क्या है ‘सरकोमा’, जिसने जेटली की जान लेकर ही दम लिया ?

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 24 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली का शनिवार को निधन हो गया। 67 वर्ष के अरुण जेटली ने दोपहर 12.07 बजे अंतिम साँस ली। वह लंबे समय से अस्वस्थ थे और 9 अगस्त से साँस लेने में तकलीफ के चलते दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सायंस (एम्स-AIIMS) में भर्ती थे। वैसे तो अरुण जेटली को किडनी की बीमारी थी और उन्होंने अपना मोटापा घटाने के लिये बैरिएट्रिक सर्जरी भी करवाई थी, परंतु उनकी मृत्यु का कारण बना नर्म ऊतक का कर्क रोग यानी सॉफ्ट टिशू सरकोमा (SOFT TISSUE SARCOMA)।

सॉफ्ट टिशू सर्कोमा (SOFT TISSUE SARCOMA)

सॉफ्ट टिशू सर्कोमा शरीर के फैट, मसल्स, नर्व्स, फाइबर टिशू, रक्त धमनियाँ या फिर डीप स्किन टिशू (ऊतक) में विकसित होता है। यह टिशू शरीर के किसी भी हिस्से में पाये जा सकते हैं, मुख्यतया सॉफ्ट टिशू सर्कोमा या सॉफ्ट टिशू कैंसर की शुरुआत पेट, हाथ (कंधों समेत) या पैरों से होती है। हमारे सॉफ्ट टिशू में मामूली गाँठें (ट्यूमर) होती हैं, मामूली गाँठें यानी जिनमें कैंसर नहीं होता है। यह मामूली गाँठें शरीर के अन्य हिस्सों में नहीं फैलती हैं। भाजपा के सीनियर नेता अरुण जेटली किडनी की बीमारी के अलावा बाएँ पैर की जांघ में सॉफ्ट टिशू कैंसर से भी पीड़ित थे। उन्होंने पिछले साल मई में दिल्ली के एम्स अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट करवाई थी। जबकि सॉफ्ट टिशू कैंसर की सर्जरी के लिये वह इसी साल जनवरी में न्यूयॉर्क-अमेरिका गये थे।

क्या हैं सॉफ्ट टिशू सर्कोमा के लक्षण ?

मानव शरीर में कई प्रकार के सॉफ्ट टिशू ट्यूमर (गाँठें) होते हैं, परंतु सभी कैंसरस नहीं होते हैं। अर्थात् मामूली गाँठें होती हैं, जिनमें कैंसर नहीं होता है और वह शरीर के दूसरे हिस्सों में भी नहीं फैलती हैं। हालांकि जब उनके साथ सर्कोमा शब्द जुड़ जाता है, तो इसका अर्थ होता है कि किसी गाँठ में कैंसर विकसित हो गया है और यह सब जानते हैं कि कैंसर एक प्राणघातक बीमारी है। वैसे सर्कोमा या कैंसर तीन प्रकार का होता है, जो हड्डी, मांसपेशियों या रक्त में होता है। हड्डी में कैंसर होने पर उस हड्डी को निकाल दिया जाता है। अन्य अंगों में भी कैंसर होने पर उस प्रभावित हिस्से का कई प्रकार से उपचार किया जाता है। जैसे कि डॉक्टर्स इमेजिंग टेस्ट, बायोप्सी, सर्जरी, रेडिएशन, कीमोथेरापी और दवाइयों के जरिये इलाज करते हैं। रक्त कैंसर के मामले में रक्त को समय-समय पर बदलना पड़ता है। जबकि सॉफ्ट टिशू सरकोमा शरीर के चारों ओर मौजूद टिशू में होता है, जैसे कि मांसपेशियों में, वसा, रक्त वाहिनियों (धमनियों) में और तंत्रिकाओं के साथ-साथ जोड़ों (जोइंट्स) में। इस बीमारी के 50 से भी अधिक उप प्रकार हैं। कुछ प्रकार बच्चों को हो सकते हैं। सबसे ज्यादा युवा इसकी चपेट में आते हैं। इस बीमारी को डायग्नोसिस करना थोड़ा मुश्किल होता है क्योंकि यह कई प्रकार से बढ़ती है। प्रारंभिक स्तर पर ही इसका पता चल जाए तो सर्जरी से इस बीमारी पर जीत पाई जा सकती है।

शरीर में कोई गाँठ उभरना या सूजन होना

शरीर में विशेषकर नसों और मांसपेशियों में दर्द रहना और धीरे-धीरे दर्द का बढ़ते जाना

पेट में दर्द होना और बढ़ना

किसी मौजूदा गाँठ का आकार बदलना या बढ़ना

भूख नहीं लगना, शरीर क्षीण होते जाना

दस्त या उल्टी में खून आने पर सावधान हो जाना चाहिये और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिये।

सरकोमा से बचने के आसान उपाय

सरकोमा से बचने का एक सबसे आसान उपाय यह है कि सुबह सूर्योदय से पहले उठना चाहिये और सूर्योदय होने के बाद सूर्य की नर्म धूप लेनी चाहिये। सूर्योदय के समय नर्म किरणों में विटामिन डी भरपूर मात्रा में होता है। यह किरणें हमारी त्वचा को भेदकर शरीर के आरपार जाती हैं और पूरे शरीर को विटामिन तथा ऊर्जा से भर देती हैं। सूर्य की धूप लेने से कैंसर से बचने में मदद मिलती है या कैंसर से जल्दी निपटने में भी मदद मिलती है। इसके अलावा यदि उपरोक्त लक्षणों से सरकोमा का संदेह उत्पन्न हो तो डॉक्टर से संपर्क करके इसका समय पर उपचार कराना ही सबसे उचित उपाय है।

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Health · News

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