सूत्रपाती साराभाई : धरती से लेकर चांद तक है इस ‘अमदावादी’ गुजराती का बोलबाला

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* डॉ. विक्रम साराभाई की 100वीं जयंती पर विशेष

* कूट-कूट कर भरा हुआ था ‘अंतरिक्ष राष्ट्रवाद’

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 12 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। एक शताब्दी पहले का वह दौर था, जब हर घर में बड़े-बड़े परिवार हुआ करते थे। एक माता-पिता की 6 से 10 संतानें हुआ करती थीं। सेठ अंबालाल और सरलादेवी भी ऐसे ही एक दम्पतियों में एक थे, जो शिक्षित और धनाढ्य थे। इसके बावजूद उनके यहाँ 5 पुत्रियों व 3 पुत्रों सहित 8 संतानों ने जन्म लिया था, परंतु वे नहीं जानते थे कि उन्होंने 8 संतानों नहीं, अपितु अष्ट रत्नों को जन्म दिया है। इन्हीं अष्ट रत्नों में एक रत्न तो ऐसे हीरे की तरह चमका कि मृत्यु के 100 साल बाद भी उतनी ही ओजस्विता से चमक रहा है।

जी हाँ। हम बात कर रहे हैं डॉ। विक्रम साराभाई की। अंबालाल और सरलादेवी के तीसरे पुत्र साराभाई की आज 100वीं जयंती है। ठीक 100 वर्ष पहले 12 अगस्त, 1919 को गुजरात की आर्थिक राजधानी और कपड़ा मिलों के कारण भारत के मान्चेस्टर के रूप में प्रसिद्ध अहमदाबाद में कपड़ा उद्योगपति सेठ अंबालाल के घर माता सरलादेवी की कोख से जन्म लिया था। साराभाई के निधन को भले ही आज 100 साल हो गए हों, परंतु साराभाई ने अपनी 52 वर्ष की अल्पायु में जो और जितना किया, उसका लोहा पूरा देश और विश्व मानता है। यही कारण है कि इस अहमदाबादी गुजराती का बोलबाला आज धरती से लेकर चांद तक है।

डॉ। विक्रम साराभाई सदैव एक सूत्रपाती की भूमिका में रहे। वैसे वे महान भारतीय वैज्ञानिक के रूप में प्रसिद्ध हैं, परंतु उनके कर्मयोग को देखने के बाद उन्हें केवल वैज्ञानिक कहना उनके साथ अन्याय होगा। वे सूत्रपाती थे, क्योंकि वे नित्य-निरंतर नए-नए कार्यों और आविष्कारों का सूत्रपात करते थे। आज जिस भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने मंगल मिशन व चंद्रयान 2 मिशन जैसी सफलताओं का सूत्रपात किया है, उस इसरो का सूत्रपात भी साराभाई ही थे। यही कारण है कि साराभाई को भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा जाता है और इसीलिए चंद्रयान 2 के लैण्ड रोवर का नाम भी इसरो ने विक्रम रखा था, जो साराभाई का ही नाम है। ऐसा नहीं है कि चंद्रयान 2 चंद्र पर पहुँचेगा, तभी साराभाई का नाम चंद्र पर पहुँचेगा। साराभाई का नाम तो 45 साल पहले ही चंद्र पर दर्ज हो चुका है। 1974 में सिडनी स्थित अंतरराष्ट्रीय खगोल विज्ञान संघ ने चंद्र के सी ऑफ सेरेनिटी पर स्थित बेसल नामक मून क्रेटर को साराभाई क्रेटर नाम देकर साराभाई को चंद्र पर अविस्मरणीय बना दिया।

भारतीय पुनर्जागरण काल के प्रतिनिधि साराभाई

19वीं शताब्दी का वह दौर भारतीय पुनर्जागरण का दौर था। देश स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा था। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और रवीन्द्रनाथ टैगोर सैकड़ों लोग उस दौर में अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे थे। उस दौर में साराभाई ने अपने देश की सेवा के लिए एक अलग ही रास्ता चुना। वे स्वतंत्रता आंदोलन से तो नहीं जुड़े। अहमदाबाद कॉलेज से इंटरमीडिएट तक विज्ञान की शिक्षा पूरी करने के बाद साराभाई 1937 में इंग्लैण्ड स्थित कैम्ब्रिज गए, जहाँ उन्होंने 19440 में प्राकृतिक विज्ञान में ट्राइपोज़ डिग्री प्राप्त की। जब द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ, तो साराभाई भारत लौट आए और बेंगलौर स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (IIS) में नौकरी करने लगे। यहाँ उन्हें भारत के महान वैज्ञानिक सी। वी। रमण का सान्निध्य मिला। यहाँ साराभाई ने कॉस्मिक किरणों पर अनुसंधान किया। इसी बीच आईआईएस में ही साराभाई को अपने जीवन के उद्देश्य को पूर्ण करने की पगडंडी मिली, जब उनकी मुलाकात भारत के प्रथम परमाणु वैज्ञानिक डॉ। होमी जहाँगीर भाभा से हुई। भाभा पूरी दुनिया में परमाणु वैज्ञानिक के रूप में स्थापित और प्रसिद्ध हो चुके थे। यद्यपि साराभाई और भाभा दो विपरीत ध्रुव थे। दोनों ने कॉस्मिक किरणों के क्षेत्र में अनुसंधान किया था, परंतु भाभा जहाँ अणु विज्ञान में दिलचस्पी रखते थे, वहीं साराभाई की रुचि अंतरिक्ष विज्ञान में थी।

साराभाई ने अहमदाबाद को बनाया कार्य क्षेत्र

1947 में विक्रम साराभाई ने अपनी जन्म भूमि अहमदाबाद को कर्म भूमि बना लिया। उन्होंने 1947 में अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL) की स्थापना की। पिता की वित्तीय सहायता से स्थापित पीआरएल को साराभाई ने कुछ ही वर्षों में विश्व स्तरीय संस्थान बना दिया और इस बात ने भारत सरकार का भी ध्यान खींचा। इसके बाद साराभाई ने पारिवारिक कारोबार में हाथ आजमाया और गुजरात के साथ देश के कई हिस्सों में उद्योगों की स्थाना की। उन्होंने साराभाई केमिकल्स, साराभाई ग्लास, सेमिबायोटिक्स लिमिटेड, साराभाई इंजीनियर ग्रुप जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों की स्थापना की। इतना ही नहीं अहमदाबाद में देश के पहले भारतीय प्रबंध संस्थान (IIM) का सूत्रपात भी साराभाई ने ही किया। इतना कुछ करने के बावजूद साराभाई के खोजी मन का एक तार कॉस्मिक किरणों और अंतरिक्ष विज्ञान में अधिक रमता था।

रूस के स्पूतनिक ने साराभाई में जगाया ‘अंतरिक्ष राष्ट्रवाद’

आज भारत की अंतरिक्ष विश्व में सफलता को भी राष्ट्रवाद से जोड़ कर देखा जाता है और यह सही भी है, परंतु इसका सूत्रपात भी साराभाई के हाथों ही हुआ था। दरअसल जुलाई-1957 में रूस ने दुनिया का पहला उपग्रह स्पूतनिक पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया। इसने साराभाई के मन में छिपे राष्ट्रवाद को जगा दिया। उस समय रूस और अमेरिका सहित 50 से अधिक देशों ने अंतरिक्ष अनुसंधान क्षेत्र में एक वर्षीय परियोजना के लिए गठबंधन किया था। साराभाई चाहते थे कि भारत भी इसका हिस्सा हो। उन्होंने नेहरू सरकार को प्रस्ताव भेजा। सरकार ने उनका प्रस्ताव मान लिया, क्योंकि स्पूतनिक की लॉन्चिंग के बाद दुनिया भर के देशों की अंतरिक्ष में रुचि बढ़ गई थी। साराभाई की सलाह पर ही नेहरू ने 1962 में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (इनकॉस्पर) बनाई। इसकी कमान साराभाई को ही सौंपी गई। यही इनकॉस्पर 15 अगस्त, 1969 को इसरो बना। साराबाई इसरो के प्रथम अध्यक्ष बनाए गए। उन्हें परमाणु वैज्ञानिक भाभा का भरपूर सहयोग मिला। साराभाई के नेतृत्व में ही भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम आरंभ हुआ और 1963 में भाभा के मार्गदर्शन व साराभाई के नेतृत्व में इसरो ने केरल के थुंबा से भारत का पहला प्रायोगिक रॉकेट छोड़ा। यह रॉकेट अमेरिका निर्मित था। साराभाई भारत निर्मित रॉकेट छोड़ना चाहते थे। भारत को अपना रॉकेट बनाने में चार साल का समय लगा। इसी बीच साराभाई को बड़ा झटका उस समय लगा, जब 10 जनवरी, 1966 को भाभा का विमान दुर्घटना में निधन हो गया। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की बैठक में भाग लेने जा रहे भाभा का विमान स्विट्ज़रलैण्ड के ऊपर क्रैश हो गया। भाभा की मृत्यु को लेकर साज़िश की भी आशंका व्यक्त की जाती है।

टेलीविज़न प्रसारण के सूत्रपाती साराभाई

भाभा के निधन के बाद साराभाई पर ज़िम्मेदारियाँ बड़ गईं। इस बीच अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा संचार उपग्रह एटीएस-6 से प्रसार का परीक्षण करने की तैयारी में थी। साराभाई ने नासा से सम्पर्क कर उसे भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रयोग करने के लिए सहमत किया था। इसके तहत भारत में जो प्रायोगिक टीवी प्रसारण होना था उसे ‘साइट’ यानी सेटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपरिमेंट नाम दिया गया। यह अपनी तरह का दुनिया का सबसे बड़ा प्रयोग होने जा रहा था। ‘साइट’ एक अगस्त, 1975 से 31 जुलाई, 1976 तक चला। इसके तहत छह राज्यों के तकरीबन 2,500 गांवों को चुना गया था। इस प्रयोग के लिए जमीनी स्तर पर सभी काम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) की देखरेख में किए गए। ‘साइट’ के बारे में कहा जाता है इसके माध्यम से उस समय लाखों लोगों ने पहली बार टीवी पर कार्यक्रम देखे थे। तब ये कार्यक्रम ऑल इंडिया रेडियो के प्रोडक्शन विभाग ने तैयार किए थे। ‘साइट’ परियोजना समाप्त होने के बाद जब सरकार ने इसका आकलन करवाया तो पता चला इन क्षेत्रों में ग्रामीण आबादी पर कार्यक्रमों का व्यापक सकारात्मक असर पड़ा था। दूसरा जो सबसे महत्वपूर्ण फायदा भारत को मिला वह यह था कि हमारे वैज्ञानिक व इंजीनियर संचार उपग्रह की कार्यप्रणाली से इस हद तक परिचित हो गए कि अब वे स्वदेशी उपग्रह बना सकते थे। अंतत: भारतीय वैज्ञानिकों ने 1982 में इनसेट-1ए अंतरिक्ष में पहुंचाकर यह करके भी दिखाया। इस तरह भारत को संचार उपग्रह के क्षेत्र में लाने के पीछे भी डॉ साराभाई की दूरदृष्टि कारगर साबित हुई थी। हालांकि जब ‘साइट’ का परीक्षण शुरू हुआ तब उसे देखने के लिए साराभाई मौजूद नहीं थे। 30 दिसंबर, 1971 को उनकी मृत्यु उसी स्थान के नजदीक हुई थी जहां उन्होंने भारत के पहले रॉकेट का परीक्षण किया था। दिसंबर के आखिरी हफ्ते में वे थुंबा में एक रूसी रॉकेट का परीक्षण देखने पहुँचे थे और यहीं कोवलम बीच के एक रिसॉर्ट में रात के समय सोते हुए उनकी मृत्यु हो गई।

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