ये हैं 1962 के ‘अभिनंदन’, जो 203 दिनों के बाद चीनी चौकसी को चीर कर जीवित लौटे थे

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* भारत-चीन युद्ध 1962 के हीरो थे धन सिंह थापा

* ‘मरणोपरांत परमवीर चक्र’ देने की घोषणा

* परिवार ने कर दी थी अंतिम संस्कार विधि

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 6 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत में 27 फरवरी, 2019 से पहले वायुसेना (INDIAN AIR FORCE) यानी IAF के जिस विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान को कोई जानता नहीं था, वही अभिनंदन वर्तमान भारतीय वायुसेना की बालाकोट एयर स्ट्राइक से बौखलाए पाकिस्तान द्वारा अमेरिकी फाइटर जेट F 16 से भारत पर किए गए हमले को MIG 21 से विफल करने के बाद HERO बन कर उभरे। अभिनंदन सिर्फ इसलिए हीरो नहीं बने कि उन्होंने भारत के पुराने फाइटर जेट मिग 21 से पाकिस्तान के आधुनिक अमेरिकी फाइटर जेट एफ 16 को मार गिराया, बल्कि वे इसलिए हीरो सिद्ध हुए, क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान के चंगुल में फँसने के बाद भी अपनी मूँछें ऊपर रखीं और दुश्मन के चंगुल में भी बहादुरी का जज़्जा बनाए रखा।

अभिनंदन वर्तमान तो 27 फरवरी, 2019 को सुबह 10 बजे पाकिस्तानी एफ-16 का पीछा करते हुए पीओके में पाकिस्तानी सेना द्वारा सीमा उल्लंघन के आरोप में गिरफ़्तार किए गए और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की सफल और संहारक कूटनीति के चलते केवल 60 घण्टों के भीतर यानी 2 मार्च, 2019 को रात 9.16 बजे सीना चौड़ा कर भारतीय भूमि पर लौट आए, परंतु आज हम ऐसे ही एक बहादुर जवान की बात करने जा रहे हैं, जिन्हें हम 1962 के भारत-चीन युद्ध का ‘अभिनंदन’ कह कर संबोधित कर सकते हैं। यह जवान भी दुश्मन के चंगुल में फँस गया था। वह दुश्मन पाकिस्तान जैसा छोटा देश नहीं, अपितु चालाक और दगाबाज़ चीन था, परंतु इस जवान ने चीन जैसे चालाक दुश्मन की सेना की चौकसी को ऐसा धता बताया कि 1962 के युद्ध में भारत पर मिली जीत भी चीन के लिए फीकी पकड़ गई।

थापा का थप्पड़ नहीं भूलेगा चीन

जी हाँ, हम जिनकी बात करने जा रहे हैं, उनका नाम है मेजर धन सिंह थापा। भारतीय थल सेना (INDIAN ARMY) के यह एक ऐसे वीर सिपाही हैं, जिन्होंने भारत-चीन युद्ध 1962 में सीमित जवानों और संसाधनों के बावजूद चीनी सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। मेजर धन सिंह थापा की बहादुरी का पूरा किस्सा हम आगे बताएँगे, पहले यह जान लीजिए कि हर भारतवासी को आज उन्हें क्यों स्मरण और प्रणाम करना चाहिए ? वास्तव में आज मेजर धन सिंह थापा की 14वीं पुण्यतिथि है। 1962 के युद्ध में चीनी जीत के जश्न पर मेजर धन सिंह थापा ने ऐसा थप्पड़ मारा था कि भारत ने अपने इस महान सपूत को अपने दूसरे सर्वोच्च सैन्य पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया था, परंतु आश्चर्य की बात यह है कि जब भारत सरकार ने थापा को परमवीर चक्र से सम्मानित करने की घोषणा की, तब भारत सरकार, पूरा भारत और स्वयं थापा का परिवार यह मान चुका था कि थापा शहीद हो चुके हैं। इसीलिए भारत सरकार ने मेजर धन सिंह थापा को ‘मरणोपरांत परमवीर चक्र’ देने की घोषणा की थी, परंतु वास्तविकता यह थी कि धन सिंह थापा जीवित थे।

वह सुबह, जब थापा ने खेली ख़ून की होली

10 अप्रैल, 1928 को हिमाचल प्रदेश के शिमला में एक साधारण परिवार में जन्मे धन सिंह के पिता का नाम पी. एस. थापा था। धन सिंह बचपन से ही देशभक्ति के रंग में रंगे हुए थे। उनकी इसी लगन ने उन्हें भारतीय सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित किया और वे सेना में शामिल होने में सफल भी हुए। 28 अगस्त, 1949 को भारतीय सेना ने धन सिंह थापा को अपने 8वीं गोरखा राइफल्स में कमीशन्ड अधिकारी के रूप में शामिल किया। थापा जब गोरखा राइफल्स में शामिल हुए, तब उन्हें अनुमान भी नहीं होगा कि 13 वर्षों के बाद वे भारत के महान वीर सपूत के रूप में एक महान कार्य को अंजाम देंगे। 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हुआ भारत स्वतंत्रता के हर्ष के साथ पाकिस्तान और चीन के साथ सीमा विवादों को लेकर परेशान था। एक तरफ पाकिस्तान परेशान कर रहा था, तो दूसरी तरफ चीन भारतीय सीमा में लगातार घुसपैठ कर रहा था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने चीनी घुसपैठ का जवाब देने के लिए फॉरवर्ड पॉलिसी लागू की। भारत इस पॉलिसी के तहत चीनी सीमा पर छोटी-छोटी पोस्ट स्थापित कर चीनी सैनिकों की घुसपैठ रोकना चाहता था। फॉरवर्ड पॉलिसी के तहत ही जम्मू-कश्मीर में लद्दाख से लगी हिमालयी चीनी सीमा पर पैंगॉञ्ग झील के उत्तरी किनारे पर 8वीं गोरखा बटालियन्स की सिरीजैप 1 नामक पोस्ट स्थापित की गई और इस पोस्ट की कमान मेजर धन सिंह थापा को सौंपी गई। इसी बीच 20 अक्टूबर, 1962 को चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया। चीन के चौतरफा आक्रमण का शिकार मेजर धन सिंह थापा की सिरिजैप वन चौकी भी हुई। 20 अक्टूबर, 1962 को सुबह 6 बजे ही चीनी सैनिकों ने पूरी ताक़त से थापा की चौकी पर हमला किया। चीनी सेना ने तोप और मोर्टार से ज़ोरदार बमबारी की। बमबारी के चलते वायरलेस पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और वहाँ तैनात थापा सहित सभी जवानों का सेना से सम्पर्क टूट गया। अब चीनी सेना का मुक़ाबला अकेले दम पर करने के अलावा थापा और उनके साथियों के पास कोई विकल्प नहीं था। थापा और उनके साथियों ने चीनी सैनिकों जम कर मुक़ाबला किया और एक बार तो चीनी सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया, परंतु कुछ घण्टों बाद चीनी सेना ने फिर हमला बोल दिया। इस बार वह बड़े दम-खम के साथ आई। इस आक्रमण का मेजर धन सिंह थापा और उनके साथियों ने बहादुरी से सामना किया, परंतु गोला-बारूद ख़त्म हो जाने के बाद भारत के कई सैनिक शहीद हो गए, तो तीन सैनिकों को युद्धबंदी बना लिया गया। इस चौकी पर चीनी सेना का नियंत्रण हो गया।

शहादत की घोषणा और 203 बाद जीवित लौटे थापा

जब चीनी सेना ने आगे बढ़ते हुए चुशूल चौकी पर भी कब्ज़ा कर लिया, तो भारत में यह मान लिया गया कि मेजर धन सिंह थापा और उनके सभी साथी वीरगति को प्राप्त हो गए। 28 अक्टूबर, 1962 को भारतीय सेना के तत्कालीन जनरल पी. एन. थापर ने थापा की पत्नी को पत्र लिख कर उनके शहीद होने की सूचना दी। परिवार में दुःख और शोक की लहर दौड़ गई, परंतु शौर्य और साहस का जज़्बा नहीं मरा। थापा के परिवार ने सीने पर पत्थर रख कर परिवारजनों ने उनके अन्तिम संस्कार की औपचारिकताएँ पूरी कर दीं। सेना के अनुरोध पर भारत सरकार ने मेजर धनसिंह थापा को मरणोपरान्त ‘परमवीर चक्र’ देने की घोषणा कर दी, परंतु लेकिन युद्ध समाप्त होने के बाद जब चीन ने भारत को उसके युद्धबंदियों की सूची दी, तो उसमें मेजर थापा का भी नाम था। इस समाचार से पूरे देश में प्रसन्नता फैल गयी। उनके घर देहरादून में उनकी माँ, बहन और पत्नी की खुशी की कोई सीमा न रही। इसी बीच उनकी पत्नी ने एक बालक को जन्म दिया था।

चाकचौबंद चीनी चौकसी को चीर दिया थापा ने

मेजर धन सिंह थापा को 21 अक्टूबर, 1962 को चीनी सैनिकों ने बंदी बनाया था, गोरखा परंपरा का निर्वहन करते हुए धन सिंह थापा चीनी युद्धबंदी शिविर से चीनी चौकसी को धता हुए वहाँ से भागने में सफल हुए। कई दिनों तक पहाडियों में भटकते रहने के बाद थापा भारतीय सीमा क्षेत्र में प्रविष्ट हुए और भारतीय सैनिक चौकी तक पहुँचे। वह घायल अवस्था में थे, परंतु इसके बावजूद उनके बुलंद हौसले ने अन्य भारतीय जवानो में भी नव उत्साह का संचार कर दिया। इस घटना ने ना केवल चीनी पक्ष का मनोबल गिराया, वरन भारतीय सैनिको की निर्भीकता से दुनियाभर को संदेश भी दिया । 10 मई, 1963 को भारत लौटने पर सेना मुख्यालय में उनका भव्य स्वागत किया गया। दो दिन बाद 12 मई को वे अपने घर देहरादून पहुँच गये; पर वहाँ उनका अन्तिम संस्कार हो चुका था और उनकी पत्नी विधवा की तरह रह रही थी। अतः गोरखों की धार्मिक परम्पराओं के अनुसार उनके कुल पुरोहित ने उनका मुण्डन कर फिर से नामकरण किया। इसके बाद उन्हें विवाह की वेदी पर खड़े होकर अग्नि के सात फेरे लेने पड़े। इस प्रकार अपनी पत्नी के साथ उनका वैवाहिक जीवन फिर से प्रारम्भ हुआ।

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