जब ‘बंगभाषी’ ने लिखा तवायफ़, तो बन कर दिखाया ब्रिटिश भारत की पहली चिकित्सक

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आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद 3 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। दुनिया की आधी आबादी यानी महिलाएँ सदियों से समाज के निर्माण में भागीदार रही हैं। भारतीय संस्कृति मे प्राचीन वैदिक काल से ही नारी का स्थान सम्माननीय रहा है और कहा भी गया है, “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रफलाः क्रियाः।’’ अर्थात् जिस कुल (परिवार) में स्त्रियों की पूजा होती है, उस कुल पर देवता प्रसन्न होते हैं और जिस कुल में स्त्रियों की पूजा, वस्त्र, भूषण तथा मधुर वचनादि द्वारा सत्कार नहीं होता है, उस कुल में सब कर्म विफल होते हैं। वैदिक काल में परिवार मातृ सत्तात्मक था। खेती की शुरुआत और एक जगह समूह में रहने की शुरुआत भी एक नारी ने ही की थी। इसलिए सभ्यता और संस्कृति के प्रारम्भ से ही नारी का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में सरस्वती को वाणी की देवी कहा गया है, जो उस समय की नारियों की शास्त्रों एवं कलाओं के क्षेत्र में निपुणता को दर्शाता है, परंतु ब्रिटिश शासन (1858-1947) में महिलाओं के सभी अधिकारों पर पाबंदी लगा दी गई थी। उन्हें घर की चार दीवारों तक ही सीमित कर दिया गया था, परंतु उसी दौरान ब्रिटिश भारत में 18 जुलाई, 1861 को जन्म हुआ कादम्बिनी गांगुली का, जिन्होंने महिला उत्थान के कार्य में एक नया ही अध्याय जोड़ दिया।

उन्हीं के अथक प्रयासों के कारण महिलाओं को शिक्षा का अधिकार मिलने लगा। कादम्बिनी ने न सिर्फ स्वयं उच्च शिक्षा प्राप्त की, अपितु वह ब्रिटिश भारत की पहली महिला स्नातक भी बनीं। भारत में भले ही महिलाओं को उच्चतर शिक्षा पाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा हो, परंतु 19वीं सदी में ही कादम्बिनी गांगुली के रूप में भारत को अपनी पहली महिला डॉक्टर भी मिल चुकी थीं। आज हम कादम्बिनी गांगुली को इस लिये याद कर रहे हैं, क्योंकि आज उनकी 96वीं पुण्यतिथि है। आज ही के दिन यानी 3 अक्टूबर, 1923 को वह इस नश्वर संसार को छोड़ कर चली गईं। आइये जानते हैं कादम्बिनी की संघर्ष गाथा, जिन्होंने विषम परिस्थितियों में भी अपनी शिक्षा पूरी की और भारत की पहली महिला स्नातक बनीं।

कादम्बिनी को पति ने मेडिकल की पढ़ाई के लिये किया प्रेरित

कादम्बिनी गांगुली का जन्म ब्रिटिश शासन के दौरान 18 जुलाई, 1861 को बिहार के भागलपुर में हुआ था। उनका परिवार चन्दसी (बारीसाल, अब बांग्लादेश में) का रहने वाला था। उनके पिता बृज किशोर बासु एक उदार विचारों वाले व्यक्ति थे। इसी के चलते उन्होंने अपनी पुत्री कादम्बिनी को उच्च शिक्षा दिलाई थी। 1882 में कादम्बिनी ने कोलकाता के बेथ्यून विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। कादम्बिनी पर बचपन से ही बंगाल-क्रांति और नव जागरण का बहुत प्रभाव था। उनके पिता ब्रज किशोर बासु स्कूल में हेड मास्टर होने के साथ ही  ब्रह्म समाज से भी जुड़े थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में महिला उत्थान के लिये बहुत कार्य किये और 1863 में भागलपुर महिला समिति की स्थापना की थी। यह भारत का पहला महिला संगठन था। उनके पिता ने ब्रह्म समाज के नेता द्वारकानाथ गंगोपाध्याय से कादम्बिनी का विवाह किया था, जो महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिये पहले से ही प्रयत्नशील थे। कादम्बिनी इस क्षेत्र में भी उनकी सहायक बनीं। उन्होंने बालिकाओं के विद्यालय में गृह उद्योग स्थापित करने के कार्य को प्रश्रय दिया। शादी के बाद उनके पति ने उन्हें मेडिकल पढ़ने के लिये प्रेरित किया, हालांकि एक औरत होकर डॉक्टर बनने के उनके निर्णय से भद्र लोक समुदाय (बंगाल की उच्च जाति) में उनकी काफ़ी निंदा हुई और यह निंदा इस हद तक बढ़ी कि ‘बंगभाषी’ पत्रिका के संपादक महेशचन्द्र पाल ने अपने एक कॉलम में उन्हें ‘तवायफ़’  शब्द से संबोधित किया था। संपादक के कुकृत्य से नाराज़ द्वारकानाथ ने उसे न सिर्फ़ खरी-खोटी सुनाईं, अपितु उन्होंने उसे पत्रिका का वह पन्ना हटाने के लिये भी कहा। साथ ही  उसे 6 महीने कारावास और 100 रुपये का जुर्माना भरने की सजा भी हुई।

पढ़ने के लिये कानून का लिया सहारा

अब कादम्बिनी के मेडिकल की पढ़ाई करने के रास्ते तो खुल गये थे, परंतु यहाँ भी उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा था। कादंबिनी के मेरिट लिस्ट में आने के बाद भी कोलकाता मेडिकल कॉलेज ने उन्हें दाखिला देने से मना कर दिया था, क्योंकि इससे पहले कोई भी महिला वहाँ नहीं पढ़ी थी। द्वारकानाथ, एक अरसे तक, कोलकाता मेडिकल कॉलेज में महिलाओं के दाखिले और हॉस्टल की व्यवस्था के लिये कार्यरत रहे थे, फिर भी वह कादम्बिनी का दाखिला कराने में सफल नहीं हुए थे। इसके बाद क़ानूनी कार्यवाही की गई और अंततः कॉलेज प्रशासन ने कादंबिनी को दाखिला दिया तथा उन्होंने चिकित्सा शास्त्र में डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वे स्कॉटलैंड गईं और वहाँ के ग्लासगो (Glasgow) और ऐडिनबर्ग (Edinburgh) विश्वविद्यालयों से चिकित्सा की उच्च डिग्रियाँ प्राप्त कीं। इसी के साथ कादम्बिनी गांगुली न सिर्फ भारत की पहली महिला स्नातक बनीं, अपितु उन्होंने भारत की पहली महिला फ़िजीशियन बनने का भी गौरव प्राप्त किया। वे पहली साउथ एशियन महिला थीं, जिन्होंने यूरोपियन मेडिसिन (European Medicine) में प्रशिक्षण लिया था।

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की रचनाओं से थीं प्रभावित

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की रचनाओं से कादम्बिनी बहुत प्रभावित थीं। बंकिमचन्द्र की रचनाएँ उनके भीतर देशभक्ति की भावनाएँ उत्पन्न करती थीं। वे सार्वजनिक कार्यों में भाग लेने लगी थीं। इतना ही नहीं, उन्हें 1889 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मद्रास (अब चेन्नई) में हुए अधिवेशन में सबसे पहले भाषण देने वाली महिला का गौरव भी प्राप्त हुआ। उन्होंने कोयला खदानों में काम करने वाली महिलाओं की लचर स्थिति पर भी बहुत कार्य किया। 1906 में कोलकाता कांग्रेस ने महिला सम्मेलन आयोजित किया, जिसकी अध्यक्षता भी कादम्बिनी ने ही की। महात्मा गाँधी उन दिनों अफ़्रीका में रंग-भेद के विरुद्ध ‘सत्याग्रह आन्दोलन’ चला रहे थे। कादम्बिनी ने उस आन्दोलन की सहायता के लिये कोलकाता में चन्दा जमा किया। 1914 में जब गाँधीजी कोलकाता आये, तो उनके सम्मान में आयोजित सभा की अध्यक्षता भी कादम्बिनी ने की थी। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गाँधी को कारावास होने के बाद गठित हुए ट्रांसवाल इंडियन एसोसिएशन के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया और वहाँ के भारतीयों के लिये भी दिन-रात काम किया था। 1915 में उन्होंने सबके सामने कोलकाता मेडिकल कॉलेज के मेडिकल सम्मेलन में महिला छात्रों को दाखिला न देने की रिवायत के खिलाफ़ आवाज़ उठाई थी। यह उनके भाषण का ही असर था, जिसने विश्वविद्यालय के अधिकारियों को अपनी नीतियों में संशोधन करने और सभी महिला छात्रों के लिये अपने कॉलेज के दरवाजे खोलने पर विवश कर दिया था।

अंतिम साँस तक की लोगों की सेवा

1898 में अपने पति की मृत्यु के बाद वे सार्वजानिक जीवन से दूर होती चली गयीं थी। फिर धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ने लगा था। अपनी मृत्यु से 1 वर्ष पहले उन्होंने बिहार और उड़ीसा में महिला खनन मजदूरों की मदद के लिये दौरा किया था। अपने जीवन काल में वह अंत तक लोगों का उपचार करती रहीं। 3 अक्टूबर, 1923 को जब वह किसी का उपचार करके घर लौटीं थी, उसके 15 मिनट बाद ही उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।

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