सावधान ! 149 वर्षों के बाद पहली बार होने जा रहा है ऐसा चंद्र ग्रहण कि…

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अहमदाबाद, 13 जुलाई 2019 (युवाPRESS)। अषाढ़ माह की पूर्णिमा यानी गुरु पूर्णिमा के दिन ही 16 जुलाई मंगलवार को खंडग्रास चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है। ऐसा संयोग 149 साल बाद होने जा रहा है, जब गुरु पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहण लगेगा। इससे पहले 1870 में ऐसा हुआ था, जब गुरु पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहण लगा था। इस प्रकार इस गुरु पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण का साया पड़ेगा। कई राशियों के जातकों पर भी खंडग्रास चंद्र ग्रहण का गहरा प्रभाव पड़ने वाला है।

मंगलवार शाम 4.30 बजे से ही लग जाएगा सूतक

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य ग्रहण के समय सूतक काल ग्रहण प्रारंभ होने से 12 घण्टे पहले से लग जाता है, जबकि चंद्र ग्रहण के समय सूतक काल ग्रहण प्रारंभ होने से 9 घण्टे पहले लग जाता है। चूँकि चंद्र ग्रहण मंगलवार देर रात्रि 1.31 बजे से शुरू होगा, इसलिये सूतक काल 9 घण्टे पहले यानी शाम 4.30 बजे से प्रारंभ हो जाएगा। चंद्र का ग्रहण से मोक्ष होने तक सूतक काल लागू रहता है। इस दौरान स्नानादि नहीं करना चाहिये और भोजन तथा पानी भी ग्रहण नहीं करना चाहिये। सूतक काल में कोई शुभ कार्य भी नहीं करना चाहिये और ग्रहण को खुली आँखों से भी नहीं देखना चाहिये। ग्रहण के दौरान मंत्रोच्चारण करना हितकर होता है।

इस चंद्र ग्रहण के समय राहु और शनि चंद्रमा के साथ धनु राशि में स्थित होंगे। ग्रहों की ऐसी चाल के कारण इस ग्रहण का प्रभाव और अधिक असरकारक हो जाता है। ऐसा इसलिये भी है क्योंकि राहु और शुक्र सूर्य के साथ होंगे तथा सूर्य चार विपरीत ग्रह शुक्र, शनि, राहु व केतु के घेरे में रहेंगे। इस स्थिति में मंगल नीच का हो जाएगा, जिससे ग्रहण के समय ग्रहों की यह स्थिति तनाव बढ़ाने वाली सिद्ध हो सकती है। इस दौरान प्राकृतिक आपदाओं का भी सामना करना पड़ सकता है।

ग्रहण का राशियों पर भी असर देखने को मिलेगा। मेष, सिंह, वृश्चिक और मीन राशि पर ग्रहण का अच्छा असर पड़ेगा। वृषभ, कर्क, धनु एवं कन्या राशियों पर चंद्र ग्रहण का मिश्रित प्रभाव पड़ेगा और मिथुन, तुला, मकर तथा कुंभ राशि पर चंद्र ग्रहण का बुरा प्रभाव पड़ने की आशंका है।

वैदिक शास्त्रों के अनुसार राहु-केतु हैं ग्रहण की वजह

ज्योतिष शास्त्र के बाद यदि भारतीय वैदिक शास्त्रों की बात करें तो सूर्य और चंद्र पर लगने वाले ग्रहण का समुद्र मंथन की घटना से संबंध मिलता है। समुद्र मंथन के बाद समुद्र से निकले अमृत कलश को जब राक्षस देवताओं से बलपूर्वक छीन लेते हैं, तब भगवान विष्णु मोहिनी रूप धारण करके राक्षसों को लुभाते हैं और चतुराई से अमृत कलश प्राप्त करके देवताओं को अमृत पान कराते हैं, तभी राहु नामक एक राक्षस भेष बदलकर देवताओं की पंक्ति में बैठ जाता है और अमृत पान कर लेता है। सूर्य और चंद्र देव इस राक्षस को पहचान लेते हैं और भगवान को संकेत दे देते हैं। संकेत मिलते ही भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र से इस राक्षस का सिर धड़ से अलग कर देते हैं। चूँकि वह अमृत पान कर चुका होता है, इसलिये उसका वध नहीं होता है और वही सिर राहु तथा धड़ केतु के नाम से पीड़ादायक ग्रहों के रूप में ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं। चूँकि सूर्य और चंद्र के कारण उसकी यह दशा हुई, इसलिये जब राहु और केतु सूर्य तथा चंद्र को पीड़ा देने के लिये उनका ग्रास कर लेते हैं तो उस स्थिति को सूर्य तथा चंद्र पर ग्रहण लगना कहते हैं।

भारत में दिखेगा चंद्र ग्रहण

अब विज्ञान की दृष्टि से भी इस ग्रहण को देखते हैं। विज्ञान के अनुसार सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण एक खगोलीय घटना है और जब सूर्य, चंद्र तथा पृथ्वी एक सीधी रेखा में आ जाते हैं तब ग्रहण की खगोलीय घटना देखने को मिलती है। जब सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्र आ जाता है तो सूर्य ग्रहण होता है और जब सूर्य व चंद्र के बीच में पृथ्वी आ जाती है तो चंद्र ग्रहण की घटना होती है। चंद्रमा पृथ्वी की ओट में छुप जाता है और जब ओट से निकलता है तो चंद्र ग्रहण होता है। यह ग्रहण भारत में दिखाई देगा और भारत के अलावा एशिया, यूरोप, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका में भी देखा जा सकेगा।

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