EXCLUSIVE : हिन्दू विरोधी वामपंथी ‘चरमपंथ’ की पराकाष्ठा हैं इरफान हबीब !

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* संसद निर्मित-राष्ट्रपति हस्ताक्षरित अधिनियम पर किसी राज्यपाल का वक्तव्य कैसे अनुचित ?

विशेष रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 31 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत में सहस्त्रों राजनीतिक दल हैं, परंतु मुख्य प्रतिद्वंद्विता केवल और केवल दक्षिण पंथ और वामपंथ के बीच है। वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में दो सबसे बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) प्रखर दक्षिण पंथी दल है, वहीं कांग्रेस (CONGRESS) वामपंथ और दक्षिण पंथ के गोते खाता राजनीतिक दल। स्वतंत्रता से पूर्व राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस भी कभी दक्षिण पंथी पार्टी रही थी, परंतु महात्मा गांधी के निधन और स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में इस पार्टी पर वामपंथी विचारधारा निरंतर हावी होती गई। आज देश में भले ही वामपंथी (LEFTIST) राजनीतिक दलों का शासन केरल तक सिमट कर रह गया हो, परंतु कांग्रेस वहाँ भी वामपंथियों की साझीदार है।

वामपंथ साम्यवाद की एक उत्तम विचारधारा से प्रभावित रहा है, जिसमें सबको समान अधिकार की बात है, परंतु भारत में वामपंथ का आगमन केवल और केवल समानता के नाम पर हिन्दू विरोध का पर्याय बन कर रह गया है। बहुसंख्यक हिन्दुओं के समकक्ष सभी धर्मों और पंथों के लिए समान अधिकार की बात करने वाला वामपंथ कई बार हिन्दुओं से उनके अधिकार छीनने तक की सीमा तक चला गया और देश में अधिकांश समय तक शासन करने वाली कांग्रेस इस हिन्दू विरोधी मानसिकता से ग्रस्त वामपंथी विचारधारा में ऐसी घुल-मिल गई कि उसने वोट बैंक की राजनीति के लिए समान अधिकार की बात करते हुए मुस्लिम तुष्टीकरण का मार्ग अपनाया, जो आज उसे रसातल पर ला चुका है। भारतीय शिक्षा पद्धति और पाठ्यक्रमों में भी वामपंथी विचारधारा का ही बोलबाला रहा है, जिसके कारण हमारी कई पीढ़ियों को मुग़लों के शासन से अंग्रेज़ी शासन के इतिहास के बारे में तो पता होता है, परंतु जब कौन बनेगा करोड़पति (KBC) में BOLLYWOOD की विख्यात अभिनेत्री व राम-रामायण की भावना से ओतप्रोत परिवार में रहने वाली सोनाक्षी सिन्हा से अमिताभ बच्चन यह प्रश्न करते हैं कि लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी कौन लाया था, तो उसका उत्तर वह नहीं दे पातीं। सोनाक्षी सिन्हा इतने सरल प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकीं, क्योंकि उनकी शिक्षा-दीक्षा वामपंथी विचारधारा, शिक्षा पद्धति, पाठ्यक्रम और उस पर पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित है। ऐसी अकेली सोनाक्षी नहीं हैं। देश की नई युवा पीढ़ी भी इन्हीं कारणों से हमारी पुरातन-प्राचीन सनातन धर्म-संस्कृति से अनभिज्ञ है।

चलिए अब शीर्षक पर आते हैं। भारतीय लोकतंत्र में सर्वोच्च स्थान संसद का है। यदि संसद ने कोई अधिनियम पारित कर दिया है और राष्ट्रपति तक ने उस पर अपनी मुहर लगा दी है, तो उस अधिनियम पर बोलने का अधिकार प्रत्येक भारतीय नागरिक को होता है। कुछ लोगों को किसी अधिनियम पर आपत्ति हो सकती है और वे उसका विरोध कर सकते हैं, परंतु किसी को उस अधिनियम के पक्ष में बोलने से कोई कैसे रोक सकता है ? इस पर भी यदि कोई राज्यपाल किसी अधिनियम पर बोल रहा हो, जो राष्ट्रपति का प्रतिनिधि होता है, तो उसका बोलना किस प्रकार अनुचित हो सकता है और उसे बोलने से कैसे रोका जा सकता है ? परंतु ऐसी हिमाक़त भी इस लोकतांत्रिक देश में की जा सकती है, क्योंकि भारत एक सहिष्णु देश है, परंतु सहिष्णुता का यह अर्थ कदापि नहीं है कि कोई व्यक्ति, चाहे वह कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो, राज्यपाल जैसे गरिमामय पद पर विराजित व्यक्ति को किसी अधिनियम पर बोलने से रोक दे।

घटना वामपंथी शासन वाले राज्य केरल की है, जहाँ राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को संसद द्वारा निर्मित और राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित नागरिकता संशोधन अधिनियम (Citizenship Amendment Act) यानी CAA और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (National Register of Citizens) यानी NRC पर वक्तव्य देने से रोका गया। यह हिमाक़त किसी साधारण व्यक्ति ने नहीं की, अपितु ‘असाधारण’ व्यक्ति ने की। यहाँ असाधारण को इन्वर्टेड कॉमा में इसलिए लिखा है, क्योंकि राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को सीएए और एनआरसी पर बोलने से रोकने वाले महानुभाव का नाम है इरफान हबीब। इरफान हब्बीब ने कुन्नूर मं आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान जब राज्यपाल खान सीएए और एनआरसी के पक्ष में वक्तव्य दे रहे थे, तब उन्हें स्पीच देने से रोक दिया। इरफान हबीब यह भूल जाते हैं कि वे यह दुस्साहस भी इसलिए कर सके, क्योंकि वे भारत जैसे लोकतांत्रिक और सहिष्णु स्वभाव वाले हिन्दुओं के बहुसंख्यक के बीच रहते हैं। भारत से इतर किसी अन्य देश में उन्होंने यह दुस्साहस किया होता, तो कदाचित अभी राजद्रोह के आरोप में जेल में होते।

अधिक पीछे नहीं गए हबीब, इसीलिए नहीं हैं भारत के क़रीब

इरफान हबीब को भारत में इतिहासकार का दर्जा मिला हुआ है, परंतु किसी को इतिहासकार कैसे मान लिया जाए, जो किसी देश के इतिहास के चुनिंद पन्नों को ही खंगाले। 1931 में जन्मे इरफान हबीब को कांग्रेस के शासनकाल में 6 जवाहरलाल नेहरू फेलोशिप (1968), वातुमुल पुरस्कार (1982) व पद्म भूषण (2005) से सम्मानित किया गया, तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार हबीब को यश भारती पुरस्कार से सम्मानित कर चुकी है, परंतु क्या हबीब का लिखा-पढ़ा इतिहास वास्तव में भारत को यश दिलाता है ? हबीब ने भारत के उस इतिहास का अध्ययन किया है, जो 900-1000 वर्ष पुराना है। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि हबीब के इतिहास में अधिकांशत: मुग़ल काल और अंग्रेजी शासन काल शामिल रहा होगा। उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं, जिसमें एक का नाम है 1556-1707 एग्रोरियन सिस्टम ऑफ मुग़ल इंडिया। इरफान हबीब को वामपंथी विचारधारा पिता मोहम्मद हबीब से मिली है, जो मार्क्सवादी इतिहासकार और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के विचारक थे। जहाँ तक इरफान हबीब की बात है, तो उन्होंने भारत के ऐतिहासिक भूगोल, भारतीय प्रौद्योगिकी के इतिहास, मध्यकालीन प्रशासनिक व आर्थिक इतिहास, उपनिवेशवाद और भारत पर इसके प्रभाव तथा इतिहास लेखन पर काम किया है, परंतु दुर्भाग्य की बात यह है कि इरफान हबीब इससे अधिक पीछे नहीं गए। उन्होंने भारत के ज्ञान भंडारों, धर्म-शास्त्रों, सनातन धर्म, प्राचीन-पुरातन संस्कृति पर कोई इतिहास नहीं लिखा है, क्योंकि इरफान हबीब ही क्या, आज हर कोई हमारी प्राचीन धरोहर को मायथोलॉजी (पौराणिक मान्यता) में खपा देता है। यही कारण है कि इरफान हबीब मूल भारत, भारत की मूल भावना के क़रीब नहीं हैं। वामपंथ की विचारधारा से प्रभावित इरफान हबीब को भला दक्षिण पंथी पार्टी भाजपा की सरकार द्वारा लाए गए सीएए के माध्यम से सहस्त्रों प्रताड़ित हिन्दुओं की वेदना की अनुभूति कैसे होगी ? यह हमारी समझ से परे है कि सीएए का विरोध क्यों हो रहा है ? विपक्षी राजनीतिक दल तो सीएए में मुस्लिमों को शामिल नहीं किए जाने को भारतीय मुस्लिम विरोधी बताने का घोर पाप कर रहे हैं, परंतु इरफान हबीब जैसे व्यक्ति को क्यों लगता है कि सीएए भारतीय मुसलमानों के विरुद्ध है ? उन्होंने सीएए पर बोलने से भी जिस व्यक्ति को रोका, वे स्वयं एक मुस्लिम हैं, परंतु इरफान हबीब एक व्यक्ति नहीं, अपितु हिन्दू विरोधी वामपंथी विचारधारा के द्योतक हैं।

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