पहल अच्छी या बुरी ? छात्रों के ‘सोशल मीडिया’ पर मोदी सरकार की निगरानी !

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अहमदाबाद, 7 जुलाई 2019 (YUVAPRESS)। केन्द्र सरकार ने देश के सभी 3 करोड़ कॉलेजियन छात्रों के सोशल मीडिया अकाउंट्स ट्वीटर हैंडल, फेसबुक, इंस्ट्राग्राम आदि पर नज़र रखना शुरू किया है।एक रिपोर्ट के अनुसार देश की सभी लगभग 900 यूनिवर्सिटीज़ और उनसे संलग्न 40 हजार कॉलेजों के लगभग 3 करोड़ छात्रों के सभी सोशल मीडिया अकाउंट्स को केन्द्र सरकार ने उच्च शैक्षणिक संस्थानों और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के विविध सरकारी संगठनों के सोशल मीडिया अकाउंट्स से जोड़ने के लिये कहा है।

उच्च शैक्षणिक संस्थानों को लिखा गया पत्र

इस बारे में डिपार्टमेंट ऑफ हायर एजुकेशन के सचिव आर. सुब्रमण्यम की ओर से देश के सभी उच्च शैक्षणिक संस्थानों के प्रमुखों को एक पत्र लिखा गया है, जिसमें उनके सभी छात्रों के सोशल मीडिया अकाउंट्स उनके अपने संस्थान तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय से जुड़े विविध संगठनों के अकाउंट्स से कनेक्ट करने को कहा गया है। ऐसा करने से छात्रों के सोशल मीडिया अकाउंट्स की गतिविधियों पर सरकार की कड़ी निगरानी रहेगी और जो छात्र सरकार विरोधी या देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त पाए जाएँगे उनके विरुद्ध सरकार कड़े कदम भी उठा सकेगी। हालाँकि ऐसा करने के पीछे सरकार की मंशा गलत नहीं है, सरकार की मंशा है कि छात्रों को गलत राह पर जाने से रोका जा सके। दरअसल सरकार का मानना है कि कुछ संगठन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से भोले-भाले छात्रों को अपने जाल में फँसाते हैं और उनके माध्यम से अपनी सरकार विरोधी और देश विरोधी साजिशों को अन्य लोगों तक प्रचारित करते हैं या फैलाते हैं।

जेएनयू-एएमयू में हो चुकी हैं देश विरोधी गतिविधियाँ

कुछ समय पहले दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) और अलीगढ़ उत्तर प्रदेश की अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से सरकार विरोधी और देश विरोधी गतिविधियों की खबरें आ चुकी हैं। कन्हैया कुमार पर जेएनयू में सरकार विरोधी नारे लगाने को लेकर देशद्रोह का मुकदमा चल रहा है और अलीगढ़ की मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ा एक छात्र जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी बन गया था, जो मुठभेड़ में मारा गया। यह घटनाएँ दर्शाती हैं कि देश में कॉलेजियन छात्रों को सरकार के विरुद्ध बरगलाने और गुमराह करने के प्रयास किये जाते हैं। इसलिये सरकार ने देश के सभी कॉलेजियन छात्रों के सोशल मीडिया अकाउंट ट्वीटर हैंडल, फेसबुक, इंस्ट्राग्राम आदि पर नज़र रखना शुरू किया है।

सरकार के कदम से शिक्षाविदों में नाराज़गी

सरकार के इस कदम का कुछ शिक्षाविदों की ओर से विरोध किया जा रहा है। शिक्षाविदों ने सरकार के इस कदम पर चिंता जताते हुए कहा है कि सरकार की इस पहल में कुछ बहुत खतरनाक डिजाइन नज़र आती है। उन्हें डर है कि कहीं छात्र-छात्राओं के सोशल मीडिया अकाउंट्स से ली गई जानकारी का दुरुपयोग न हो। एक यूनिवर्सिटी के एक शिक्षक का कहना है कि उनके एक स्टूडेंट्स को फैकल्टी के पद के लिये आयोजित हुए इंटरव्यू के बाद सिर्फ इसलिये रिजेक्ट कर दिया गया क्योंकि छात्र के सोशल मीडिया पोस्ट सरकार विरोधी थे।

अच्छे कामों के लिये सरकार ने उठाया कदम

दूसरी तरफ एक अखबार में छपी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सरकार का यह कदम उठाने के पीछे छात्रों से सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़कर उनके तथा संस्थान के अच्छे कामों की जानकारी प्रचारित और प्रसारित करना है। इससे छात्रों व संस्थानों की उपलब्धियों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाना है। वहीं इसके तहत हर संस्थान एक टीचर या नॉन टीचिंग स्टाफ को सोशल मीडिया चैंपियन या एसएमसी का दर्जा दे सकता है। यह एसएमसी बाकी सभी संस्थानों और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के संपर्क में रहेगा तथा समय-समय पर अपने छात्रों और संस्थान के अच्छे कामों को शेयर करेगा। इस सोशल मीडिया चैंपियन की टू डू लिस्ट भी बनाई गई है।

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