COUNTDOWN : सुप्रीम कोर्ट में निर्णायक पड़ाव पर पहुँचा अयोध्या ‘कांड’

Written by

*देश के सबसे बड़े न्यायालय में होगा भगवान राम के साथ न्याय ?

*16 अक्टूबर को ही समाप्त हो जाएगा दलीलों का सिलसिला ?

*CJI गोगोई सेवानिवृत्ति की तिथि 17 नवंबर से पहले सुनाएँगे निर्णय ?

विशेष टिप्पणी : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 15 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। अयोध्या में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद की ज़मीन को लेकर चल रहे 491 वर्ष पुराने विवाद की देश के सबसे बड़े न्यायालय में दैनिक सुनवाई चल रही है। 6 अगस्त से शुरू हुई दैनिक सुनवाई अब अंतिम दौर में पहुँच चुकी है। मंगलवार को दैनिक सुनवाई का 39वाँ दिन था। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने 16 अक्टूबर बुधवार को ही दलीलों की सुनवाई पूर्ण करने के संकेत दिये हैं। चीफ जस्टिस ऑफ इण्डिया (CJI) रंजन गोगोई 5 सदस्यीय संवैधानिक पीठ के साथ प्रति दिन सुनवाई कर रहे हैं, जिसमें अन्य न्यायमूर्ति जस्टिस एस. ए. बोबड़े, जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एस. ए. नज़ीर शामिल हैं। मुख्य न्यायमूर्ति गोगोई ने सोमवार को ही साफ कर दिया था कि अदालत 16 अक्टूबर यानी बुधवार तक ही दोनों पक्षों की दलीलें सुनेगी। मंगलवार को उन्होंने फिर दोहराया और बताया कि बुधवार को लंच से पहले तक दलीलें सुनी जाएँगी, जिसमें मुस्लिम पक्ष को दलीलें पेश करने के लिये एक घण्टे का समय दिया जाएगा और चारों हिंदू पक्षकारों को 45-45 मिनट दलील पेश करने के लिये दिये जाएँगे। भोजनावकाश के बाद का समय मोल्डिंग ऑफ रिलीफ के लिये दिया जाएगा। इस दौरान दोनों पक्षों की ओर से माँग या दावा किया जाता है। यानी एक तरह से अदालत को विकल्प बताया जाता है। इस प्रकार माना जा रहा है कि ‘कलियुग की रामायण’ का अयोध्या ‘कांड’ अपने उत्तरार्द्ध की ओर अग्रसर है। अभी तक हुई दलीलों में हिंदू पक्षकार जिस तरह से अपना पक्ष मजबूती से पेश करने में सफल रहे हैं और मुस्लिम पक्ष को जिस तरह से संवैधानिक पीठ की ओर से बार-बार मजबूत प्रमाण रखने के लिये कहा गया है, उससे तो ऐसा प्रतीत होता है कि एक बार फिर धर्म का विजयघोष होने वाला है। यदि ऐसा हुआ तो अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा, जिसका पूरा देश बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है। त्रेता युग की रामायण में भगवान राम की रावण पर जीत को धर्म की विजय और अधर्म की पराजय का प्रतीक माना जाता है। तब सवाल यह उठ रहा है कि क्या देश का सबसे बड़ा न्यायालय भगवान राम को न्याय देने में सफल होगा ? और क्या सीजेआई रंजन गोगोई, जो 17 नवंबर को सेवा निवृत्त हो रहे हैं, वे अनंत दलीलों का सिलसिला खत्म करके अपनी सेवा निवृत्ति से पहले इस मामले का फैसला लाने में सफल होंगे ?

त्रेतायुग की रामायण के 7 कांड

त्रेतायुग में महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत रामायण में कुल 7 कांड हैं। इनमें प्रथम बाल कांड है। दूसरा अयोध्या कांड, तीसरा अरण्य कांड, चौथा किष्किंधा कांड, पाँचवां सुंदर कांड, छठवाँ लंका कांड और सातवाँ उत्तर कांड है। आपको बता दें कि बाल कांड से रामायण की शुरुआत होती है। इसमें भगवान राम और उनके भाइयों के जन्म तथा बाल लीलाओं का वर्णन है। इसके अलावा ऋषि विश्वामित्र के आश्रम की रक्षा करते हुए राम कई राक्षसों का वध करते हैं और इसी कांड में उनकी शिक्षा तथा माता सीता के साथ उनके विवाह तक का सुंदर वर्णन है। अयोध्या कांड में मंथरा के उकसाने पर माता केकैयी की ओर से राजा दशरथ से राम के लिये 14 वर्ष के वनवास और भरत के लिये राज सिंहासन माँगने की कथा और राम के वनवास जाने तथा भरत के सिंहासन पर राम की चरण पादुकाएँ स्थापित करके स्वयं नंदी ग्राम में निवास करने की कथा का वर्णन मिलता है। अरण्य कांड में वनवास पर गये राम के साथ घटित होने वाली घटनाओं का चित्रण किया गया है। पंचवटी में रावण की बहन सूर्पणखा द्वारा राम व लक्ष्मण से प्रणय निवेदन करना और बाद में लक्ष्मण द्वारा उसकी नाक काट देने के बाद रावण द्वारा सीता के हरण की कथा का इस कांड में वर्णन मिलता है।

इसके बाद किष्किंधा कांड में राम सीता की तलाश में किष्किंधा नगरी पहुँचते हैं, जहाँ उनकी मुलाकात उनके अनन्य भक्त हनुमान से होती है। इस कांड में बाली वध, सुग्रीव से मित्रता और सुग्रीव की वानर सेना का वर्णन है। सुंदर कांड में हनुमानजी सीता की खोज में लंका पहुँचते हैं और लंका दहन करते हैं। माता सीता से मुलाकात के बाद इसी कांड में विभीषण की राम से मुलाकात का भी वर्णन मिलता है। लंका कांड में राम-रावण युद्ध की कथा है। रावण वध के बाद राम अयोध्या लौटते हैं और अयोध्यावासी उनका भव्य स्वागत करते हैं। अंतिम उत्तर कांड अपने नाम से स्पष्ट है कि यह रामायण का उत्तरार्द्ध यानी समापन की कथा है। इसमें राम का उपसंहार है। अयोध्या लौटने के बाद राम का राज्याभिषेक होता है और रामराज्य की स्थापना होती है। इसी कांड में सीता की अग्नि परीक्षा, सीता का परित्याग, लव कुश का जन्म, सीता का भूमि में समा जाना और राम की जल समाधि के साथ रामायण का समापन होता है। अंतिम कांड सबसे लंबा है।

कलयुग की रामायण के 7 कांड

कलयुग की रामायण 16वीं सदी में यानी 491 साल पहले शुरू हुई थी। इसका प्रथम कांड विवाद कांड कहा जा सकता है, जिसमें 1528 में अयोध्या में राम जन्मभूमि स्थल पर बाबरी मस्ज़िद का विवादित ढाँचा बना था। 1853 में पहली बार अयोध्या में स्थित राम जन्मभूमि स्थल पर बाबरी मस्जिद के विवादित ढाँचे को लेकर हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच विवाद उत्पन्न हुआ था। इसके बाद 1859 में अंग्रेजों ने विवाद को ध्यान में रखते हुए पूजा व नमाज़ के लिये मुसलमानों को ढाँचे के अंदर का हिस्सा और हिंदुओं को बाहर का हिस्सा उपयोग करने की सलाह दी।

कलयुग की रामायण का दूसरा कांड ताला कांड कहा जा सकता है, क्योंकि देश की आज़ादी के बाद 1949 में दोनों समुदायों के बीच विवाद जारी रहने से हिंदू समुदाय की ओर से अंदरूनी हिस्से में भगवान राम की मूर्ति स्थापित की गई और दोनों समुदायों के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए सरकार ने इसमें ताला लगा दिया। तीसरा कांड विरोध कांड कहा जा सकता है जो 1986 में शुरू होता है और इसमें न्यायालय का हस्तक्षेप भी शुरू होता है। जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल को हिंदुओं की पूजा के लिये खोलने का आदेश दिया। इसके बाद मुस्लिम समुदाय ने इसके विरोध में बाबरी मस्ज़िद एक्शन कमेटी गठित की और 1989 में विश्व हिंदू परिषद ने विवादित स्थल से सटी ज़मीन पर राम मंदिर बनाने की मुहिम शुरू की।

चौथा कांड बाबरी कांड के नाम से पहचाना जा सकता है, क्योंकि 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्ज़िद के विवादित ढाँचे को ढहाया गया था। इसके परिणाम स्वरूप देश भर में दंगे हुए थे, जिनमें लगभग दो हजार लोगों की जान गई थी। ढाँचा गिराए जाने के 10 दिन बाद 16 दिसंबर 1992 को लिब्रहान आयोग गठित किया गया था और आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एम. एस. लिब्रहान को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था। इस आयोग को 16 मार्च 1992 तक यानी तीन महीने में जाँच रिपोर्ट देने के लिये कहा गया था, परंतु आयोग को रिपोर्ट बनाने में 17 साल का लंबा समय लगा। इस बीच 1993 में केन्द्र के ज़मीन अधिग्रहण को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, परंतु कोर्ट ने चुनौती को खारिज कर दिया। इस चुनौती में कहा गया था कि केन्द्र सरकार सिर्फ इस ज़मीन की संग्रहक है, जब मालिकाना हक़ का फैसला हो जाएगा तो मालिकों को ज़मीन लौटा दी जाएगी। इसके बाद केन्द्र सरकार की ओर से इसी अतिरिक्त ज़मीन को लेकर कोर्ट में याचिका दायर की गई। 1996 में राम जन्मभूमि न्यास ने केन्द्र सरकार से ज़मीन माँगी तो उसकी माँग ठुकरा दी गई। इसके बाद न्यास ने कोर्ट का रुख किया, जिसे कोर्ट ने भी 1997 में ठुकरा दिया।

पाँचवें कांड को ज़मीन कांड नाम दिया जा सकता है। 2002 में जब गैर-विवादित ज़मीन पर कुछ गतिविधियाँ शुरू हुईं तो सुप्रीम कोर्ट में इसके विरुद्ध याचिका दायर की गई। 2003 में इस पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया और कहा कि विवादित तथा गैर-विवादित ज़मीन को अलग करके नहीं देखा जा सकता है। 30 जून 2009 को लिब्रहान आयोग ने चार भागों में 700 पृष्ठों की रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पी. चिदम्बरम को सौंपी। इस दौरान जाँच आयोग का कार्यकाल 48 बार बढ़ाने की जरूरत पड़ी थी।

छठवें कांड को राम जन्मभूमि कांड नाम देना उचित रहेगा, क्योंकि 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने एक निर्णय सुनाया, जिसमें विवादित भूमि को राम जन्मभूमि घोषित किया गया। न्यायालय ने बहुमत से निर्णय दिया कि विवादित भूमि जिसे राम जन्मभूमि माना जाता है, उसे हिंदू गुट को दे दिया जाए। न्यायालय ने यह भी कहा कि वहाँ से राम लला की प्रतिमा न हटाई जाए। न्यायालय ने यह भी पाया कि सीता रसोई और राम चबूतरा आदि कुछ भागों पर निर्मोही अखाड़े का भी कब्ज़ा रहा है, इसलिये यह हिस्सा निर्मोही अखाड़े के पास ही रहे। दो न्यायाधीशों ने यह भी निर्णय दिया कि इस भूमि के कुछ भागों पर मुसलमान प्रार्थना करते हैं, इसलिये विवादित भूमि का एक तिहाई हिस्सा मुसलमान गुट को दिया जाए, परंतु दोनों ही पक्षों ने इस निर्णय को मानने से इनकार कर दिया और सर्वोच्च अदालत का दरवाज़ा खटखटाया।

कलियुग की रामायण का सातवाँ और अंतिम कांड भी उत्तर कांड कहा जा सकता है। क्योंकि अब यह विवाद भी अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुका है और दोनों पक्षकारों, दोनों समुदायों के साथ-साथ सभी को उत्तर के रूप में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला मिल सकता है। द्वार खटखटाए जाने के 7 वर्ष बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय किया कि 11 अगस्त 2017 से तीन न्यायाधीशों की पीठ इस विवाद की प्रति दिन सुनवाई करेगी। सुनवाई से ठीक पहले शिया वक्फ बोर्ड ने न्यायालय में याचिका दायर की और उसने भी पक्षकार होने का दावा किया। 70 वर्ष बाद 30 मार्च 1946 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए उसने मस्ज़िद को सुन्नी वक्फ बोर्ड की सम्पत्ति घोषित कर दिया। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि 5 दिसंबर 2017 से मामले की अंतिम सुनवाई शुरू होगी, फिर 5 फरवरी 2018 से अंतिम सुनवाई शुरू करने की बात कही। अंततः 2019 में गत 6 अगस्त से सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की प्रति दिन सुनवाई शुरू हुई है, जिसमें दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जा रही हैं। अब दलीलें भी अपने अंतिम चरण में पहुँच चुकी हैं, जिसके चलते अयोध्या में हलचल बढ़ गई है और अदालत के आदेश से उत्तर प्रदेश सरकार ने अयोध्या में धारा 144 लागू की है तथा सुरक्षा के विशेष प्रबंध किये हैं। इस बीच दीपावली पर अयोध्या में उत्सव मनाने की भी तैयारियाँ चल रही हैं। अब सबकी नज़रें इस 491 साल पुराने विवाद के अंतिम फैसले पर टिकी हुई हैं। अंतिम फैसला 15 नवंबर तक आने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

Article Categories:
News

Comments are closed.

Shares