PLAN B और कांग्रेस V/S भाजपा : ज़रूरत संगठन के लिए थी, बनाया जा रहा था सरकार के लिए !

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* भाजपा का ‘सांगठनिक’ प्लान B काम आया और उसके पास दो-दो अध्यक्ष हैं

* कांग्रेस का ‘सरकारी’ प्लान B व्यर्थ गया और उसके पास कोई अध्यक्ष नहीं है

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 8 जुलाई, 2019 (युवाप्रेस डॉट कॉम)। राजनीति में अक्सर दल और नेता प्लान बी भी तैयार रखते हैं। हमारे देश में भी जब लोकसभा चुनाव 2019 का महासंग्राम आरंभ हुआ, तब सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग-NDA) ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण विश्वास के साथ चुनाव लड़ा, तो दूसरी तरफ मुख्य विपक्ष कांग्रेस (CONGRESS) सहित सभी नॉन-बीजेपी और नॉन-एनडीए दल और नेता ‘मोदी हटाओ’ के एकसूत्री एजेंडा के साथ जनता के बीच गए। 23 मई, 2019 को जनादेश आ गया और नरेन्द्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बन चुके हैं।

यह तो विदित और लिखित इतिहास बन चुका है, परंतु हम बात करने जा रहे हैं लोकसभा चुनाव महासंग्राम के आरंभ यानी 6 मार्च, 2019 से लेकर जनादेश 2019 के दिन से एक दिन पहले यानी 22 मई, 2019 तक के कालखंड की। 6 मार्च से 22 मई की इस अवधि में जहाँ एक तरफ मोदी के नेतृत्व में भाजपा-एनडीए आत्म-विश्वास से परिपूर्ण था, वहीं देश की सबसे पुरानी और ऐतिहासिक पार्टी कांग्रेस को न अपने दम पर बहुमत लाने और न सबसे बड़े दल के रूप में उभरने का विश्वास था।

अब जहाँ तक PLAN B की बात है, तो चुनावों के दौरान एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट कहा था कि भाजपा 300 से अधिक सीटें मिलेंगी। ऐसे में सरकार बनाने के लिए प्लान बी, सी, ई आदि के बारे में वे सोचते ही नहीं हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस का पूरा चुनाव अभियान मोदी सरकार को पदच्युत करने पर तो केन्द्रित था, परंतु अपने दम पर कुछ भी कर गुज़रने का विश्वास न होने के कारण कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एक नहीं, अनेक प्लान बी के जंजालों में उलझे हुए थे। ये PLAN Bs मतदान पूर्ण होने यानी 18 मई के बाद और चुनाव परिणाम 23 मई से पहले के चार दिनों के दौरान तो पराकाष्ठा पर पहुँच गए। एक तरफ दिल्ली में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, ग़ुलाम नबी आज़ाद सरीखे बड़े नेता परिणाम से पहले बैठकें कर रहे थे, तो दूसरी तरफ चंद्रबाबू नायडू, मायावती, अखिलेश यादव जैसे नेता भी अलग-अलग तरह के प्लान बी के साथ सपनों की सरकार बनाने की कवायद में जुटे हुए थे। पूरा देश तमाशा देख रहा था इनकी नादानी का।

नेतृत्वहीन हो गया 133 वर्ष पुराना दल

छोटे-छोटे दलों की तो अपनी कोई राष्ट्रीय पहचान और प्रतिष्ठा नहीं है, परंतु राहुल गांधी के नेतृत्व वाली 133 वर्ष पुरानी राजनीतिक पार्टी को तो जनता परिपक्वता दिखानी चाहिए थी। इतने बड़े राजनीतिक दल को हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए था। अगर जनता का मूड परखने की राहुल में कुव्वत नहीं थी, कई बार राहुल अपरिपक्वता के कारण पार्टी को नुकसान पहुँचा चुके थे, तो ऐसे में उन्हें 23 मई को संभावित हार के बाद पैदा होने वाले हालात पर संगठन के लिए भी कोई प्लान बी बना कर रखना चाहिए था, परंतु ऐसा न राहुल ने किया और न ही उनके किसी सिपहसलार ने। आज राहुल गांधी हार का तथाकथित नैतिक उत्तरदायित्व लेते हुए त्यागपत्र दे चुके हैं और वापस नहीं लेने पर अड़े हुए हैं। ऐसे में 133 वर्ष पुरानी कांग्रेस पार्टी पहली बार नेतृत्वहीन बन गई है। राहुल नहीं, तो कौन ? इसका उत्तर न सोनिया गांधी के पास है, न राहुल गांधी के पास और न ही कांग्रेस पार्टी के बड़े-बड़े धुरंधर नेताओं के पास। कांग्रेस और राहुल गांधी को जो प्लान बी संगठन के लिए बनाना चाहिए था, वह प्लान बी वे लोग सरकार बनाने के लिए बना रहे थे। यदि 23 मई से पहले केवल जीत की आशा नहीं, अपितु हार की आशंका को भी ध्यान में रखा जाता, तो आज कांग्रेस पार्टी के पास राहुल का कोई न कोई विकल्प अवश्य होता। राहुल के त्यागपत्र देने की घोषणा के डेढ़ महीना से अधिक हो जाने और अधिकृत रूप से 3 जुलाई को त्यागपत्र दिए जाने के भी पाँच दिन गुज़र चुके हैं, परंतु संगठन के लिए कोई प्लान बी नहीं होने के कारण कांग्रेस आज अध्यक्ष विहीन पार्टी बन चुकी है।

सांगठनिक प्लान बी में माहिर निकली भाजपा

दूसरी तरफ भाजपा, नरेन्द्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह सांगठनिक प्लान बी में कांग्रेस से कई गुना अधिक माहिर निकले। मोदी और शाह को पूरा विश्वास था कि जनादेश 2019 उनके पक्ष में ही आएगा, परंतु भाजपा का सांगठनिक प्लान बी उस समय सबके सामने आ गया, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को शामिल कर लिया। आपको याद होगा कि जिस दिन से शाह के मोदी सरकार में शामिल होने के कयास शुरू हुए, उसी दिन से पार्टी अध्यक्ष के रूप में जे. पी. नड्डा का नाम भी सामने आने लगा। यह था भाजपा का प्लान बी। भाजपा, मोदी और शाह ने पहले से ही सोच कर रखा था कि नई सरकार में शाह को गृह मंत्री बनाया जाएगा और पार्टी सिद्धांत के अनुसार नया अध्यक्ष भी पहले से ही तय कर लिया गया था। यह भाजपा के प्लान बी का ही परिणाम है कि आज पार्टी के पास एक पूर्णकालिक अध्यक्ष और एक कार्यकारी अध्यक्ष यानी दो-दो अध्यक्ष हैं। राजनीतिक अनुभव के लिहाज़ से देखें, तो कांग्रेस 133 साल पुरानी पार्टी है, जबकि भाजपा मात्र 39 साल पुराना दल है। जब कांग्रेस छुटभैया दलों और नेताओं के साथ 23 मई के बाद नई सरकार बनाने के लिए प्लान बी बना रही थी, तब वास्तव में उसे संगठन के लिए भी कोई प्लान बी बनाना चाहिए था, परंतु इतनी राजनीतिक परिपक्वता न राहुल गांधी ने दिखाई और न ही उनके सिपहसलारों ने। दूसरी तरफ मोदी-शाह की रणनीति ऐसी सटीक रही कि सब कुछ उनकी अपेक्षा के अनुरूप सब कुछ हुआ और आज पार्टी के पास दो-दो अध्यक्ष हैं।

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