मिलिए ‘मलेरिया’ से मिलवाने वाले डॉ. रोनाल्ड रॉस से, जो ‘ब्रिटिश’ होते हुए भी ‘भारतीय’ कहलाए…

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अहमदाबाद, 16 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। 1857 का विप्लव भारतीय स्वतंत्रता संग्रम का वह प्रथम चरण था, जब भारत के लोगों ने पहली बार ब्रिटिश शासन के विरूद्ध मोर्चा खोला था। जब देश के लोग ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह पर उतारू थे, उसी वर्ष एक ऐसे व्यक्ति का, जिसने दुनिया को मलेरिया से मिलवाया। इनका नाम है रोनाल्ड रॉस का, जो धर्म और संस्कृति से भले ही ब्रिटिश थे, परंतु मूलत: भारतीय कहलाए, क्योंकि उन्होंने भारत में जन्म लिया था और 25 वर्षों तक भारतीयों की सेवा की थी।

मच्छरों के काटने से होने वाली जिस बीमारी को आज हम मलेरिया के नाम से जानते हैं, उससे पूरी दुनिया का परिचय पहली बार डॉक्टर रोनाल्ड रॉस कराया ने ही था। उस दौर में मच्छरों के काटने के बाद होने वाली इस बीमारी से भारत में कई लोग काल का ग्रास बन जाते थे, परंतु रोनाल्ड रॉस ने मलेरिया की पहचान की, जिसके बाद चिकित्सा विज्ञान ने इस जानलेवा बीमारी का इलाज खोजा। आज हम डॉक्टर रोनाल्ड रॉस को इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज उनकी 87वीं पुण्यतिथि है। आज ही के दिन यानी 16 सितंबर, 1932 को डॉक्टर रोनाल्ड का लंदन में निधन हो गया था, वह 75 वर्ष के थे। 1857 में जब भारत ब्रिटिश हुक़ूमत से परेशान था, तब लोग मच्छरों के जानलेवा आतंक से भी परेशान थी। उस समय मादा मच्छरों के काटने से लोगों को एक घातक रोग हो जाता था, जिसकी वजह से उनकी मौत भी हो जाती थी। रोनाल्ड ने न सिर्फ इस अनाम बीमारी की खोज की, अपितु भारतीयों को इसके प्रकोप से बचाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई। रोनाल्ड की खोज के आधार पर ही मलेरिया से लड़ने के लिए दवाइयों का अविष्कार किया गया। आज काफी हद तक मलेरिया से बचाव संभव है। आइए जानते हैं, डॉक्टर रोनाल्ड के बारे में, जिन्होंने मलेरिया की खोज़ कैसे की ?

अल्मोड़ा में जन्मे थे रोनाल्ड रॉस

रोनाल्ड रॉस का जन्म 13 मई, 1857 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत में तत्कालीन आगरा-अवध (अब उत्तराखंड) के अल्मोड़ा जिले के कुमाऊँ क्षेत्र में हुआ था। उस समय भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध पहला विद्रोह चल रहा था। इसी कारण भारत में रहने वाले ब्रिटिश मूल के लोग जान बचाने के लिए मैदानी इलाकों से कुमाऊँ की पहाड़ियों पर चले गये, जिनमें रोनाल्ड रॉस के पिता सर कैम्पबैल क्लेब्रांट रॉस और पत्नी मलिदा चारलोटे एल्डरटन भी थे। रोनाल्ड के माता-पिता अल्मोड़ा पहुँचे। वहीं रोनाल्ड रॉस का जन्म हुआ। डा० रोनाल्ड अपने माता-पिता की दस संतानों में सबसे बड़े थे। डॉ. रोनाल्ड के पिता ब्रिटिश राज की भारतीय सेना के स्कॉटिश अफसर थे। रोनाल्ड रॉस जब आठ वर्ष के थे, तब उन्हें उनके चाचा-चाची के साथ इंग्लैंड के आइल ऑफ वाइट में भेज दिया गया, जहाँ रोनाल्ड ने अपनी प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद उनकी माध्यमिक शिक्षा इंग्लैंड के साउथऐम्पटन के निकट स्प्रिंगहिल नामक एक बोर्डिंग स्कूल में हुई, फिर इंग्लैंड में स्कूली शिक्षा खत्म करने के बाद उन्होंने पिता के दबाव में आकर लंदन के सेंट बर्थेलोम्यू मेडिकल स्कूल में प्रवेश ले लिया। मेडिकल शिक्षा पूरी होने के बाद वह इंडियन मेडिकल सर्विस की प्रवेश परीक्षा में बैठे, लेकिन उत्तीर्ण न हो सके। इसके बावजूद रोनाल्ड ने हार न मानते हुए उन्होंने अगले वर्ष दोबार परीक्षा दी, जिसमें वह 24 छात्रों में 17वें सथान पर रहे। आर्मी मेडिकल स्कूल में चार महीने की ट्रेंनिग के बाद, उन्हें मद्रास प्रेसिडेंसी में काम करने का मौका मिला।

कहाँ से आया मलेरिया शब्द और रॉस ने कैसे लगाई मुहर ?

Sir Ronald Ross (1857-1932), British physician, experimenting with mosquitoes. Ross’s research showed that malaria is not a water born-disease but is transmitted by a bite from an ^IAnopheles^i mosquito, which Ross referred to as ‘dapple-winged’. He also uncovered the life cycle of the plasmodium parasite that causes malaria. The parasite travels through the bloodstream of the female mosquito to the salivary gland, where it is injected into the victim when the mosquito bites. For this discovery Ross was awarded the 1902 Nobel prize for Physiology or Medicine.

जब से इतिहास लिखा जा रहा है, तबसे मलेरिया के वर्णन मिलते हैं। सबसे पुराना वर्णन चीन से 2700 ईसा पूर्व का मिलता है। मलेरिया शब्द की उत्पत्ति मध्यकालीन इटालियन भाषा के शब्दों ‘माला एरिया’ से हुई है, जिनका अर्थ है ‘बुरी हवा’। इसे ‘दलदली बुखार’ (marsh fever, मार्श फ़ीवर) या ‘एग’ (ague) भी कहा जाता था, क्योंकि यह दलदली क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैलता था। मलेरिया पर पहले पहल गंभीर वैज्ञानिक अध्ययन 1880 मे हुआ था, जब एक फ़्रांसीसी सैन्य चिकित्सक चार्ल्स लुई अल्फोंस लैवेरन ने अल्ज़ीरिया में काम करते हुए पहली बार लाल रक्त कोशिका के अन्दर परजीवी को देखा था। तब उसने यह प्रस्तावित किया कि मलेरिया रोग का कारण यह प्रोटोज़ोआ परजीवी है। इस तथा अन्य खोजों के लिए उसे 1907 का चिकित्सा नोबेल पुरस्कार दिया गया। इस प्रोटोज़ोआ का नाम प्लास्मोडियम इटालियन वैज्ञानिकों एत्तोरे मार्चियाफावा तथा आंजेलो सेली ने रखा था। इसके एक वर्ष बाद क्युबाई चिकित्सक कार्लोस फिनले ने पित्त ज्वर का इलाज करते हुए पहली बार यह दावा किया कि मच्छर रोग को एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य तक फैलाते हैं, परंतु इस बात को अकाट्य रूप प्रमाणित करने का कार्य सर रोनाल्ड रॉस ने मद्रास प्रेसिडेंसी स्थित सिकंदराबाद में काम करते हुए 20 अगस्त, 1897 में किया था। उन्होंने मच्छरों की विशेष जातियों से पक्षियों को कटवा कर उन मच्छरों की लार ग्रंथियों से परजीवी अलग कर के दिखाया, जिन्हे उन्होंने संक्रमित पक्षियों में पाला था। रोनाल्ड ने खोज़ निकाला कि एनोफ़िलीज़ मच्छर के काटने से लोगों को बुखार आता है और अंतत: वे मर जाते हैं। रोनाल्ड रॉस के अनुसार एनोफ़िलीज़ मच्छर, मच्छरों का एक वंश है। इसकी लगभग 400 जातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से 30 से 40 जातियाँ मलेरिया रोग का वहन करती हैं। इस कार्य हेतु उन्हे 1902 का चिकित्सा नोबेल मिला। उनका ज्यादातर काम मलेरिया पीड़ित सैनिकों के इलाज करने में ही बीता था। डॉक्टर रोनाल्ड ने देखा कि उपचार से रोगी ठीक तो हो जाता है, परंतु मलेरिया की वजह से लोगों की तेजी से मरने लगे। इस बात से परेशान होकर वह 7 वर्ष भारत में काम करने के बाद 1888 में इंग्लैंड लौट गए, जहाँ उन्होंने पब्लिक हेल्थ में डिप्लोमा किया, धीरे-धीरे रोनाल्ड प्रयोगशाला की तकनीकों और माइक्रोस्कोप का इस्तेमाल करने में माहिर हो गए। वर्ष 1889 में रोनाल्ड भारत वापस लौटे और उन्होंने मलेरिया पर थ्योरी बनाई। उनके पास बुखार का कोई भी रोगी आता, तो वह उसके खून का सैंपल रख लेते, फिर उस सैंपल को घंटों माइक्रोस्कोप के नीचे रखकर अध्ययन करते। वह खुद एक बार मलेरिया जैसी घातक बीमारी के शिकार हो चुके थे। उन्होंने एक हज़ार मच्छरों का विच्छेदन (Dissection) किया, जिससे पहली बार 20 अगस्त 1897 को मलेरिया बीमारी की खोज़ कर इतिहास रच दिया। रोनाल्ड की याद में और मलेरिया बीमारी के खोज़ के दिन को प्रतिवर्ष 20 अगस्त को विश्व मच्छर दिवस (World Mosquito Day) के रूप में मनाया जाता है।

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Health · News

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