कूपमंडूक कांग्रेस : ‘हुआ सो हुआ’ और वही हुआ जिसका होना निश्चित था

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परिवारवाद त्यागने का साहस नहीं था, तो त्यागपत्र का आडंबर क्यों ?

घोर आश्चर्य : लगातार दो-दो ऐतिहासिक हार के बाद भी कायाकल्प का अवसर गँवाया

सोशल मीडिया में उपहास का पात्र बन चुकी है ऐतिहासिक कांग्रेस पार्टी

विश्लेषण : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 26 मई, 2019। लोकसभा चुनाव 2019 में करारी शिकस्त के बाद कांग्रेस में अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने का जो राजनीतिक ड्रामा शुरू हुआ था, वह शनिवार को कांग्रेस कार्य समिति (CWC) की बैठक के साथ खत्म हो गया। परिणाम वही आया, जिसका आना निश्चित था। 2014 और 2019 के महासंग्राम सरीखे दो लोकसभा चुनावों में लगातार ऐतिहासिक हार के बावजूद कांग्रेस को जब गांधी परिवार के मोह को त्यागना ही नहीं था, तो सवाल उठता है कि फिर त्यापगत्र का यह आडंबर क्यों रचा गया ? जिस पार्टी का अध्यक्ष न केवल लोकसभा चुनाव बुरी तरह से हारा है, अपितु अपने पूर्वजों के गढ़ अमेठी का रण भी गँवा चुका है, फिर भी वह अध्यक्ष बना रहे, ऐसा कदाचित कांग्रेस पार्टी और उसके जैसी परिवारवाद पर निर्भर पार्टी में ही संभव है। कुल मिला कर सीडब्ल्यूसी की पूरी कवायद करारी हार पर मंथन और आगे बढ़ने की दिशा में कोई संदेश न लाते हुए, पुराने ढर्रे पर चलने के निष्कर्ष पर ही सम्पन्न हो गई अर्थात् कांग्रेस एक बार फिर गांधी परिवार के घेरे से बाहर निकलने का साहस नहीं जुटा पाई और इसका स्पष्ट संकेत है कि भविष्य में भी कांग्रेस गांधी परिवार के सामने ही नतमस्तक रहेगी।

दूसरे शब्दों में कहें तो कूपमंडूक बनी रहेगी। कूपमंडूक कुँए का वह मेढक होता है, जो बाहरी दुनिया से बिल्कुल अनभिज्ञ होता है और कुँए को ही दुनिया समझता है। कांग्रेस की मनोःस्थिति भी कुछ ऐसी ही दिख रही है, जो इस परिवार के घेरे से बाहर निकलने की कल्पना भी नहीं कर पा रही है। 2014 और 2019 के दो-दो लोकसभा चुनावों में करारी शिकस्त के बाद पार्टी के सामने कुछ नये प्रयोग करने और पार्टी का कायाकल्प करने का सुनहरा अवसर आया था, परंतु उसने राहुल गांधी को ही अध्यक्ष के रूप में स्वीकार करके वह अवसर भी गँवा दिया और कूपमंडूक बने रहना ही स्वीकार कर लिया। लोकसभा चुनाव के परिणाम 23 मई को घोषित हुए। कांग्रेस को उम्मीदों के अनुरूप परिणाम नहीं मिले। कांग्रेस अकेले लगभग 100 सीटें पाने की उम्मीद कर रही थी, वहीं विपरीत परिणामों ने उसकी मंशाओं पर पानी फेर दिया। उसे 2014 में सबसे कम 44 सीटें मिली थी। 2019 में भी वह कोई खास प्रदर्शन नहीं कर पाई और मात्र 7 सीटें ही और जोड़ पाई। 2019 में कांग्रेस को मात्र 52 सीटें ही मिली हैं, जो लोकसभा में विपक्षी दल का दर्जा हासिल करने के लिये आवश्यक 54 सीटों से भी कम हैं। एक और बड़ा झटका यह लगा कि वह उत्तर प्रदेश की 80 में से मात्र 1 सीट ही जीत पाई और यहाँ उसे अपना परंपरागत गढ़ अमेठी भी गँवाना पड़ा। चुनाव परिणाम के दिन शाम को ही निराश राहुल गांधी मीडिया के सामने आये थे और उन्होंने अमेठी की पराजय स्वीकार करने के साथ ही लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की पराजय की भी जिम्मेदारी स्वीकार की थी।

इसके बाद से ही अटकलें शुरू हो गई थी कि वह कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे देंगे। इसके बाद राहुल गांधी यूपीए की अध्यक्ष और अपनी माँ सोनिया गांधी से भी मिले और उनके समक्ष भी कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने का प्रस्ताव रखा, परंतु सोनिया गांधी, बहन प्रियंका गांधी वाड्रा तथा पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने समझाया कि कोई जल्दबाजी करने की आवश्यकता नहीं है, जो भी कहना है कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक में कहना। इसके बाद आज जब यह बैठक आयोजित हुई, जिसमें राहुल, प्रियंका, सोनिया गांधी के अलावा, डॉ. मनमोहन सिंह, पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री ग़ुलामनबी आज़ाद, मल्लिकार्जुन खड़गे, पी. चिंदंबरम आदि नेता उपस्थित रहे। इस बैठक में भी राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश की और यह भी सुझाव रखा कि अब अगले अध्यक्ष के लिये गांधी परिवार के सदस्य या उनकी बहन प्रियंका गांधी के नाम का प्रस्ताव न लाया जाए। वह त्यागपत्र देने के बाद भी पार्टी के लिये काम करते रहेंगे।

माना जा रहा था कि बैठक में नये अध्यक्ष के लिये पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, मल्लिकार्जुन खड़गे और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नामों पर चर्चा की जा सकती है, परंतु बैठक में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। सीडब्ल्यूसी की बैठक में सामूहिक रूप से राहुल गांधी के त्यागपत्र के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया। बैठक खत्म होने के बाद कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला मीडिया के समक्ष आये और उन्होंने राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफे का प्रस्ताव अस्वीकार किये जाने की घोषणा की। साथ ही बताया कि कमिटी ने राहुल गांधी को कुछ अधिकार दिये हैं, जिनके अंतर्गत वह पार्टी संगठन में इच्छानुसार परिवर्तन कर सकेंगे। उन्होंने बताया कि पार्टी के पुनर्गठन के लिये शीघ्र ही एक प्लान तैयार किया जाएगा।

इस प्रकार एक बार फिर गांधी परिवार के नेतृत्व को बनाये रखने के लिये पार्टी संगठन में परिवर्तन का खेल खेला जाएगा। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित भी एक बार कह चुके हैं कि केवल कहा जाता है कि हार के कारणों का पोस्टमार्टम किया जाएगा, हालाँकि ऐसा कुछ भी नहीं होता है, क्योंकि हारने वाले नेता ही बैठक में जुटते हैं, वह क्या समीक्षा करेंगे। यही बात यहाँ सिद्ध होती दिख रही है कि समीक्षा के नाम पर संगठन में फेरबदल करके संतोष कर लिया जाएगा और इस पराजय को भुलाकर अगले विधानसभा चुनावों की तैयारियाँ शुरू कर दी जाएँगी। राहुल गांधी, गाँधी परिवार के 6वें सदस्य हैं, जो कांग्रेस के अध्यक्ष बने रहेंगे। इससे पहले मोतीलाल नेहरू, पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष रहे हैं। राहुल गांधी ने गुजरात विधानसभा के चुनाव से पहले दिसंबर-2017 में कांग्रेस का अध्यक्ष पद संभाला था। लोकसभा चुनाव में शर्मशार कर देनेवाली पराजय के बाद भी पार्टी इस परिवार को सँभालने में जुटी है और इस परिवार के घेरे से बाहर निकलने का साहस नहीं कर पा रही है।

सोशल मीडिया तो पहले ही ड्रामा बता कर चुटकियाँ ले चुका था

कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गाँधी इस इस्तीफे के राजनीतिक ड्रामा के बाद अब सोशल मीडिया में परिहास का पात्र बन रहे हैं। आप भी देखिये लोग इस ड्रामे पर क्या-क्या चुटकियाँ ले रहे हैं।

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