‘ब्रह्मोस’, जिसका चीन-पाकिस्तान के पास भी नहीं है तोड़ : जानिए नाम और विशेषता

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रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 30 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत ने रक्षा क्षेत्र में सोमवार को एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की। उपलब्धि का यह इतिहास रचा गया ओडिशा में चांदीपुर रेंज स्थित समुद्री तट पर, जहाँ ज़मीन (थल) पर मार करने वाली सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल ब्रह्मोस का ज़मीन से सफल परीक्षण किया। इससे पहले ब्रह्मोस के समुद्र (जल) और आकाश (नभ) से मार करने वाले संस्करणों के सफल परीक्षण किए जा चुके हैं। इसके साथ ही ब्रह्मोस अब ऐसी मिसाइल के रूप में परीक्षित हो चुकी है, जो जल, नभ और थल तीनों जगहों से दुश्मन को पलक झपकते ही नष्ट कर सकती है।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने सोमवार को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल के थलीय संस्करण का सफल परीक्षण किया। अचूक मारक क्षमता वाली ब्रह्मोस मिसाइल अब जल, थल और नभ से दुश्मनों पर वार करने वाली मिसाइल बन गई है। ब्रह्मोस एक ऐसी मिसाइल है, जिसका तोड़ भारत के सबसे बड़े और खुले शत्रु पाकिस्तान और छिपे शत्रु चीन के पास भी नहीं है, क्योंकि दोनों ही देशों के पास ऐसी कोई मिसाइल नहीं है, जिसे ज़मीन, समुद्र और आसमान तीनों जगहों से दागा जा सके।

कैसे और क्यों पड़ा ‘ब्रह्मोस’ नाम ?

ब्रह्मोस का विशेषताएँ जानने से पहले आपको यह बताते हैं कि इस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल का नाम ब्रह्मोस ही क्यों है ? वास्तव में इस मिसाइल को भारत और रूस ने संयुक्त रूप से विकसित किया है, इसलिए इस मिसाइल का नाम भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की नस्कवा नदी को मिला कर ब्रह्मोस रखा गया है। ब्रह्मोस को ब्रह्मोस रूस की पी-800 ओंकिस क्रूज़ मिसाइल की प्रौद्योगिकी (टेक्नोलॉजी) पर आधारित है। भारत के DRDO तथा रूस के सरकारी उद्यम NPO Mashinostroyenia यानी (NPOM) ने भारत-रूस सकारों के बीच हुए रक्षा समझौते के अंतर्गत 12 फरवरी, 1998 को ब्रह्मोस ( BrahMos Aerospace) नामक कंपनी की स्थापना की और ब्रह्मोस मिसाइल के निर्माण का आरंभ हुआ। वर्तमान में ब्रह्मोस कम दूरी की रैमजेट इंजन युक्त, सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। इसे पनडुब्बी से, पानी के जहाज से, लड़ाकू विमान से या जमीन से दागा जा सकता है। ब्रह्मोस मिसाइल को दिन अथवा रात तथा हर मौसम में दागा जा सकता है। इस मिसाइल की मारक क्षमता अचूक है। यद्यपि रैजमेट इंजन की सहायता से ब्रह्मोस की क्षमता 3 गुना तक बढ़ाई जा सकती है। भारत और रूस दोनों इसी दिशा में काम कर रहे हैं, ताकि ब्रह्मोस की रेंज 290 किलोमीटर से बढ़ा कर 600 किलोमीटर तक की जा सके। ऐसा होते ही पूरा पाकिस्तान ब्रह्मोस की रेंज में आ जाएगा और कोई भी टारगेट पलक झपकते ही इस मिसाइल से नष्ट हो जाएगा।

3 वर्ष में ही पहला और सफल परीक्षण

भारत यानी डीआरडीओ तथा रूस यानी एनपीओएम ने कड़े परिश्रम से ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल का ज़मीन से ज़मीन पर वार करने वाला संस्करण तीन वर्षों में ही तैयार कर लिया और 12 जून, 2001 को चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (ITR) से पहला सफल परीक्षण किया गया। 14 जून, 2004 को मोबाइल लॉन्चर से पुन: परीक्षण किया गया। 5 मार्च, 2008 को आक्रमण संस्करण (अटैक वर्ज़न) का आईएनएस राजपूत से परीक्षण किया गया, जिसमें ब्रह्मोस ने लक्ष्य को सफलतापूर्वक साधा। 18 दिसम्बर, 2008 को ब्रह्मोस का वर्टिकल लॉन्च आईएनएस रणवीर में शामिल हुआ। 20 मार्च, 2013 को ब्रह्मोस के सबमरीन संस्करण का बंगाल की खाड़ी स्थित विशाखापट्टनम से सफल परीक्षण किया गया। 22 नवम्बर, 2017 को सुखोई विमान से ब्रह्मोस का सफल परीक्षण हुआ। कई प्रकार के परीक्षणों के बाद आज ब्रह्मोस भारतीय थलसेना (INDIAN ARMY), भारतीय वायुसेना (INDIAN ARI FORCE) यानी IAF और भारतीय नौसेना (INDIAN NAVY) तीनों का महत्वपूर्ण रक्षात्मक हिस्सा बन चुकी है।

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