निर्भय मोदी को डराना चाहते थे ‘भाई-बहन’, राजनीतिक अपरिपक्वता ने करा दी किरकिरी !

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा। (फाइल चित्र)

जोश के साथ होश जरूरी : ‘राजनीतिक आत्महत्या’ पर आमादा प्रियंका में साहस था छह गुना लंबी छलांग लगाने का ?

रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस आज दो ऐसे चेहरों के भरोसे जीत का सपना देख रही है, जिनमें पारिवारिक विरासत में मिली राजनीति में अब भी अपरिपक्वता कूट-कूट कर भरी हुई है। एक चेहरा हैं राहुल गांधी, जिनकी आयु 48 वर्ष है और जिन्हें राजनीति में सक्रिय हुए पूरे 15 वर्ष हो चुके हैं। दूसरा चेहरा हैं प्रियंका गांधी वाड्रा, जिनकी आयु 47 वर्ष हो चुकी है। कांग्रेसी और देश के कई लोगों को प्रियंका में उनकी दादी इंदिरा गांधी की छवि दिखाई देती है, परंतु जो राजनीतिक कौशल इंदिरा के पास था, वह प्रियंका में नहीं दिखाई देता। इसीलिए तो 4 फरवरी, 2019 को ही कांग्रेस महासचिव बन कर राजनीति में प्रवेश करने वाली प्रियंका दो महीनों में ही इतना जोश में आ गईं कि पहला चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध लड़ने की हुंकार भरने लगी।

प्रियंका तो राजनीति में नई हैं, परंतु प्रश्न यह उठता है कि राहुल गांधी कब राजनीतिक रूप से परिपक्व होंगे ? जानकारों का मानना है कि प्रियंका का वाराणसी लोकसभा सीट से मोदी के विरुद्ध चुनाव लड़ने की बार-बार इच्छा व्यक्त किए जाना कांग्रेस, राहुल और स्वयं प्रियंका की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। विरोधियों के विरुद्ध एक सटीक रणनीति के साथ उतरने के बारे में सोचना बुरी बात नहीं है, परंतु इसी रणनीति में परिपक्वता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। दरअसल रणनीति यह थी कि वाराणसी से मोदी के विरुद्ध प्रियंका का नाम उछाल कर मोदी को भयभीत किया जाए, ताकि वे भी राहुल गांधी की तरह 2 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ें। यदि ऐसा होता, तो यह मोदी और भाजपा दोनों के लिए किरकिरी बन जाता है।

ख़ैर, अपनी निडरता, निर्भयता, स्पष्टवादिता, राजनीतिक कुशलता और दृढ़ निश्चय के लिए विख्यात नरेन्द्र मोदी और पूरी भाजपा ने प्रियंका के नाम उछाले जाने पर कोई घबराहट या बेचैनी नहीं दिखाई। प्रियंका का नाम बार-बार उछाले जाने के बावजूद न भाजपा ने, न अमित शाह ने और न ही मोदी ने ऐसे कोई संकेत दिए कि प्रधानमंत्री दो सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। इसमें भी जब मोदी गुरुवार को वाराणसी में विराट रोड शो करने के लिए पहुँचे, तो भाई-बहन की जोड़ी को रोड शो शुरू होने से पहले ही अपनी रणनीति के विफल रहने का अहसास हो गया। अभी तो मोदी का विराट रोड शो प्रारंभ भी नहीं हुआ था कि कांग्रेस ने घोषणा कर दी कि प्रियंका गांधी वाराणसी से चुनाव नहीं लड़ेंगी।

प्रियंका से अधिक बुद्धिमान तो केजरीवाल थे ?

प्रियंका गांधी जब से राजनीति में आई हैं, तब से वे मोदी के विरुद्ध आक्रमक हैं और इसी आक्रामक उन्माद में उन्होंने दो-तीन बार अपनी इच्छा व्यक्त कर दी कि यदि कांग्रेस और राहुल गांधी कहेंगे, तो वे वाराणसी से चुनाव लड़ने को तैयार हैं। यहीं प्रियंका से चूक हुई। वे वाराणसी के बारे में थोड़ा मंथन कर लेतीं, तो अपनी, भाई राहुल और कांग्रेस पार्टी तीनों को फज़ीहत से बचा सकती थीं। प्रियंका को सबसे पहले लोकसभा चुनाव 2014 के वाराणसी के परिणामों पर ग़ौर करना चाहिए था, जहाँ कांग्रेस के अजय सिंह को मात्र 75,614 मत मिले थे, जो कुल मतों का 16 प्रतिशत से कम था और उन्हें अपनी ज़मानत गँवानी पड़ी थी। चलिए मान लीजिए कि प्रियंका को यह लगा हो कि उनके आने से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जनाधार बढ़ेगा, तो भी यहाँ प्रियंका गणित थोड़ा कच्चा पड़ता, क्योंकि 2014 के हिसाब से देखा जाए, तो प्रियंका को वोट पाने के मामले में छह गुना लंबी छलांग लगानी पड़ती, तब जाकर वे मोदी को हरा पातीं, क्योंकि मोदी को 5,81,022 वोट मिले थे। प्रियंका को एक नज़र दूसरे नंबर पर रहे अरविंद केजरीवाल के बारे में भी सोचना चाहिए था। 2014 में मोदी के विरुद्ध अरविंद केजरीवाल स्वयं को सबसे मजबूत विकल्प मान रहे थे। इसीलिए उन्होंने वाराणसी से मोदी को चुनौती दी। यहाँ प्रियंका से ज्यादा बुद्धिशाली केजरीवाल सिद्ध होते हैं, क्योंकि 2014 में दिल्ली सहित देश के अनेक हिस्सों में केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी (आआपा-AAP) का बोलबाला था। इसी के दम पर केजरीवाल ने वाराणसी में मोदी को चुनौती दी और वे 2,09,238 वोट हासिल कर सम्मानजनक रूप से पराजित हुए। क्या प्रियंका यह मान रही थीं कि आज की तारीख में वाराणसी सहित पूरे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस इतनी शक्तिशाली हो गई है, जितनी कि 2014 में AAP थी ? वास्तव में भाई-बहन का प्लान मोदी को दूसरी सीट से भी लड़ाने का था, जो सफल होता नहीं दिखा, तो परिवार ने कदम पीछे खींच लिए और इसके साथ ही प्रियंका चुनावी सफर हार के साथ शुरू करने से बच गईं।

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