उपाध्यक्ष के पद तक पहुँच गईं। यह उनकी कुशलता और तेजस्विता का ही परिणाम था कि भाजपा ने लोकसभा चुनाव 2004 में स्मृति को दिल्ली की चांदनी चौक सीट से उम्मीदवार बनाया, परंतु वे हार गईं। इस हार से स्मृति रास्ता भटक गईं और उन्होंने हार के लिए गुजरात दंगों और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को कोसा। मोदी के त्यागपत्र की मांग के साथ स्मृति ने उपवास आंदोलन शुरू कर दिया। यद्यपि हाईकमान ने कार्रवाई की चेतावनी दी, तो स्मृति ठंडी पड़ गईं। जैसे-तैसे लोकसभा चुनाव 2009 आए, पर भाजपा में मोदी के बढ़ते कद के बीच स्मृति को टिकट नहीं दिया गया। 2010 में स्मृति को पार्टी महासचिव और फिर भाजपा महिला मोर्चा की अध्यक्ष बनाया गया।

मोदी ने ही थामा स्मृति का हाथ और पहुँचाया राज्यसभा

स्मृति ईरानी ने 2004 में जिस मोदी के विरुद्ध उपवास आंदोलन छेड़ा था, उसी मोदी ने 7 वर्षों बाद 2011 में स्मृति का हाथ थामा और उन्हें गुजरात से राज्यसभा सदस्य के रूप में संसद पहुँचाया। इसके बाद स्मृति ने राजनीतिक यात्रा में पीछे मुड़ कर नहीं देखा। तब से स्मृति मोदी की मुरीद हो गईं और यह मोदी की ही रणनीति थी कि स्मृति ईरानी को लोकसभा चुनाव 2014 में अमेठी से भाजपा का उम्मीदवार बनाया गया। स्मृति चुनाव हार गईं, परंतु राहुल गांधी को 2019 में हराने के लिए वे भाजपा की मजबूत नींव रखने में सफल रहीं। एक समय मोदी को कोसने वाली स्मृति ईरानी को पहली बार केन्द्रीय मंत्री बनने का अवसर भी प्रधानमंत्री बनते ही नरेन्द्र मोदी ने ही दिया। उनकी डिग्री को लेकर विवाद हुए। विरोधियों ने व्यक्तिगत से लेकर हर तरह के वार किए, परंतु मोदी के मजबूत नेतृत्व में स्मृति का राजनीतिक विकास तेजी से हुआ।

2014 में जीत की नींव रख कर अमेठी को अड्डा बनाया

लोकसभा चुनाव 2014 में जब पूरी भाजपा नरेन्द्र मोदी की लहर पर सवार होकर 30 वर्षों बाद पहली बार पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने का जश्न मना रही थीं, तब स्मृति ईरानी अमेठी से हार के बावजूद संतुष्ट थीं। एक तरफ मोदी ने पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने पहले ही मंत्रिमंडल में एक विशेष रणनीति के तहत स्मृति ईरानी को स्थान दिया, तो दूसरी तरफ मोदी-शाह के नेतृत्व में 2014 में ही भाजपा के मतों का प्रतिशत 25 तक बढ़वा कर अमेठी में 2019 की जीत की नींव डाल चुकीं स्मृति ने अमेठी से हार के बावजूद अमेठी को ही अड्डा बना लिया। केन्द्रीय मंत्री रहते हुए स्मृति ईरानी ने अमेठी के लिए केन्द्र सरकार से जुड़े हर काम करने में ज़ोर लगा दिया। इसी बीच 2017 में उत्तर प्रदेश में भी भाजपा की योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार आ गई। स्मृति ने मोदी के बाद योगी से भी सहयोग लिया और सांसद न रहते हुए भी अमेठी के विकास को नई ऊँचाइयाँ दीं। साथ ही राहुल गांधी की निष्क्रियता के प्रति भी अमेठी के लोगों की आँखें खोलीं और राहुल गांधी को हरा कर ही दम लिया। स्मृति की यह जीत पाँच महीनों नहीं, अपितु पाँच वर्षों की मेहनत का परिणाम है।

मोदी-शाह से विराट विजय

स्मृति ईरानी को यदि अमेठी की आयरन लैडी कहा जा रहा है, तो उसके पीछे कारण यह है कि अमेठी लोकसभा सीट 1957 में अस्तित्व में आने के बाद से ही कांग्रेस का गढ़ रही। पहली बार यहाँ गांधी परिवार की एंट्री 1977 में हुई, जब इंदिरा विरोधी लहर के बीच कांग्रेस ने अमेठी को बचाने के लिए संजय गांधी को मैदान में उतारा, परंतु संजय गांधी को जनता पार्टी ने हरा दिया। यद्यपि इसके बाद 1980 से 2014 तक अमेठी गांधी परिवार के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। संजय गांधी के बाद राजीव गांधी और सोनिया गांधी भी यहाँ से जीते। बीच-बीच में जब गांधी परिवार नदारद रहा, तब भी अमेठी की जनता ने कांग्रेस को जिताया, तो कभी भाजपा को भी गांधी परिवार की अनुपस्थिति का फायदा हुआ, परंतु स्मृति ईरानी की अमेठी से विराट विजय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की देशव्यापी और वाराणसी-गांधीनगर से हुई जीत की धमक पर भारी मानी जा रही है, क्योंकि देश में मोदी की सुनामी और शाह की रणनीति के आगे विरोधी पस्त हुए, तो वाराणसी में मोदी और गांधीनगर में शाह का मुकाबला कोई दिग्गज नेता से नहीं था। इन सबके विपरीत अमेठी में स्मृति का मुकाबला न केवल गांधी परिवार से अपितु 2004 से सांसद चुने जा रहे राहुल गांधी से और अपरोक्ष रूप से स्मृति को टक्कर दे रहीं प्रियंका गांधी वाड्रा से था। इतनी कड़ी चुनौती के बावजूद यदि स्मृति ईरानी विजयी रहीं, तो निश्चित रूप से वे अमेठी की आयरन लैडी कहलाने की अधिकारी हैं।

पहले ‘कंधे’ से ही मिला लिया कंधा

पिछले 11 वर्षों से राज्यसभा सदस्य, पाँच वर्षों से केन्द्रीय मंत्री के रूप में भी अमेठी से जुड़े रहने के बाद स्मृति ईरानी अपनी 13 वर्षों की राजनीतिक यात्रा में पहली बार जनता के मतों से निर्वाचित सांसद बनीं। स्मृति ईरानी ने अभी तो सांसद के रूप में अपनी शपथ भी नहीं ली थी, उससे पहले ही उनके समक्ष अमेठी के लिए एक ऐसा दायित्व निभाने का कर्तव्य आन पड़ा, जो उनके हृदय को भारी कर गया। स्मृति की जीत और कांग्रेस-राहुल की हार से हतोत्साहित या किसी भी कारणवश एक सामान्य भाजपा नेता की हत्या कर दी गई। स्मृति को जिताने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले सुरेन्द्र सिंह की गोली मार कर हत्या कर दी गई। अमेठी में मतदान के बाद दिल्ली पहुँच चुकीं स्मृति ईरानी अपने निकटस्थ नेता सुरेन्द्र सिंह की हत्या की ख़बर सुनते ही अमेठी दौड़ आईं। स्मृति एक आम नेता या नवनिर्वाचित सांसद के रूप में अपने क़रीबी सुरेंद्र सिंह की अंतिम क्रिया में ही शामिल होकर खाना-पूर्ति कर सकती थीं, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। स्मृति ने न केवल अंतिम संस्कार में भाग लिया, अपितु सुरेन्द्र की अर्थी को कंधा देकर अमेठी के प्रति अपने प्रथम कर्तव्य का निर्वहन करके यह संदेश भी दिया कि अमेठी से उनका नाता अब केवल पाँच वर्षों तक नहीं, अपितु वर्षों तक जुड़ा रहेगा। सुरेन्द्र सिंह की अर्थी को पहला कंधा देकर स्मृति ने स्पष्ट संदेश दिया कि वे अमेठी के हर सुख-दुःख में अमेठी के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ी रहेंगी।

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