बिगड़ी बात बनाने में जुटी है पुलिस : डाकुओं का खात्मा करने के लिये वनवासियों पर दमन का लगा है दाग़

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अहमदाबाद, 30 जून 2019 (युवाप्रेस डॉट कॉम) । आम तौर पर सभी आर्म्स फोर्सेज़ के लिये देश के नागरिकों के दिल में सम्मान की भावना है । एक मात्र पुलिस ही ऐसी फोर्स है, जिसके लिये नागरिकों में अलग-अलग मत है । रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और दमनकारी रवैये के कारण आम लोगों में पुलिस की छवि बिगड़ी हुई है । इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि इस फोर्सेज के देश भक्ति के जज्बे में कोई कमी है । आवश्यकता पड़ने पर इस फोर्स के जवानों ने भी प्राणों की आहुति देने में कमी नहीं छोड़ी है । मुंबई में 26/11 के आतंकी हमले के दौरान पुलिस के जवानों ने ही नहीं अपितु हेमंत करकरे सहित वरिष्ठ अधिकारियों की प्राणों की आहुति को कौन भूल सकता है ? हालाँकि हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश की चित्रकूट पुलिस की।

मिनी चंबल में डकैतों का सफाया कर रही पुलिस

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में मिनी चंबल घाटी के नाम से पहचाने जाने वाले चित्रकूट जिले का पाठा जंगल डाकुओं के लिये कुख्यात है । एक समय था जब यह जंगल डाकुओं के लिये सुरक्षित अभयारण्य माना जाता था । कुख्यात इनामी डाकू ददुआ उर्फ शिवकुमार कुर्मी का इस इलाके में 3 दशक तक दबदबा रहा । 2007 में जिला पुलिस के स्पेशल टास्क फोर्स (STF) के साथ मुठभेड़ में ददुआ अपने गिरोह के 13 साथियों के साथ मारा गया । ददुआ की मौत के बाद ठोकिया, रागिया, बलखड़िया जैसे डाकू पुलिस के लिये चुनौती बने । हालाँकि यह डकैत भी गैंगवॉर में या पुलिस के हाथों मारे गये । उनके कुछ साथी पकड़े गये और कुछ ने मारे जाने के डर से पुलिस के समक्ष समर्पण कर दिया । अब इस पाठा के जंगल में एक मात्र इनामी डाकू बबली कोल ही बचा है, जिसके पीछे पुलिस पड़ी हुई है । इस डकैत पर साढ़े छह लाख रुपये का इनाम है ।

पुलिस पर लगे फर्जी मुकदमे दर्ज करके दमन करने के आरोप

पुलिस की ओर से चलाए जा रहे डाकुओं के खिलाफ अभियान के दौरान चित्रकूट पुलिस पर कोल समुदाय के वनवासियों पर दमन करने और उन्हें इनामी डकैत बबली कोल को संरक्षण देने के नाम पर फर्जी मुकदमे दर्ज करके जेल भेजने के आरोप लगते रहे हैं । हालाँकि अब पुलिस ने अपनी छवि बदलने का भी अभियान शुरू कर दिया है । पुलिस के प्रयासों से यहाँ स्थितियों में बदलाव भी हुआ है । पुलिस वनवासी समुदाय को यह विश्वास दिलाने में जुटी है कि पुलिस उनकी शत्रु नहीं, अपितु मित्र है । इसी कड़ी में पुलिस ने पाठा के जंगलों में वनवासियों के बच्चों को शिक्षा देने के लिये पाठशाला शुरू की है । पुलिस के इस शिक्षा अभियान को ‘पाठा की पाठशाला’ के नाम से पहचाना जा रहा है । वनवासियों के बच्चों का जो बचपन जंगल में बकरियाँ चराने में बीतता था, वह बचपन अब पुलिस के प्रयासों से पाठशालाओं में बीत रहा है और बच्चे क, ख, ग सीखने की कोशिश कर रहे हैं ।

अब पुलिस ने लगाई पाठा की पाठशाला

इस पहल के अगुआ जिले के पुलिस अधीक्षक मनोज झा के अनुसार बच्चों के दिमाग में यह बात बैठाना जरूरी है कि पुलिस केवल कड़ी कार्यवाही ही नहीं करती है, बल्कि रचनात्मक काम भी करती है । बच्चों का भविष्य शिक्षा से ही सुधारा जा सकता है । इसलिये एक ओर पुलिस पाठा के जंगल को डकैतों से मुक्त करने के अभियान में जुटी है, वहीं दूसरी ओर वनवासियों को उनके बच्चों को स्कूल भेजने के लिये प्रेरित करने का भी प्रयास कर रही है । इसके लिये डकैतों के प्रभाव वाले गाँवों को लक्ष्य बनाकर पाठा की पाठशाला का अभियान शुरू किया गया है । मानिकपुर के थानाधिकारी के. पी. दुबे को इस अभियान का प्रभारी बनाया गया है ।
उल्लेखनीय है कि चित्रकूट जिले के मानिकपुर और मारकुंडी थाना इलाके के घने जंगली क्षेत्र दस्यू प्रभावित माने जाते हैं और इस जंगली इलाके में वनवासियों के लगभग 60 गाँव हैं । इन सभी गाँवों में यह अभियान चलाया जाएगा । दो सप्ताह पहले ही शुरू हुआ यह अभियान पहली जुलाई तक चलेगा । इसके बाद अगले 15 दिन तक यह पता लगाया जाएगा कि जिन बच्चों को प्रेरित किया गया, उन पर अभियान का कितना प्रभाव पड़ा और वह स्कूल जा रहे हैं या नहीं । पुलिस इस अभियान को लेकर कितनी गंभीर है, इसका पता इस बात से चलता है कि पुलिस बच्चों को मुफ्त में कॉपी-किताबें और स्कूल बेग बाँट रही है । बच्चों के परिवारों को भी समझा रही है कि वह उनके बच्चों को स्कूल भेजें ।
पुलिस पर लग रहे दमनकारी रवैये के आरोपों के बारे में झा कहते हैं कि दस्यु उन्मूलन के दौरान संभव है कि कुछ वनवासियों के साथ ज्यादती हुई हो, परंतु अब ऐसा बिल्कुल नहीं है । सबसे बड़ी बात यह है कि जिन बच्चों के हाथ में कलम होनी चाहिये, वनवासी अभिभावक उनके हाथों में मवेशियों को हाँकने के लिये लाठी थमा रहे हैं, बाद में इन्हीं अशिक्षित बच्चों के हाथ में डकैत बंदूकें थमा देते हैं ।

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