दो बाहूबलियों के पीछे कौन है यह ‘महाबली’, जो 1300 वर्षों से अडिग-अचल है ?

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रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 12 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। तमिलनाडु के प्राचीन शहर महाबलिपुरम् में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक विशालकाय चट्टान के सान्निध्य में खिंचवाई गई तसवीर तेजी से वायरल हो रही है और साथ ही लोगों के मन में यह प्रश्न भी खड़ा हो रहा है कि दो शक्तिशाली और बाहुबली नेताओं के पीछे यह विशालकाय महाबली समान चट्टान क्या है और कौन है ? यह गोलाकार (गेंदाकार) चट्टान जिस स्थिति में खड़ी है, उसे देख कर कोई भी साधारण व्यक्ति इसके साये तले खड़े रहने का रिस्क नहीं ले सकता, परंतु मोदी-जिनपिंग ने तो यह रिस्क लिया। वास्तव में यह चट्टान 1300 वर्षों से खड़ी है। भूकंप, चक्रवात, आंधी-तूफान, गर्मी की लू के थपेड़े, ठंड की शीत लहर से लेकर सुनामी तक इस चट्टान का कुछ नहीं बिगाड़ सकी और यह स्थिर रही।

महाबलिपुरम् में एशिया के दो शेरों प्रधानममंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जिस चट्टान के समक्ष तसवीर खिंचवाई, वह क्षेत्र अत्यंत रिस्की ज़ोन कहलाता है। वास्तव में इस पत्थर का वज़न लगभग 250 टन है और इसे आकाशीय-ईश्वरीय पत्थर भी कहा जाता है, तो कुछ श्रद्धालुओं का कहना है कि यह भगवान श्री कृष्ण द्वारा चुराए गए मक्खन का ढेर है, जो सूख कर चट्टान में बदल गया है। इसीलिए इस पत्थर को कृष्ण बटर बॉल (KBB) यानी कृष्ण मक्खन गेंद भी कहा जाता है।

अविचल, अडिग और स्थिर है यह चट्टान

आश्चर्य की बात यह है कि यह पत्थर करीब 45 डिग्री के स्लोप पर पिछले 1300 वर्षों से महाबलिपुरम् में खड़ा है। इस पत्थर को इस स्थान से हटाने के लिए कई मानवीय प्रयास किए गए, परंतु सारे विफल रहे। इस पत्थर के तमिलनाडु में वानिराई काल यानी आकाश के भगवान का पत्थर भी कहा जाता है, जो एक पहाड़ी पर है। 20 फीट ऊँचे और 5 मीटर चौड़े पत्थर का वज़न 250 टन है। इसकी धुरि बहुत ही छोटी है, जिसके कारण इसे देख कर ऐसा लगता है कि यह चट्टान कभी भी लुढ़क जाएगी, परंतु पिछले 1300 वर्षों में ऐसा कभी नहीं हुआ। कहते हैं कि इस पत्थर पर गुरुत्वाकर्षण का भी कोई प्रभाव नहीं है। स्थानीय लोगों की आस्था है कि यह पत्थर स्वयं भगवान ने महाबलिपुरम् में रखा, जबकि वैज्ञानिक कहते हैं कि यह चट्टान अपने प्राकृतिक स्वरूप में है। भू-वैज्ञानिकों की राय में प्राकृतिक बदलाव के कारण इस असाधारण पत्थर की उत्पत्ति हुई। हिन्दू श्रद्धालुओं का मानना है कि गवान कृष्‍ण अकसर अपनी मां के मटके से माखन चुरा लेते थे और यह प्राकृतिक पत्‍थर दरअसल, श्रीकृष्‍ण द्वारा चुराए गए मक्‍खन का ढेर है जो सूख गया है। कृष्‍णा बॉल को देखकर ऐसा लगता है कि यह कभी भी गिर सकता है लेकिन इस पत्‍थर को हटाने के लिए पिछले 1300 साल में कई प्रयास किए गए लेकिन सभी विफल रहे। पहली बार वर्ष 630 से 668 के बीच दक्षिण भारत पर शासन करने वाले पल्‍लव शासक नरसिंह वर्मन ने इसे हटवाने का प्रयास किया। उनका मानना था कि यह पत्‍थर स्‍वर्ग से गिरा है, इसलिए मूर्तिकार इसे छू न सकें। पल्‍लव शासक का यह प्रयास विफल रहा।

सात हाथी भी हो जाएँ फेल, मोदी-जिनपिंग को मिलेगा गेन ?

वर्ष 1908 में ब्रिटिश शासन के दौरान मद्रास के गवर्नर आर्थर लावले ने इसे हटाने का प्रयास शुरू किया। लावले को डर था कि अगर यह विशालकाय पत्‍थर लुढ़कते हुए कस्‍बे तक पहुंच गया तो कई लोगों की जान जा सकती है। इससे निपटने के लिए गवर्नर लावले ने सात हाथियों की मदद से इसे हटाने का प्रयास शुरू किया लेकिन कड़ी मशक्‍कत के बाद भी यह पत्‍थर टस से मस नहीं हुआ। आखिरकार गवर्नर लावले को अपनी हार माननी पड़ी। अब यह पत्‍थर स्‍थानीय लोगों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। वर्तमान समय में विज्ञान के इतना प्रगति करने के बाद भी अब तक यह पता नहीं चल पाया है कि 4 फीट के बेस पर यह 250 टन का पत्‍थर कैसे टिका हुआ है। कुछ लोगों का यह दावा है कि पत्‍थर के न लुढ़कने की वजह घर्षण और गुरुत्‍वाकर्षण है। उनका कहना है कि घर्षण जहां इस पत्‍थर को नीचे फिसलने से रोक रहा है, वहीं गुरुत्‍कार्षण का केंद्र इस पत्‍थर को 4 फीट के बेस पर टिके रहने में मदद कर रहा है। इतिहास को पसंद करने वाले चीनी राष्‍ट्रपति को पीएम मोदी ने कृष्‍णा बटर बॉल दिखाकर दोनों देशों के बीच रिश्‍ते में इस विशालकाय पत्‍थर की तरह मजबूती लाने की भरपूर कोशिश की।

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