श्यामजी कृष्ण वर्मा, जिन्हें भूल चुका था ‘भारत’, पर मोदी ने 56 वर्ष बाद याद दिलाया

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अहमदाबाद 4 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में वैसे तो तो अनेक सेनानियों ने अपने प्राणों का बलिदान किया है, परंतु आज हम आपको एक ऐसे क्रांतिकारी से परिचित कराने जा रहे हैं, जिन्होंने विदेश में रह कर स्वाधीनता की ज्योति जलाए रखी थी। उन्होंने न सिर्फ विदेश से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी, अपितु विदेश में एक इंडियन हाउस की स्थापना कर भारतीय छात्रों के लिए छात्रवृत्ति की भी शुरूआत की। उनका नाम है श्यामजी कृष्ण वर्मा। क्रांतिकारी गतिविधियों के माध्यम से भारत की आज़ादी के संकल्प को गतिशील करने वाले अध्यवसायी एवं कई क्रांतिकारियों के प्रेरणास्रोत थे। वे प्रथम भारतीय थे, जिन्हें ऑक्सफोर्ड से एम॰ए॰ और बार-ऐट-ला की उपाधियाँ मिली थीं। पुणे में दिये गये उनके संस्कृत के भाषण से प्रभावित होकर मोनियर विलियम्स ने वर्मा को ऑक्सफोर्ड में संस्कृत का सहायक प्रोफेसर बना दिया था। उन्होंने लन्दन में इण्डिया हाउस की स्थापना की, जो इंग्लैण्ड जाकर पढ़ने वाले छात्रों के परस्पर मिलन एवं विविध विचार-विमर्श का एक प्रमुख केन्द्र था। आज हम श्यामजी कृष्ण वर्मा को इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज उनकी 162वीं जयंती है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट कर श्याम कृष्ण को श्रद्धांजलि दी है। आइए जानते हैं श्याम कृष्ण वर्मा की विजय गाथा।

1857 की प्रथम क्रांति के बीच जन्मे वर्मा

1857 भारतीय इतिहास में एक ऐसा ऐतिहासिक वर्ष था, जब 110 वर्षों की अंग्रेजी दासता के विरुद्ध पहली बार भारत में अलग-अलग गुटों ने विद्रोह किया था। इसी दौरान श्यामजी कृष्ण वर्मा का 4 अक्टूबर, 1857 को गुजरात में कच्छ के मांडवी में श्रीकृष्ण वर्मा के घर जन्म हुआ। श्यामजी कृष्ण वर्मा ने 1888 में अजमेर से अपनी वक़ालत की पढ़ाई की। वक़ालत के दौरान ही उन्होंने भारत की स्वाधीनता के लिये कार्य करना शुरू कर दिया था। वक़ालत करने के बाद उन्होंने मध्य प्रदेश के रतलाम और उसके बाद गुजरात के जूनागढ़ रजवाड़े में दीवान पद पर कार्य किया। इसी दौरान वर्मा देश में अंग्रेजों के विरुद्ध भड़क रही धधकती चिनगारी से अछूते नहीं रह सके। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रेरित श्यामजी कृष्ण वर्मा भी धीरे-धीरे क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर रुख करने लगे। तब उनकी आयु मात्र 20 वर्ष थी।

विदेशी धरती पर क्रांति की चिनगारी

1918 के बर्लिन और इंग्लैण्ड में हुए विद्या सम्मेलनों में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व भी किया। इंग्लैंड जाकर उन्होंने देखा की वहाँ रहने वाले और पढ़ाई करने वाले छात्रों की स्थिति अधिक गंभीर है। इंग्लैंड से वापस लौटने का बाद श्याम कृष्ण को इंग्लैंड में रह रहे भारतीयों कि चिंता सताने लगी और 1897 में वे पुनः इंग्लैण्ड गये। कुछ वर्ष वहाँ रहने के बाद उन्होंने स्थिति को समझा और 1905 में जब बंगाल में बंगभंग का खेल खेला जा रहा था, इंग्लैंड में रह रहे श्याम कृष्ण ने इंग्लैड के एक अधिकारी लॉर्ड कर्जन की नीतियों के विरुद्ध संघर्ष शुरू कर दिया। इसी वर्ष इंग्लैण्ड से मासिक समाचार-पत्र ‘द इण्डियन सोशियोलोजिस्ट’ निकाला गया, जो आगे चल कर जिनेवा से भी प्रकाशित हुआ। उस समय कई भारतीय छात्रों को आवास की मांग करते समय नस्लवादी दृष्टिकोण का सामना करना पड़ा रहा था, जिसका विरोध करने लिए 18 फरवरी 1905 को वर्मा ने द इंडियन होम रूल सोसाइटी (Indian Home Rule Society) संगठन की स्थापना की। उनके हाईगेट होम में आयोजित पहली बैठक में सर्वसम्मति से द इंडियन होम रूल सोसाइटी को भारत के लिए होम रूल सुरक्षित करने, व्यावहारिक तरीकों से भारतीयों को इंग्लैंड में प्रचार पर ले जाने और भारत के लोगों में स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एकता के उद्देश्यों के बनाया गया था। उसके बाद उन्होंने 65, क्रॉमवेल एवेन्यू, हाईगेट पर आधारित भारतीय छात्रों के लिए एक छात्रावास के रूप में इंडिया हाउस की स्थापना की। 25 छात्रों के लिए रहने वाले इस आवास का औपचारिक रूप से उद्घाटन 1 जुलाई को दादाभाई नौरोजी, लाला लाजपत राय, मैडम कामा, मिस्टर स्वाइन (लंदन पोज़िटिविस्ट सोसाइटी), श्री हैरी की उपस्थिति में सोशल डेमोक्रेटिक फेडरेशन के हेनरी हंडमैन ने किया।

इंग्लैंड में छात्रवृत्ति की शुरुआत

इंडिया हाउस क्रांतिकारी छात्रों के लिये प्रेरणास्रोत सिद्ध हुआ और यहीं इंग्लैंड में स्वतंत्रता आंदोलन की आग धधक उठी। इंडिया हाउस से जलाई गई मशाल को लिए क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा, जो इंग्लैंड में शिक्षा प्राप्ति के लिए संघर्ष कर रहे थे, शहीद हो गये। मदन लाल पर विलियम हट कर्जन वायली नामक एक ब्रिटिश अधिकारी की गोली मार कर हत्या करने का आरोप था। कर्जन वायली की हत्या के आरोप में उन पर 22 जुलाई, 1909 का अभियोग चलाया गया। मदन लाल ढींगरा ने अदालत में कहा था कि ‘मुझे गर्व है कि मैं अपना जीवन समर्पित कर रहा हूँ।’ उनकी शहादत पर को सम्मान देने के लिए श्यामजी कृष्ण वर्मा ने इंग्लैंड में छात्रवृत्ति की शुरुआत की।

स्वतन्त्रता के 56 वर्ष बाद गुजरात लाई गईं अस्थियाँ

31 मार्च, 1930 को जिनेवा के एक अस्पताल में श्यामजी कृष्ण कृष्ण का निधन हो गया। उनका शव अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों के कारण भारत नहीं लाया जा सका और वहीं उनकी अन्त्येष्टि कर दी गयी। वर्माजी का दाह संस्कार करके उनकी अस्थियों को जिनेवा की सेण्ट जॉर्ज सीमेट्री में सुरक्षित रख दिया गया। बाद में उनकी पत्नी भानुमती कृष्ण वर्मा का जब निधन हो गया तो उनकी अस्थियाँ भी उसी सीमेट्री में रख दी गयीं। श्यामजी कृष्ण वर्मा के निधन के 17 वर्षों के बाद भारत 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, परंतु स्वतंत्रता के बाद भी भारत की तत्कालीन सरकारों ने 56 वर्षों तक वर्मा की अस्थियाँ स्वदेश लाने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए। इसी दौरान 7 अक्टूबर, 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री बने नरेन्द्र मोदी ने 22 अगस्त, 2003 को स्विट्ज़रलैण्ड सरकार से अनुरोध किया और श्यामजी कृष्ण वर्मा और उनकी पत्नी भानुमती की अस्थियों को भारत मँगाया। मोदी स्वयं जिनेवा गए और वर्मा की अस्थियाँ लेकर भारत आए। मुम्बई से लेकर माण्डवी तक पूरे राजकीय सम्मान के साथ वर्मा की अस्थियों का भव्य जुलूस निकाला गया और उनके अस्थि-कलशों को गुजरात लाया गया।

श्याम कृष्ण वर्मा के जन्म स्थान में दर्शनीय क्रान्ति तीर्थ बनाकर उसके परिसर स्थित श्याम कृष्ण वर्मा स्मृति कक्ष में उनकी अस्थियों को संरक्षित रखा गया है। साथ ही उनके जन्म स्थान पर गुजरात सरकार ने विकसित श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा मेमोरियल की स्थापना भी की, जिसका उद्घाटन मोदी ने 13 दिसम्बर, 2010 को किया। आज यह पर्यटकों के लिये माण्डवी का क्रान्ति-तीर्थ पर्यटन स्थल बन चुका है।

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