‘डर’ का बढ़ता कारोबार

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Business of fear

डरना जरूरी है…चैन से सोना है तो जाग जाओ…डर के आगे जीत है..डरना मना है..ये सभी लाइनें या तो किसी फिल्म की है, टीवी शो की हैं या फिर किसी प्रोडक्ट की टैग लाइन है। लेकिन इन सभी में एक बात कॉमन है और वो ये कि सभी टैगलाइन डर को एक तरह से प्रमोट कर रही हैं। दरअसल हमारे आस-पास डर की एक काल्पनिक दुनिया बनाई जा रही है। हम में खौफ पैदा किया जा रहा है और इसी का असर है कि हम खौफजदा भी हो रहे हैं। हालात ये हो गए हैं कि डर की यह काल्पनिक दुनिया हमारी असली जिंदगी पर पूरी तरह से हावी हो गई है।

डर का बाजार गर्म है

आखिर डर का कारोबार इतनी तेजी से क्यों फल-फूल रहा है, इसके लिए नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट पर गौर करने की जरूरत है।NCRB की 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक रेप के 95 फीसदी मामलों में आरोपी अपना परिचित होता है। रेप का 27 फीसदी आरोपी हमारा पड़ोसी होता है। शादी का झूठा वादा कर 22 फीसदी युवतियों के साथ रेप किया जाता है। 10 फीसदी रेप आरोपी तो ब्लड रिलेशन वाले होते हैं। जिनके साथ हम दफ्तर में काम करते हैं उनमें से 2 फीसदी रेपिस्ट होते है। कुल मिलाकर रेप के 30 फीसदी मामलों में अपराधी जानने वाला होता है।

भरोसा टूटने की वजह से डर का कारोबार फैल रहा है

इसका सीधा मतलब है कि क्राइम का नेचर बदल रहा है। अपने बच्चों को हम अपने परिचित, रिश्तेदार, पड़ोसी के घर नहीं छोड़ना चाहते हैं और छोड़ते भी नहीं हैं। दफ्तर से निकलने के बाद महिलाएं अपने ऑफिस के दोस्तों के साथ सफर करने से डरती हैं। यहां तक कि अपने घर में अकेले होने से भी हम डरते हैं जबकि बगल के घर या फ्लैट में पूरा परिवार रहता है। क्राइम का नेचर इस हद तक बदल चुका है कि जो हमें गुड मॉर्निंग या गुड इवनिंग विश करता है उससे भी हम डरते हैं या यकीन नहीं करते हैं।

Crime का नेचर बदल चुका है

कुल मिलाकर डर और क्राइम का नेचर बदला है। क्राइम का स्पॉट भी बदल रहा है। क्राइम का Suspect  और Accused भी बदल रहा है। रिश्तेदार (चाचा, मामा, चचेरा/ममेरा-भाई, दोस्त, ऑफिस के दोस्त) मानकर जिन पर पहले हम यकीन करते थे उन्हें आज हम शक की नजरों से देखने लगे हैं। आज की तारीख में हम ज्यादातर जगहों पर खुद को असुरक्षित मानने लगे हैं यही वजह है कि डर का कारोबार इतनी तेजी से फैल रहा है।

डर का सालाना निजी कारोबार 50 हजार करोड़ का

सार्वजनिक स्थानों पर लाइटिंग की पहले से बेहतर व्यवस्था और ट्रैवल के साधनों के अपेक्षाकृत सुरक्षित होने की वजह से भी अपराध के पैटर्न बदले हैं। गौर करने वाली बात है कि अब इस डर  को कारोबार का शक्ल दे दी गई है। आज की तारीख में डर का कारोबार हजारों करोड़ों तक पहुंच चुका है। FICCI की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सुरक्षा का निजी कारोबार (डर का कारोबार) सालाना करीब 50 हजार करोड़ रुपए का है। रिपोर्ट के मुताबिक 2022 तक यह कारोबार करीब 1 लाख करोड़ तक पहुंच जाएगा। हालांकि डर के कारोबार से लाखों लोगों को नौकरी जरूर मिली है और अगले 5 सालों में डर के इस कारोबार से करीब 50 लाख लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है। रोजगार के लिहाज से यह दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र बन सकता है। एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में भारत में सुरक्षा गैजेट्स मसलन CCTV कैमरा, बायोमैट्रिक सिस्टम का कारोबार करीब 8 हजार करोड़ रुपए का था। 2020 तक यह कारोबार करीब 18 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच जाने की उम्मीद है।

हम जितना डर रहे हैं, कारोबार फैलता जा रहा है

ऐसे में बड़ा सवाल उठता है कि हम इतने डरे हुए क्यों हैं ?हम किससे डर रहे हैं और क्या पुलिस-प्रशासन आंतरिक सुरक्षा देने में नाकाम हो चुकी है ? अपने आसपास हो रही घटनाओं पर गौर करेंगे तो पता चलता है कि हम अपनों से ज्यादा डरे हुए हैं। दरअसल डर के मायने बदल गए हैं। अपराध की विविधताओं को देखने और सुनने के बाद हमारा लोगों पर भरोसा डिगा है। हम जितने डर रहे हैं, डर का दायरा भी उतना बढ़ता चला जा रहा है।

बेडरूम तक पहुंचा CCTV

पहले हमने अपनी सोसायटी की गेट पर गार्ड लगाया। फिर सोसायटी के भीतर सीढ़ियों और बालकनी में CCTV कैमरे लगाए। लेकिन हमारा डर लगातार बढ़ता गया और हमने अपने घरों के भीतर CCTV कैमरे लगा दिए। हम और डरने लगे। फिर हमने ऐसा हाइटेक CCTV कैमरा लगवाया जिसके जरिए हम अपने फोन पर भी देख सकते हैं कि घर में क्या हो रहा है। यह चलन लगातार बढ़ता ही जा रहा है और साथ-साथ डर का कारोबार भी।

 

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