जब भाई की चिता पर जबरन जला दी गई भाभी, तो ‘राममोहन’ ने छेड़ दिया धर्म युद्ध

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आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 27, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। आज हम 21वीं शताब्दी में स्वतंत्र भारत में मुक्त मन से साँस ले रहे हैं, परंतु इसी भारत में एक ऐसा भी काल खंड था, जब एक ओर ब्रिटिश शासन का अत्याचार चरम पर था, तो दूसरी ओर भारत के लोग अज्ञान, अंध श्रद्धा, अंध विश्वास, रुढ़िवादी परम्पराओं से बुरी तरह घिरे हुए थे। लोग अपने ही पूर्वजों से विरासत में मिली ऐसी रुढ़ियों में फँसे हुए थे, जो समाज को हानि पहुँचा रही थी। सदियों से चली आ रही कुछ रुढ़िवादी परम्पराओं के चलते समाज पुरुष प्रधान बन चुका था और समाज में सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह निषेध, महिला-पुरुष भेद, महिला दमन जैसी प्रथाएँ प्रचलित थीं, जो अधिकांशत: महिला विरोधी थीं। यद्यपि समाज में व्याप्त इन कुरीतियों के विरुद्ध समय-समय पर मुखर होने वाले कई महापुरुष हुए, परंतु 22 मई, 1772 को एक ऐसे व्यक्ति का जन्म हुआ, जो आगे चल कर भारत का महान समाज सुधारक कहलाया।

जी हाँ, हम बात कर रहे हैं राजा राममोहनराय की, जिनकी आज 186वीं पुण्यतिथि है। अपने 61 वर्षों के जीवन में प्रारंभिक शिक्षा से आरंभ कर धर्म, अध्यात्म, वेद और वेदांत के गूढ़ रहस्यों को सुलझाने का प्रयास करने वाले राजा राममोहन राय ने जब यह अनुभव किया कि कोई भी धर्म या उससे जुड़ी पूजा-अनुष्ठान पद्धति तथा परम्परा किसी भी जीव की हत्या करने की सीख नहीं देता। ऐसे में जब वर्ष 1816 में इंग्लैण्ड यात्रा पर गए राजा राम मोहन राय को यह समाचार मिला कि उनके भाई की मृत्यु हो गई और उनकी भाभी को जबरन पति की चिता पर बैठा कर जला दिया गया। इस समाचार ने जहाँ एक तरफ राय को भाई की मृत्यु का भारी आघात लगा, वहीं उससे भी कई गुना आघात इस बात का लगा कि उनकी भाभी को जबरन पति की चिता पर बैठा कर जला दिया गया। सती प्रथा नामक इस कुरीति ने राय को भीतर से इतना झकझोर दिया कि उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त सती प्रथा सहित सभी प्रकार की कुरीतियों-कुप्रथाओं के विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया। यह एक ऐसा अभियान था, जिसमें राजा राम मोहन राय को रुढ़िवाद से ग्रस्त अपनों से, अपने परिजनों से, अपने समाज से और धर्म के तथाकथित ठेकेदारों से लड़ना था।

यूरोपीय ईश्वरवाद के अध्ययन से बदल गया जीवन

राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई, 1772 को ब्रिटिश बंगाल में हुगली के राधानगर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके परदादा कृष्णचंद्र बंदोपाध्याय एक राहिरी कुलीन ब्राह्मण थे। राजा राममोहन राय को 15वीं शताब्दी के बंगाली वैष्णव सुधारक चैतन्य के अनुयायी नरोत्तम ठाकुर का वंशज माना जाता है। उनके पिता रामकांता एक वैष्णव और माता तारिणी देवी एक शैव परिवार से थीं। उनके पिता संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी भाषाओं के महान विद्वान थे साथ ही अरबी, लैटिन और ग्रीक भी जानते थे। अपने पिता से ही राममोहन राय ने विभिन्न भाषाओं का ज्ञान अर्जित किया। राम मोहन राय ने तीन बार शादियाँ की थीं। शादी के कुछ वर्ष बाद ही उनकी पहली पत्नी का देहांत हो गया। दूसरी पत्नि भी जल्द चल बसीं। फिर उन्होंने तीसरी शादी की। तीसरी पत्नि से राममोहन को राधाप्रसाद और रामप्रसाद दो बेटे थे। तीसरी पत्नि की भी 1824 में मृत्यु हो गई। राम मोहन राय ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के एक पाठशाला में की, जहाँ उन्होंने बंगाली, संस्कृत और फ़ारसी सीखी। बाद में उन्होंने पटना के एक मदरसे में फ़ारसी और अरबी का अध्ययन किया। इसके बादस वह वेदों और उपनिषदों सहित संस्कृत और हिंदू धर्म ग्रंथों के गहन अध्ययन करने के लिए बवारस (अब वराणसी) चले गए। फारसी और अरबी अध्ययन के दौरान उन्होंने यूरोपीय ईश्वरवाद का अध्ययन किया जिसमें एक ईश्वर की महिला के बारे में बताया गया है, जिससे प्रभावित होकर राममोहन राय ने ईश्वर की एकता का प्रचार किया, वैदिक शास्त्रों के प्रारंभिक अनुवाद अंग्रेजी में किए और कलकत्ता यूनिटेरियन सोसाइटी की स्थापना की। ईश्वर में आस्था और एक ही परमपिता परमात्मा को जानने के बाद राममोहन ने 20 अगस्त, 1828 को ब्रह्म समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य भिन्न भिन्न धार्मिक आस्थाओं में बँटी हुई जनता को एक जुट करना और समाज में फैली कुरीतियों को दूर करना था। उन्होंने ब्राह्म समाज के अन्तर्गत कई धार्मिक रूढियों को बंद करा दिया जिसमें सती प्रथा, बाल विवाह, जाति तंत्र शामिल था। ब्राह्म समाज भारत का एक सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन था जिसने बंगाल के पुनर्जागरण युग को प्रभावित किया।

और अंग्रेजों को बनाना पड़ा सती प्रथा विरोधी कानून

राजा राममोहन राय जब किसी काम से इंग्लैण्ड गए थे, उसी समय उनके बड़े भाई की मृत्यु हो गई। गाँव वालों ने उनकी भाभी को ज़बरदस्ती पति की चिता पर बैठा कर उन्हें आत्मदाह के लिए विवश कर दिया। राजा राममोहन राय अपनी भाभी से बहुत स्नेह करते थे। इस घटना ने उन्हें भीतर से झकझोर और कँपा दिया। इसके बाद उन्होंने सती प्रथा के विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया। उनकी माँ शैव थीं और इसी कारण अनेक रुढ़िवादी परंपराओं में गहरी आस्था रखती थीं, परंतु राजा राममोहन राय लगातार हिन्दू भ्रांतिपूर्ण मान्यताओं और परंपराओं पर प्रश्नचिह्न लगा रहे थे। इसके चलते उनकी माँ उनसे रूठ भी गईं थीं। इसके बाद भी राममोहन ने अपना कदम पीछे नहीं लिए और निरंतर सती प्रथा के विरुद्ध संघर्ष करते रहे। फलस्वरूप इस आंदोलन को बल मिला और तत्कालीन अंग्रेजी सरकार को सती प्रथा को रोकने के लिये एक कानून बनाने पर विवश होना पड़ा। अंतत: 1829 में सती प्रथा रोकने का कानून पारित किया गया और सदा के लिए भारत से सती प्रथा का अंत हो गया।

सम्राट अकबर द्वितीय के एम्बेसेडर बने

राजा राममोहन राय ब्रह्म सभा के संस्थापक, ब्रह्म समाज के अग्रदूत, सामाजिक-धार्मिक सुधारक थे। उन्हें मुगल सम्राट अकबर द्वितीय द्वारा राजा की उपाधि दी गई थी। उन्होंने राजनीति, लोक प्रशासन, शिक्षा और धर्म के क्षेत्र में कई सराहनीय कार्य किए। 1830 में मुग़ल शासक अकबर द्वितीय ने उन्हें अपने एम्बेसेडर के रूप में राजा राममोहन राय को इंग्लैण्ड भेजा, क्योंकि राममोहन राय ही उस समय के सबसे पढ़े-लिखे विद्वान व्यक्तियों में से एक थे। उन्हें 11 भाषाएँ आती थीं। इंग्लैण्ड पहुँचने पर तमाम जानी-मानी हस्तियाँ उनसे मिलने के लिए आईं। काम का बोझ इतना बढ़ गया कि उनकी सेहत बिगड़ने लगी और 27 सितम्बर, 1833 को ब्रिस्टल के पास स्टैप्लेटॉन में मस्तिष्क ज्वर (Meningitis) के कारण उनका निधन हो गया। उन्हें इंग्लैंड में ही दफना दिया गया, क्योंकि उस समय लंदन में दाह-संस्कार पर रोक थी। 1843 में दुबारा ऑर्नोस वेल में उनकी समाधि बनाई गई, जिसका निर्माण ब्रिटिश स्कॉलर विलियम प्रिंसेप ने करवाया था, जो बंगाली गुम्बद या छतरी की तरह है।

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