वह अफ्रीका था, जहाँ महात्मा गांधी को चलती ट्रेन से फेंका गया, पर यह तो इटावा था, फिर भी…?

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 8 जुलाई 2019 (युवाप्रेस डॉट कॉम)। देश जब गोरों की गुलामी झेल रहा था, तब दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी का ट्रेन में अपमान हुआ था, परंतु अब आज़ाद भारत में ही एक शर्मसार करने वाली घटना घटित हुई है। यह घटना दर्शाती है कि भले ही देश से अंग्रेज चले गये हों, परंतु देश आज भी मानसिक गुलामी से आज़ाद नहीं हो पाया है। गुलामी के समय तो गांधीजी का अपमान विदेश में हुआ था, परंतु अब अपने ही देश में गांधी विचारधारा का दिन प्रति दिन घोर अपमान हो रहा है। बात उत्तर प्रदेश के इटावा रेलवे स्टेशन की है, जहाँ गांधीजी की तरह ही शरीर पर धोती पहने एक बुजुर्ग को ट्रेन में चढ़ने से रोक दिया गया।

अब स्वदेश में ही होने लगा गांधी का अपमान

घटना 4 जुलाई की है। 72 वर्ष की आयु के बुजुर्ग रामअवध दास ने इटावा से गाजियाबाद जाने के लिये कानपुर-दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन में टिकट बुक करवाया था। ट्रेन नंबर 12033 कानपुर-नई दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस के सी-2 कोच में 72 नंबर की सीट रामअवध के नाम बुक थी। शताब्दी एक्सप्रेस इटावा स्टेशन पर मात्र 2 मिनट के लिये ठहरती है। ट्रेन आई तो रामअवध दास कोच में चढ़ने के लिये आगे बढ़े, परंतु कोच अटेंडेंट ने उन्हें कोच में चढ़ने से रोक दिया। रामअवध दास ने कोच अटेंडेंट को टिकट भी दिखाया। इसके बावजूद कोच अटेंडेंट ने उन्हें ट्रेन में नहीं चढ़ने दिया। इसका कारण था कि रामअवध दास ने धोती पहन रखी थी और हाथ में एक कपड़े का झोला और एक छाता था।

भारतीय लिबास का अपमान, उड़ाया मज़ाक

इतना ही नहीं, कोच अटेंडेंट के साथ खड़े सुरक्षाकर्मी ने रामअवध के कपड़ों का मज़ाक भी उड़ाया और कोच से नीचे उतरने के लिये भी कहा। इस घटना से रामअवध ने खुद को बहुत अपमानित महसूस किया। चूँकि ट्रेन 2 मिनट ही रुकती है, इसलिये कोच अटेंडेंट और सुरक्षाकर्मी के साथ जद्दोजहद में वक्त निकल गया और ट्रेन चल पड़ी। रामअवध दास स्टेशन पर ही खड़े रह गये। इसके बाद तुरंत रामअवध स्टेशन मास्टर प्रिंस राज यादव से मिले और उनसे कोच अटेंडेंट तथा सुरक्षाकर्मी के दुर्व्यवहार की शिकायत की।

एसी कोच के टिकट के बावजूद जनरल कोच में जाना पड़ा

शर्मसार करने वाली इस घटना की एक और विडंबना तो यह है कि रेलवे अधिकारियों ने इस घटना को दबाने के लिये मगध एक्सप्रेस में सीट ऑफर करके रामअवध दास को शांत करने का प्रयास किया, परंतु रामअवध ने उनका ऑफर स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। रामअवध का कहना है कि उन्हें रेलवे अधिकारियों के व्यवहार से बहुत बुरा लग रहा था, क्योंकि वह सरासर उनका अपमान पर अपमान किये जा रहे थे। इसलिये उन्होंने निश्चय किया कि उन्हें रेलवे में अपमानित किये जाने वाली इस घटना की शिकायत दर्ज करवानी है। रेलवे अधिकारियों ने पर्दा डालने की बहुत कोशिश की, परंतु वह रामअवध की जिद के सामने सफल नहीं हो पाये। अंततः रामअवध ने रेलवे में शिकायत दर्ज करवाई। इसके बाद रामअवध अगली ट्रेन से जनरल कोच में यात्रा करके गाजियाबाद गये।

भारतीयों का और कितना वैचारिक पतन होगा ?

इस घटना ने दर्शाया है कि अंग्रेजी शिक्षा ने हमारे भारतीय समाज का कितना मानसिक पतन किया है। स्वयं को शिक्षित और सभ्य समाज कहने वाले लोगों की दृष्टि में भारतीय लिबास धोती, कुर्ता, पायजामा आदि को हीन दृष्टि से देखने वाले और पेंट शर्ट, टी-शर्ट, जींस को सभ्यता का प्रतीक मानने वाले लोग, क्या इस घटना से कोई सबक लेंगे ? या अपने ही देश में भारतीयता का यूँ ही अपमान होता रहेगा। सरकारी स्तर पर ऑफिस दफ्तरों में गांधीजी की तस्वीरें लगाई जाती हैं और राजनीति में भी गांधी विचारधारा पर चलने के दावे-प्रतिदावे किये जाते हैं, परंतु यह दावे कितने खोखले हैं, यह भी इस घटना ने दिखाया है, क्योंकि वास्तव में यह अपमान रामअवध दास का नहीं था, बल्कि उनके वस्त्रों का था जो उन्होंने धारण किये थे। सवाल उठता है कि हमारा वैचारिक पतन और कितना नीचे जाएगा या इसमें सुधार के लिये कोई कारगर कदम उठाए जाएंगे ? क्या उन रेलवे अधिकारियों के विरुद्ध कोई कार्यवाही की जाएगी ?

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