अद्भुत, अकल्पनीय, अविश्वसनीय, परंतु सत्य ! क्या आप जानते हैं कि जिस जनक नंदिनी सीता के कारण पूरी रामायण हुई, वह जनक जन्मे ही नहीं थे !

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इस समाचार का शीर्षक पढ़ कर भगवान राम और महान पौराणिक ग्रंथ रामायण पर अटूट श्रद्धा रखने वालों को आश्चर्य अवश्य हुआ होगा। इतिहास और तथ्यों को ही सत्य मानने वाली आज की विज्ञान युग की आधुनिक दुनिया भले ही भारत के सनातन धर्म (जिसे आज लोग हिन्दू धर्म के रूप में सीमित देखते हैं) को पौराणिक, मायथोलॉजी या मान्यता के रूप में प्रचारित करे, परंतु महान भूमि भारत का सनातन धर्म और उसकी संस्कृति में उल्लेखित भगवान विष्णु के प्रथम अवतार सनकादि मुनि से लेकर 23वें अवतार भगवान बुद्ध तक के प्रमाण उनके कर्मों, उनकी वाणी, उनके ज्ञान और उनके उपदेश के रूप में आज भी समग्र विश्व की मानव जाति को प्रेरणा देते हैं।

आइए अब बात करते हैं शीर्षक की। राम और रामायण की जानकारी रखने वाले सहित प्रत्येक सनातन धर्मी (मैं हिन्दू धर्म का प्रयोग नहीं करूँगा) इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि भगवान विष्णु के 21वें अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने असुरराज लंकाधिपति रावण का वध करने के लिए माता कौशल्या की कोख से जन्म लिया था। 24 अवतारों में केवल दो ही पूर्ण अवतार हैं। पहला पूर्ण अवतार भगवान श्री राम का था, जबकि दूसरा पूर्ण अवतार भगवान श्री कृष्ण का। हम बात भगवान राम की ही करेंगे। आज भी हम अपने आम जीवन में अक्सर यह उदाहरण देते हैं कि पूरी रामायण सीता के कारण हुई।

सीता यानी मिथिला के राजा जनक की पुत्री। सीता के जन्म को लेकर अनेक कथाएँ होंगी, परंतु सीता के जनक (पिता) के जन्म के बारे में जानते हैं आप ? जिस सीता के कारण रामायण हुई, उनके पिता राजा जनक थे, परंतु क्या आप जानते हैं कि जनक का जन्म ही नहीं हुआ था ? पहली दृष्टि में आपको यह बात असत्य लगेगी, क्योंकि हर व्यक्ति यदि दिखाई देता है, तो उसने अवश्य किसी न किसी माँ के गर्भ से जन्म अवश्य लिया होता है। आपका यह मत सत्य है कि जनक की भी माता थी, परंतु जनक कौन थे?

इस प्रश्न का उत्तर देते हैं महान आध्यात्मिक संत स्वामी तद्रूपानंदजी। अहमदाबाद में गुजरात युनिवर्सिटी क्षेत्र स्थित जीएमडीसी कन्वेंशन हॉल में कैडिला फार्मास्युटिकल्स की ओर से इंद्रवदन मोदी और सुशीलाबेन मोदी की पुण्य स्मृति में आयोजित अष्टावक्र गीता चिंतन सत्र में राजा जनक और उनके गुरु अष्टावक्र के संवाद पर आधारित महान ग्रंथ महागीता अर्थात् अष्टावक्र गीता के श्लोकों को उद्घृत करते हुए स्वामी तद्रूपानंदजी यह बात सिद्ध करके दिखाते हैं कि जनक यह भली-भाँति जान चुके थे कि उनका न कभी जन्म हुआ था और न ही वे कभी मरने वाले हैं। वे जन्म से पहले भी थे, जन्म के दौरान भी सभी कर्तव्य कर्म एक विदेही (देहाभिमान से मुक्त) के रूप में कर रहे थे और देह की मृत्य के बाद भी वे जीवित रहेंगे।

स्वामी तद्रूपानंद अष्टावक्र गीता के विभिन्न श्लोकों पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि राजा जनक को गुरु अष्टावक्र के माध्यम से स्वयं की अपरोक्षानुभूति हो चुकी थी। वे यह जान चुके थे कि वे जो दिखते हैं, वे वह हैं नहीं। जनक की जो दशा थी, वह विदेही थी। विदेही का अर्थ है देह से स्वयं को अलग अनुभूत करना। जनक को लेकर कई उदाहरण हैं, जिनमें यह बताया गया है कि पूरी मिथिला नगरी को आग लगने के बावजूद जनक विचलित नहीं होते, क्योंकि वे अच्छी तरह जानते थे कि या तो इस विश्व में उनका कुछ नहीं है या यह पूरा विश्व उनका है या वह स्वयं ही पूरा विश्व हैं। इस विश्व में ऐसा कुछ नहीं, जो उनका है। ऐसे में वह भला मिथिला नगरी में आग की ज्वालाएँ उठने से परेशान कैसे हो सकते थे।

राजा जनक की इस अजन्मा दशा को समझने के लिए आपको अष्टावक्र गीता का अध्ययन अवश्य करना चाहिए, क्योंकि यहाँ सब कुछ शब्दों में पिरो पाना संभव नहीं है। स्वामी तद्रूपानंदजी अहमदाबाद में प्रति वर्ष अष्टावक्र गीता चिंतन सत्र में इस ग्रंथ पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं और इस वर्ष वे गत 27 मार्च से जीएमडीसी कन्वेंशन हॉल में बार-बार एक ही उदाहरणों को दोहराते हुए आत्मा की नित्यता और देह की नश्वरता को डंके की चोट पर सिद्ध कर रहे हैं।
(गुरु अर्पण)

नोट : अहमदाबाद में स्वामी तद्रूपानंद का अष्टावक्र गीता पर चल रहा चिंतन सत्र अब अंतिम पड़ाव है अर्थात् आज (रविवार) को इस सत्र का अंतिम दिन है। जो भी आत्म-ज्ञान की अभिलाषा रखता है, वह यदि पिछले 6 दिनों तक इस सत्र में न जा सका हो, तो उसके लिए आज 31 मार्च, 2019 रविवार अंतिम अवसर है। यह प्रवचन सायं 5.00 से 7.00 बजे तक होगा।

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