विचित्र, किंतु सत्य : इस घोड़े के कारण पहली बार गुजरात में बाढ़ को ‘घोडापूर’ कहा गया !

Written by

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 2 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। गुजरात में भारी वर्षा के बीच पिछले दो दिनों से सबसे अधिक चर्चा में कोई शहर है, तो वह है स्मार्ट सिटी बनने की ओर अग्रसर संस्कार नगरी वडोदरा। वडोदरा में गत बुधवार को कुछ ही घण्टों में हुई एक साथ 20 इंच बरसात ने स्मार्ट सिटी और संस्कार नगरी वडोदरा को बुरी तरह और पूरी तरह डुबो दिया है।

समग्र वडोदरा शहर में जगह-जगह पानी भरा हुआ है। सड़क से सोसाइटियों तक और गली-मोहल्लों से घरों तक हर जगह पानी घुस गया। शहर से सटी विश्वामित्री नदी के उफान ने वडोदरा की स्थिति और भी ख़राब कर दी। शहर में जहाँ एक ओर जलजमाव के बीच सैकड़ों लोग फँस गए, वहीं प्रशासन, सेना और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन दल (NDRF) की टीमों ने बड़े पैमाने पर राहत और बचाव अभियान चला कर पानी फँसे लोगों को बचाने का अभियान छेड़ा, जो आज भी जारी है।

वैसे, आज हम बात वडोदरा में हुई भारी वर्षा, उससे फैली अव्यवस्था, परेशानी और दिक्कतों की नहीं करने जा रहे। हम बात करने जा रहे हैं ‘घोडापूर’ शब्द की उत्पत्ति की। गुजरात में गुजराती भाषा में अक्सर भारी वर्षा के बाद आने वाली बाढ़, नदी में बड़े पैमाने पर पानी आने जैसी घटनाओं के लिए घोडापूर शब्द का उपयोग होता है।

पुराने गुजराती प्रिंट मीडिया से लेकर आधुनिक गुजराती वेब और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आज भी भारी वर्षा और बाढ़ की स्थिति के लिए घोडापूर शब्द का उपयोग होता है। गुजराती पाठकों को भले ही इस शब्द का अर्थ पता नहीं है, परंतु शब्द का भावार्थ पता है और घोडापूर शब्द आते ही प्रत्येक गुजराती पाठक को यह अनुमान हो जाता है कि जहाँ घोडापूर आया है, वहाँ भीषण बाढ़, भारी वर्षा, नदियों में भारी उफान, जलजमाव हुआ होगा।

परंतु आपको जान कर आश्चर्य होगा कि 1927 से पहले गुजराती शब्दकोश में घोडापूर जैसा कोई शब्द था ही नहीं। घोडापूर शब्द की उत्पत्ति उसी वडोदरा से हुई है, जो आज घोडापूर यानी बाढ़ और जलमग्नता से दो-चार हो रहा है। पहली बार घोडापूर शब्द का उपयोग वडोदरा में ही जुलाई-1927 में आई बाढ़ के दौरान किया गया था। वडोदरा का इतिहास बताने वाली वेबसाइट https://historyofvadodara.in/the-floods/ के अनुसार जुलाई-1927 में वडोदरा रिकॉर्ड 90 इंच बरसात हुई थी। इसमें भी 30 इंच वर्षा जुलाई के अंतिम चार दिनों में हुई थी। इस 30 इंच भारी वर्षा के चलते विश्वामित्री नदी में भारी उफान आया था। विश्वामित्री नदी का पानी वडोदरा शहर में घुस गया। हालात इतने बिगड़ गए कि वडोदरा शहर में विश्वामित्री नदी के निकट सयाजी बाग़ (कमाटी बाग़) क्षेत्र में स्थापित महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय की काले घोड़े पर सवार प्रतिमा भी बाढ़ के पानी से घिर गई। चूँकि 30 इंच बरसात हुई थी, इसीलिए बाढ़ का पानी लगातार बढ़ रहा था और यह पानी इतना बढ़ गया कि महाराजा सयाजीराव की प्रतिमा जिस काले घोड़े पर सवार थी, उस काले घोड़े के पैरों को छू गया। बस, तभी से वडोदरा के लोगों ने इस बाढ़ को घोडापूर कह कर संबोधित किया और गुजराती शब्दकोश में बाढ़ के पर्याववाची शब्द के रूप में घोडापूर जुड़ गया।

कौन थे महाराजा सयाजीराव तृतीय ?

महाराजा सयाजीराव तृतीय की काले घोड़े पर सवार यह प्रतिमा आम जनता के सहयोग से महाराजा के 50वें जन्म दिवस के उपलक्ष्य में स्थापित की गई थी। यह उस समय की अभूतपूर्व इंजीनियरिंग और महाराजा सयाजीराव के कौशल का ही परिणाम था कि भीषण बाढ़ के बावजूद काले घोड़े और उस पर सवार महाराजा सयाजीराव तृतीय की प्रतिमा को कोई क्षति नहीं पहुँची। महाराजा सयाजीराव गायकवाड का जन्म 10 मार्च, 1863 को हुआ था। जन्म के समय उनका नाम गोपालराव गायकवाड था। वे काशीराव भिखाजीराव गायकवाड तथा उमाबाई साहिब की दूसरी संतान थे। 1875 में जब बड़ौदा की राजदद्दी रिक्त हुई, तब महारानी जमनाबाई ने अपने वंशजों को बुला कर राजगद्दी का उत्तराधिकारी चुनने को कहा। काशीराव के तीन पुत्र थे। आनंदराव, गोपालराव और सांप्रतराव।

मैं यहाँ शासन करने आया हूँ…

काशीराव तीनों पुत्रों के साथ कावलाना से 600 किलोमीटर चल कर वडोदरा आए। जब इन युवकों से लोगों ने पूछा कि आप लोगों का बड़ौदा आने का मुख्य उद्देश्य क्या है, तब गोपालराव ने बेझिझक और बेबाक उत्तर दिया, ‘मैं यहाँ शासन करने आया हूं।’ इसके बाद गोपालराव ने तत्कालीन बड़ौदा राज्य के महाराजा के रूप में 1875 में बड़ौदा राज सिंहासन संभाला और वे महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय कहलाए। उन्होंने 1939 तक बड़ौदा राज्य पर शासन किया था। उनके शासन के दौरान बड़ौदा राज्य में शैक्षणिक व सामाजिक सुधार की झड़ी लगी थी। उन्होंने शासन और व्यवस्था को अलग बनाया। बड़ौदा विधान परिषद् का गठन किया। पिछड़े वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया। कीर्ति मंदिर, न्याय मंदिर, खंडेराव मार्केट, लक्ष्मी विलास पैलेस (महल), कला भवन जैसे अनेक दर्शनीय स्थलों का निर्माण करवाया। महाराजा सयाजीराव गायकवाड तृतीय ने प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य और नि:शुल्क बनाई। 1939 में उनका निधन हुआ।

Article Categories:
News

Comments are closed.

Shares