भारत में नागरिकता कानून पर बवाल मचाने वालो देखो पाकिस्तान में क्या हो रहा ?

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विशेष रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 15 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। एक तरफ भारत में नये नागरिकता कानून (CITIZENSHIP ACT) को लेकर बवाल मचा हुआ है। पूर्वोत्तर (NORTH EAST) के राज्यों में हिंसक प्रदर्शनों (VIOLENT PROTESTS) के चलते स्थिति तनावपूर्ण है और कई राज्यों में कर्फ्यू (CURFEW) लगाया गया है। वहीं शनिवार को हिंसक आग की लपटों ने पश्चिम बंगाल (WEST BENGAL) को भी अपनी चपेट में ले लिया, जहाँ प्रदर्शनकारियों ने 17 बसों (BUSES) और 5 रेलगाड़ियों (TRAINS) में आग लगा दी। विरोध को देखते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह (AMIT SHAH) ने क्रिसमस (CHRISTMAS) के बाद नागरिकता कानून में कुछ बदलाव किये जाने के संकेत दिये हैं। साथ ही उन्होंने झारखंड में चुनावी रैलियों को संबोधित करते हुए पूर्वोत्तर के नागरिकों को आश्वासन भी दिया कि नये कानून से उनकी भाषा, संस्कृति, सामाजिक पहचान और राजनीतिक अधिकारों को तनिक भी प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा। इसी बीच संयुक्त राष्ट्र के कमीशन ऑन दी स्टेट्स ऑफ वुमेन (CSW) की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी हुई है, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर पड़ोसी देश पाकिस्तान की नापाक हरकतों की पोल खोली गई है।

इमरान खान के नेतृत्व में बिगड़ी स्थिति – रिपोर्ट

जब भारतीय संसद में मोदी सरकार के गृह मंत्री अमित शाह ने पड़ोसी मुस्लिम देशों में अत्याचारों से पीड़ित होकर भारत में शरण लेने वाले अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करने के लिये नागरिकता संशोधन बिल पेश किया तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस बिल की यह कह कर आलोचना की थी कि भारत पाकिस्तान के मामलों में हस्तक्षेप करने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने यह भी दावा किया था कि उनके देश में अल्पसंख्यकों को कोई यातना नहीं दी जाती है, परंतु संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक व सामाजिक परिषद के कमीशन ऑन दी स्टेट्स ऑफ वुमेन (CSW) की दिसंबर में जारी हुई रिपोर्ट में पाकिस्तान और इमरान खान दोनों के ही दावों की पोल खुल गई है।

इस आयोग ने रिपोर्ट में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पाकिस्तान में सत्तारूढ़ इमरान खान के नेतृत्व वाली तहरीके-इंसाफ पार्टी की सरकार के भेदभावपूर्ण कानूनों से धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले करने वाले चरमपंथियों और उनकी मानसिकता को बल मिल रहा है। आयोग की ओर से जारी ‘पाकिस्तान-धार्मिक स्वतंत्रता के तहत हमले’ शीर्षक वाली 47 पन्नों की इस रिपोर्ट में ईशनिंदा कानूनों के बढ़ते शस्त्रीकरण व राजनीतिकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा गया है कि अहमदिया विरोधी कानून जो कि इस्लामी समूहों द्वारा उपयोग किया जाता है, वह न सिर्फ धार्मिक अल्पसंख्यकों को सताने के लिये बल्कि राजनीतिक ज़मीन हासिल करने के लिये भी बल देता है।

18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों का जबरन अपहरण – CSW

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट शब्दों में यह भी कहा है कि इस्लामी राष्ट्र में इसाई तथा हिंदू समुदाय विशेष रूप से कमजोर हैं और इनमें भी महिलाएँ तथा लड़कियाँ शामिल हैं। हर साल सैकड़ों लड़कियों का अपहरण कर लिये जाने और उन्हें मुस्लिम पुरुषों से शादी करने के लिये मजबूर किये जाने का भी रिपोर्ट में उल्लेख है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पीड़ित लड़कियों और उनके परिवारों के विरुद्ध अपहरणकर्ताओं की ओर से दी गई गंभीर धमकियों के कारण लड़कियों के अपने परिवार में वापसी करने की कोई उम्मीद नहीं रहती है। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार जबरन शादी और जबरन धर्म परिवर्तन के मामले इसाई और हिंदू लड़कियों तथा महिलाओं के साथ ज्यादा देखने को मिलते हैं। विशेष कर पंजाब व सिंध प्रांतों में कई पीड़ित लड़कियाँ 18 वर्ष से भी कम उम्र की हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंदू लड़कियों और महिलाओं को व्यवस्थित रूप से लक्ष्य बनाया जाता है। क्योंकि वे ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से आती हैं और आम तौर पर शिक्षित हैं। इसी सीएसडब्ल्यू ने 2017 में धार्मिक अल्पसंख्यकों के बच्चों का इंटरव्यू लिया था, जिसमें बच्चों ने स्वीकार किया था कि उन्हें शिक्षकों और सहपाठियों दोनों की ओर से कई मौकों पर अपमानित किया जाता है और शारीरिक रूप से प्रताड़ित भी किया जाता है। पुलिस की कमी के कारण कार्यवाही नहीं की जाती है और न्यायिक प्रक्रिया भी कमजोर है। धार्मिक अल्पसंख्यक पीड़ितों के प्रति पुलिस व न्यायपालिका दोनों की भेदभाव करते हैं। आयोग ने रिपोर्ट में कई उदाहरणों के साथ कहा है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को द्वितीय श्रेणी के नागरिकों के रूप में चित्रित किया जाता है।

मानवाधिकार रक्षकों पर भी मँडराता है खतरा और मिलती है धमकियाँ

आयोग की इस रिपोर्ट में मई-2019 में सिंध प्रांत के मीरपुर खास में एक हिंदू पशु चिकित्सा अधिकारी रमेश कुमार मल्ही पर कुरान के छंद वाले पन्नों में दवाई लपेटने का आरोप लगा कर प्रदर्शनकारियों के माध्यम से उसकी चिकित्सा क्लिनिक और हिंदू समुदाय से जुड़ी अन्य दुकानों को जलाने का भी उल्लेख किया गया है। आयोग ने कहा कि पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून किसी का भी अपमान करता है, अक्सर धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध झूठे मामलों का दुरुपयोग करने के लिये उपयोग किया जाता है और वह विवाद और पीड़ा का स्रोत बन गया है। रिपोर्ट में किये गये अन्य चौंकाने वाले खुलासों के अनुसार चरमपंथ के साथ पिछले तीन दशकों में ईश निंदा कानूनों का लंबे समय तक दुरुपयोग किये जाने से सामाजिक सदभाव पर बहुत गहरा और हानिकारक प्रभाव पड़ा है। इन कानूनों से निंदात्मक मामलों की संवेदनशील प्रकृति धार्मिक उन्माद बढ़ाने का काम करती है और भीड़ व हिंसा का माहौल बनाती है, जिसमें लोग कानूनों को अपने हाथ में लेते हैं और अक्सर इसके घातक परिणाम सामने आते हैं। आयोग के अनुसार पाकिस्तान में मानवाधिकार रक्षकों को भी राज्य तथा गैर-राज्य अभिनेताओं सहित कई स्रोतों से लगातार खतरों और धमकियों का सामना करना पड़ता है।

इस रिपोर्ट पर क्या कहेंगे कांग्रेस और औवेसी ?

संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट भारत में नये नागरिकता कानून का विरोध करने वालों और मानवाधिकारों की दुहाई देने वालों के लिये आँख और कान दोनों खोल देने के लिये काफी है। नागरिकता कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाले असदुद्दीन औवेसी और कांग्रेस सहित विभिन्न राजनीतिक दलों को भी सीएसडब्ल्यू की इस रिपोर्ट पर गौर करने की आवश्यकता है। बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या नागरिकता कानून का विरोध करने वाले सीएसडब्ल्यू की ताजा रिपोर्ट को लेकर पाकिस्तान और उसके कानूनों पर खुल कर कुछ भी बोलने की हिम्मत कर पाएँगे ?

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