विवेकानंद ने की आध्यात्मिक क्रांति, तो छोटे भाई भूपेंद्रनाथ दत्त ने भी झकझोरा भारत को…

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रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद 26 दिसंबर, 2019 युवाPRESS। “युगान्तर” भारत की स्वतंत्रता संग्राम में अपनी सशक्त भूमिका रखने वाला एक सशस्त्र आन्दोलन का गुप्त संगठन था। अरविन्द घोष, बारीन घोष, उल्लासकर दत्त आदि इसके प्रमुख नेता थे। खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी इसी दल के सदस्य थे। अंग्रेजों के साथ बढ़ते विरोध ने इसे एक पत्रिका का रूप दिया, जिसका संचालन कई बड़े और दिग्गज क्रांतिकारियों ने किया, उनही में से एक थे भूपेंद्रनाथ दत्त। ये भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्रसिद्ध क्रांतिकारियों में से एक थे। साथ ही वे एक लेखक और समाजशास्त्री भी थे। भूपेंद्रनाथ दत्त स्वामी विवेकानंद के भाई थे। भूपेंद्रनाथ दत्त युवाकाल से ही ‘युगांतर आन्दोलन’ से जुड़े थे। वे ‘युगांतर पत्रिका’ के सम्पादक थे और 2 बार ‘अखिल भारतीय श्रमिक संघ’ के अध्यक्ष भी रहे थे। आज हम भूपेंद्रनाथ दत्त को इस लिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज उनकी 58वीं पुण्यतिथि है।

भूपेंद्रनाथ दत्त का जन्म 4 सितंबर, 1880 को कोलकाता (अब कलकत्ता) में हुआ था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त कोलकाता हाई कोर्ट के वकील थे और उनकी माता भुवनेश्वरी दत्त एक गृहिणी थीं। भूपेंद्रनाथ के दो बड़े भाई नरेंद्रनाथ दत्त जो बाद में विवेकानंद स्वामी बने और दूसरे महेंद्रनाथ दत्त, जो एक प्रसिद्ध लेखक भी थे। भूपेंद्रनाथ केपरिवारिक संबंध बंगाल के प्रबुद्ध व्यक्तियों से था। भूपेंद्रनाथ की आरंभिक शिक्षा ईश्वर चंद्र विद्यासागर द्वारा स्थापित विद्यालय में हुई थी। पढ़ाई के दौरान ही, उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना आरंभ कर दिया। भूपेंद्रनाथ दत्त का नामांकन ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूशन में हुआ, जहाँ से उन्होंने प्रवेश परीक्षा दी। युवावस्था में वह केशु चंद्र सेन और देबेंद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व में ब्रह्म समाज में शामिल हो गए। यहां उनकी मुलाकात शिवनाथ शास्त्री से हुई जिन्होंने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। दत्त की धार्मिक और सामाजिक आस्थाओं को ब्रह्म समाज ने आकार दिया था, जिसमें एक ही ईश्वर में, एक जाति-रहित समाज में, अंधविश्वासों के विरुद्ध विद्रोह शामिल था।

1902 में प्रमथनाथ मित्रा द्वारा गठित बंगाल रिवोल्यूशनरी सोसाइटी में शामिल हो गए। 1906 में वे समाचार पत्र जुगान्तर (युगान्तर) पत्रिका के संपादक बने। यह पत्रिका बंगाल की क्रांतिकारी पार्टी का मुखपत्र था। उस दौरान वे क्रांतिकारी अरबिंदो और बरिंद्र घोष के परम सहयोगी बन गए थे। 1907 में उन्हें राजद्रोह के अपराध में बंदी बना लिया गया और 1 वर्ष कारावास की सजा दी गई। जेल से मुक्त होने के पश्चात, जब भूपेंद्रनाथ दत्त को ‘अलीपुर बम कांड’ में फंसाने की तैयारी हो रही थी, वे देश से बाहर अमेरिका चले गए, जहाँ 1908 में उन्होंने Brown University से एम.ए. किया। भूपेंद्रनाथ दत्त कैलिफोर्निया की ग़दर पार्टी में शामिल हो गए और वहाँ उन्होंने समाजवाद और साम्यवाद के बारे में अध्ययन किया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भूपेंद्रनाथ जर्मनी गए और वहाँ क्रांतिकारी और राजनीतिक गतिविधियों की शुरुआत की। 1916 में भूपेंद्रनाथ बर्लिन में भारतीय स्वतंत्रता समिति के सचिव बने और 1918 तक इस संगठन के सचिव बने रहे। भूपेंद्रनाथ ने 1920 में जर्मन एंथ्रोपोलॉजिकल सोसायटी और 1924 में जर्मन एशियाटिक सोसाइटी की सदस्यता ली। 1921 में भूपेंद्रनाथ दत्त कॉमिन्टर्न में शामिल होने के लिए मास्को गए। मनबेंद्रनाथ रॉय और बीरेंद्रनाथ दासगुप्ता भी इसी वर्ष कॉमिन्टर्न में शामिल हुए। उसी दौरान उन्होंने 1923 में हैम्बर्ग विश्वविद्यालय से नृविज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

1925 में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त करने के बाद, जब भूपेंद्रनाथ भारत लौटे, तो उन्होंने देखा कि स्वयं को मार्क्सवादी कहने वाले लोग भारत के स्वतंत्रता संग्राम का विरोध कर रहे हैं। भूपेंद्रनाथ दत्त कांग्रेस में सम्मिलित हो गए। 1930 की कराची कांग्रेस में किसानों, मजदूरों के हित संबंधी प्रस्ताव को स्वीकार कराने में उनका बड़ा हाथ था। उसके बाद उन्होंने अपना ध्यान श्रमिकों को संगठित करने पर लगाया। भूपेंद्रनाथ दो बार अखिल भारतीय श्रमिक संघ के अध्यक्ष भी रहे। समाज सुधार के कामों में भी भूपेंद्रनाथ दत्त बराबर भाग लेते रहे। भूपेंद्रनाथ जात-पांत, छुआछूत और महिलाओं के प्रति भेदभाव के विरोधी थे। दत्त ने समाजशास्त्र, इतिहास, राजनीति आदि विभिन्न विषयों पर पुस्तकें लिखीं। भूपेंद्रनाथ एक भाषाविद् थे और उन्होंने बंगाली, हिंदी, अंग्रेजी, जर्मन, ईरानी में पुस्तकें लिखीं। ‘डाइलेक्टिक्स ऑफ़ हिंदू रिच्यूलिज़्म’, ‘डाइलेक्टिक्स ऑफ़ लैंड-इकॉनामिक्स ऑफ़ इंडिया’, ‘स्वामी विवेकानंद पैट्रियट-प्रोफॅट’, ‘सेकंड, फ्रीडम स्ट्रॅगल ऑफ़ इंडिया’, ‘ऑरिजिन एण्ड डेवलपमेंट ऑफ़ इंडियन सोशल पॉलिसी’ उनकी उल्लेखनीय पुस्तकों में से एक हैं। 26 दिसंबर, 1961 को भूपेंद्रनाथ दत्त का कोलकाता में निधन हो गया।

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