क्या SOCIAL MEDIA पर FAKE और HATE सामग्री पर अंकुश लगा सकता है आधार ?

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 20 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। अब देश में एक नई बहस छिड़ गई है। यह बहस सोशल मीडिया प्रोफाइल्स को आधार नंबर से लिंक करने को लेकर है। सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि फेक और नफरत फैलाने वाली सामग्री को वायरल करने वाले का पता लगाने के लिये उसके पास कोई विकल्प नहीं है, ऐसे में सोशल मीडिया प्रोफाइल्स को आधार से लिंक करना जरूरी है, तमिलनाडु सरकार ने भी इसे जरूरी बताया है, जबकि फेसबुक और व्हॉट्सएप ने इसकी खिलाफत की है। उनका कहना है कि एक देश में दो कानून नहीं हो सकते। चूँकि आधार बैंक अकाउंट्स से लेकर कई महत्वपूर्ण चीजों से लिंक्ड है, इसलिये सोशल मीडिया प्रोफाइल्स से आधार को जोड़ना लोगों की प्राइवेसी के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुँच चुका है और सुप्रीम कोर्ट ने फेसबुक की याचिका सुनवाई के लिये स्वीकार कर ली है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में केन्द्र सरकार तथा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर, गूगल और यूट्यूब को नोटिस जारी किया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ई-मेल के माध्यम से नोटिस भेजा जाएगा तथा इस मामले की अगली सुनवाई 13 सितंबर को की जाएगी।

क्या है पूरा मामला ?

दरअसल सोशल मीडिया प्रोफाइल्स को आधार से लिंक करने के मामले में मद्रास हाईकोर्ट, बोम्बे हाईकोर्ट तथा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में मामले लंबित हैं। मद्रास हाईकोर्ट में दो और बोम्बे तथा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एक-एक मामला लंबित है। फेसबुक की ओर से देश भर के उच्च न्यायालयों में लंबित पड़ी याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करने को लेकर याचिका दायर की गई थी। फेसबुक की ओर से प्रस्तुत हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने केरल हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एक देश में दो कानून नहीं हो सकते। मुकुल रोहतगी ने सरकार की ओर से प्रस्तावित संशोधन बिल और सरकार की मंशा पर भी सवाल उठाये। व्हॉट्सएप की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी। उन्होंने कहा कि मुख्य मामला तो व्हॉट्सएप से जुड़ा है। यह सारे मामले सरकार की नीति से सम्बंधित हैं, इसलिये इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और इनके रिफॉर्म्स से जुड़े मामलों को सुप्रीम कोर्ट अपने यहाँ ट्रांसफर करके उन पर सुनवाई करे, क्योंकि यह पूरे देश की जनता की निजता से जुड़ा है। फेसबुक और व्हॉट्सएप दोनों की ओर से कहा गया कि हमें कई कानूनों को देखना पड़ता है, क्योंकि करोड़ों यूज़र्स अपने-अपने हिसाब से इन प्लेटफॉर्म्स को यूज़ करते हैं। व्हॉट्सएप की ओर से कहा गया है कि मद्रास हाईकोर्ट में केन्द्र सरकार की ओर से हलफनामा दायर करके कहा गया है कि वह इस मामले को देख रही है और जल्दी ही गाइडलाइन जारी करेगी। कपिल सिब्बल ने कहा कि केन्द्र सरकार की पॉलिसी से सम्बंधित मामले को हाईकोर्ट कैसे तय कर सकता है ? यह तो संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसीलिये सभी मामलों को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर किया जाए और सुप्रीम कोर्ट इन मामलों की सुनवाई करके निपटारा करे।

केन्द्र सरकार की दलील

केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल पेश हुए, उन्होंने कहा कि सरकार के पास ऐसा कोई मैकेनिज्म नहीं है, जिससे मैसेज या पोस्ट की शुरुआत करने वाले का पता लगाया जा सके। विशेषकर आपराधिक प्रवृत्ति वाले पोस्ट्स के मामले में। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किन शर्तों पर जानकारी साझा की जाए, यह सवाल भी कोर्ट के सामने है। क्रिमिनल मामले में कई प्रोसीज़र हैं, जिनसे अपराधी तक पहुँचा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करना स्वीकार किया है, परंतु फिलहाल कोई भी अंतरिम फैसला देने से इनकार किया। सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु सरकार की ओर से भी कहा गया है कि सभी सोशल मीडिया प्रोफाइल को आधार नंबर से लिंक करना जरूरी है, जिससे फेक और नफरत फैलाने वाले लोगों की पहचान की जा सके। इससे देश विरोधी और आतंकी सामग्री को भी पहचाना जा सकेगा।

इन सवालों को लेकर छिड़ी बहस

सवाल यह उठता है कि सोशल मीडिया प्रोफाइल्स को आधार से लिंक करना कितना उचित होगा ? क्योंकि पहले ही सरकार रसोई गैस सिलिण्डर, बैंक अकाउंट्स तथा इनकम टैक्स सहित विभिन्न चीजों को आधार से लिंक्ड कर चुकी है। ऐसे में आधार नंबर को सोशल मीडिया प्रोफाइल्स के साथ लिंक करने से लोगों की निजी जानकारियाँ जाहिर हो सकती हैं। स्वयं केन्द्र सरकार यह नियम लागू कर चुकी है कि लोगों की निजी जानकारियाँ साझा नहीं की जा सकती हैं। ऐसे में सरकार सोशल मीडिया प्रोफाइल्स को आधार से लिंक करने की माँग करके अपने ही नियमों का उल्लंघन तो नहीं कर रही है और क्या ऐसा कदम उठाना लाखों-करोड़ों लोगों की निजता के साथ खिलवाड़ करने के समान तो नहीं होगा ? सवाल यह भी है कि क्या सरकार फेक और नफरत फैलाने वाले या देश विरोधी और आतंकी प्रवृत्तियों वाले पोस्ट की पहचान के लिये किसी अन्य विकल्प पर विचार नहीं कर सकती है ?

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