मकान से श्मशान के बीच : श्रेष्ठ वक्ता चुने जाने से लेकर अंतिम क्षणों तक ‘सिंह गर्जना’ करती रहीं सुषमा

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* कश्मीर पर अंतिम ‘संतोषपूर्ण’ ट्वीट के बाद ली अंतिम साँस

रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 7 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। कहते हैं यह जीवन क्षणभंगुर है। यह बात कई बार नहीं, अपितु बार-बार सही सिद्ध होती रही है। भारत की पूर्व विदेश मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) की दिग्गज नेता सुषमा स्वराज के असामयिक व अप्रत्याशित निधन ने इस एक बार इस महावाक्य का सही सिद्ध कर दिया कि वास्तव में जीवन क्षणभंगुर है। मकान से शुरू होने वाला इंसान का जीवन श्मशान पर समाप्त हो जाता है, परंतु मकान से श्मशान के बीच की इस यात्रा में जो इस जीवन में कुछ कर गुजरता है, वही दुनिया में अपने नाम को अमरत्व प्रदान कर पाता है।

सुषमा स्वराज भी ऐसी ही व्यक्तित्व थीं। 14 फरवरी, 1952 को तत्कालीन पंजाब (अब हरियाणा) की अंबाला छावनी में हरदेव शर्मा तथा लक्ष्मी देवी के घर (मकान) में जन्मीं सुषमा स्वराज का 67 वर्ष 5 महीनों 23 दिनों का जीवन आज श्मान पर जाकर समाप्त हो जाएगा, परंतु मकान से श्माशन तक के बीच सुषमा स्वराज भारतीय सार्वजनिक जीवन, लोकतंत्र, उसके मंदिर संसद और यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र महासभा सहित कई देशों के मंचों पर सिंह गर्जना करती रहीं और अंतिम साँसें लेने से पहले भी सुषमा ने चंद घण्टे पहले अंतिम ट्वीट कर देश को यह अनुभूति कराई कि वे भले ही चुनावी राजनीति से दूर हो गई हैं, परंतु देश के ज्वलंत मुद्दों पर उनकी बराबर नज़र है। सुषमा ने सोमवार को निधन से चंद घण्टों पहले कश्मीर में धारा 370 की समाप्ति वाला विधेयक राज्यसभा के बाद लोकसभा से भी पारित होने पर अत्यंत हर्ष के साथ ट्वीट किया, ‘प्रधान मंत्री जी – आपका हार्दिक अभिनन्दन। मैं अपने जीवन में इस दिन को देखने की प्रतीक्षा कर रही थी।’ हम अनुमान लगा सकते हैं कि यह ट्वीट करते समय सुषमा के मन में अत्यंत हर्ष और संतोष का भाव रहा होगा, क्योंकि सुषमा सहित पूरी भाजपा, उसके पूर्व स्वरूप जनसंघ और उसकी मातृसंस्था आरएसएस का एक-एक नेता वर्षों से कश्मीर को धारा 370 से मुक्ति दिलाने के अभियान में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ा हुआ था।

कॉलेज काल से ही सुषमा के वक्ता गुण खिले

सुषमा स्वराज के पिता हरदेव शर्मा आरएसएस के प्रमुख सदस्य रहे थे। उनका परिवार मूल रूप से लाहौर के धरमपुरा क्षेत्र का निवासी था, परंतु विभाजन के बाद वह अंबाला आ बसा था। सुषमा ने प्रारंभिक शिक्षा के बाद अंबाला के सनातन धर्म कॉलेज से संस्कृत व राजीनीतिक विज्ञान में स्नातक किया। 1970 में सुषमा को उनके इसी कॉलेज ने सर्वश्रेष्ठ छात्रा के रूप में सम्मानित किया। इसके बाद सुषमा लगातार तीन वर्षों तक एस. डी. कॉलेज छावनी की एनसीसी की सर्वश्रेष्ठ कैडेट और तीन साल तक पंजाब राज्य राज्य की श्रेष्ठ वक्ता से चुनी गईं। सुषमा की वक्तव्य कला को 1973 में सबसे बड़ा सम्मान तब मिला, जब पंजाब विश्वविद्यालय-चंडीगढ़ ने उन्हें सर्वोच्च वक्ता का सम्मान दिया। सुषमा ने इसी विश्वविद्यालय से विधि (लॉ) की डिग्री हासिल की और 1973 में ही उच्चतम् न्यायालय (SC) में अधिवक्ता के रूप में काम करने लगीं। 1973 में श्रेष्ठ वक्ता का सर्वोच्च सम्मान हासिल करने वालीं सुषमा स्वराज की आवाज़ इसके बाद देश-विदेश में खूब गूंजी और गरजी और अंतिम साँसें लेने से पहले अंतिम ट्वीट तक गरजती रही।

एबीवीपी-जनता पार्टी से शुरुआत और भाजपा पर मुकाम

एक तरफ सुषमा स्वराज सर्वोच्च वक्ता पुरस्कार से सम्मानित हुईं, दसरी तरफ उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (ABVP) जॉइन की। इसी दौरान 13 जुलाई, 1975 को सुषमा ने सुप्रीम कोर्ट में अपने सहकर्मी और साथी अधिवक्ता स्वराज कौशल से विवाह किया। स्वराज समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस के निकटस्थ थे। यही कारण था कि 1975 में आपातकाल के विरुद्ध चले आंदोलन के दौरान सुषमा स्वराज फर्नांडीस की लीगल टीम का हिस्सा बनीं। आपातकाल के विरुद्ध आंदोलन के दौरान सुषमा ने जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। इसके बाद देश में जनता पार्टी का उदय हुआ और सुषमा इस पार्टी से जुड़ गईं। सुषमा का चुनावी जीवन 1977 में आरंभ हुा, जब वे हरियाणा विधानसभा चुनाव 1977 में अंबाला छावनी विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुनी गईं और हरियाणा में चौधरी देवी लाल की सरकार में श्रम मंत्री बनीं। इसके साथ ही सुषमा ने 25 वर्ष की आयु में केबिनेट मंत्री बनने का रिकॉर्ड अपने नाम किया। बाद में जब जनता पार्टी में बिखराव होने लगा और 1980 में देश में जनसंघ के नए रूप भाजपा का उदय हुा, तो सुषमा ने भाजपा का रुख कर लिया। वे 1987 में पुन: अंबाला छावनी से विधाक चुनी गईं और हरियाणा की भाजपा-लोकदल संयुक्त सरकार में शिक्षा मंत्री रहीं।

सोनिया को चुनौती देकर राष्ट्रीय राजनीति में छा गईं सुषमा

भाजपा में शामिल होने के बाद सुषमा स्वराज ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। 1990 में सुषमा हरियाणा से राज्यसभा पहुँचीं। लोकसभा चुनाव 1996 में सुषमा दक्षिण दिल्ली से पहली बार चुनाव जीत कर सांसद बनीं और 13 दिन के लिए ही सही, वाजपेयी सरकार में पहली बार केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनीं। लोकसभा चुनाव 1998 में सुषमा पुन: दक्षिण दिल्ली से जीतीं और 13 महीने की वाजपेयी सरकार में दूरसंचार मंत्री रहीं। भाजपा की एक अनुशासित कार्यकर्ता के रूप में सुषमा को जैसे ही आदेश मिला, उन्होंने अक्टूबर-1998 में तत्काल केन्द्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया और 12 अक्टूबर, 1998 को दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। यद्यपि वे ज्यादा दिन इस पद पर नहीं रह सकीं। सितम्बर-1999 में भाजपा ने सुषमा के कंधों पर फिर एक बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपीं और उन्हें तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विरुद्ध बेल्लारी (कर्नाटक) से चुनाव मैदान में उतारा। यद्यपि वे 7 प्रतिशत मतों के अंतर से चुनाव हार गईं। इसके बाद सुषमा पुन: 2000 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा पहुँच कर संसद में लौट आईं और वाजपेयी मंत्रिमंडल में पुन: सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का कामकाज संभाल लिया। वे वाजपेयी सरकार की हार (2004) तक केन्द्रीय मंत्री रहीं। 2006 में सुषमा स्वराज मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद चुनी गईं।

विदिशा से विदेश मंत्री तक का सफर

राष्ट्रीय राजनीति में अब तक सुषमा स्वराज राज्यसभा सांसद के रूप में सक्रिय थीं, परंतु लोकसभा चुनाव 2009 में पहली बार वे मध्य प्रदेश के विदिशा से चुनाव जीत कर संसद के निचले सदन लोकसभा पहुँचीं। इन चुनावों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा, परंतु विपक्ष के नेता का पद सुषमा स्वराज को मिला। सोनिया गांधी के बाद सुषमा स्वराज देश की दूसरी महिला विपक्ष की नेता थीं। सुषमा स्वराज 21 दिसम्बर, 2009 से 18 मई, 2014 तक विपक्ष की नेता रहीं और 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनते ही सुषमा स्वराज भारत की प्रथम महिला विदेश मंत्री बनीं। सुषमा ने पाँच वर्षों तक देश के विदेश मंत्री के रूप में सफल और उत्कृष्ट सेवाएँ दीं। इस दौरान संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत का मजबूत पक्ष रखने से लेकर अनेक देशों में सुषमा ने भारत का प्रतिनिधित्व किया और मोदी की कूटनीतिक सफलताओं की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

चुनावी राजनीति से संन्यास के बावजूद सक्रिय रहीं

सुषमा स्वराज ने लोकसभा चुनाव 2019 में भाग नहीं लिया। उन्होंने चुनाव से पहले ही घोषणा कर दी थी कि वे अब चुनाव नहीं लड़ेंगी। सुषमा स्वराज को डायबिटीज़ और किडनी की बीमारी थी। डायबिटीज़ के कारण उनकी किडनी पर अत्यंत बुरा असर पड़ा था। यद्यपि किडनी के सफल इलाज के बाद वे स्वस्थ हो गई थीं। इसके बावजूद उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने का निर्णय किया। यद्यपि मोदी मंत्रिमंडल के दूसरे शपथ ग्रहण समारोह में उत्साहपूर्वक भाग लेकर भाजपा के राजनीतिक विरोधियों की इन अटकलों को विराम लगा दिया कि सुषमा स्वराज नाराज हैं। चुनावी राजनीति से संन्यास ले लेने के बावजूद सुषमा स्वराज सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहीं और सोशल मीडिया पर देश और मोदी सरकार से जुड़े कार्यों पर अपनी राय रखती रहीं। सुषमा ने अंतिम ट्वीट कश्मीर को लेकर किया, परंतु मोदी सरकार के दोबारा सत्ता में आने के बाद आरंभ 17 जून से आरंभ हुए संसद सत्र के दौरान सुषमा लगातार ट्विटर पर सक्रिय रहीं। उन्होंने चंद्रयान 2, कारगिल युद्ध विजय दिवस, आज़म खान विवाद, तीन तलाक़ बिल और 5 अगस्त को जब गृह अमित शाह के राज्यसभा में कश्मीर पर बड़े फैसले की घोषणा सहित तमाम घटनाक्रमों पर ट्वीट किए, जो दर्शाता है कि सुषमा स्वराज सर्वोच्च वक्ता से लेकर अंतिम साँस तक सिंह गर्जना करती रहीं।

आप भी देखिए सुषमा स्वराज के अंतिम दिनों के ट्वीट्स :

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