BIG BREAKING NOW : ओ बाप रे ! गुजरात में आया ‘भीषण’ चक्रवात ! कहाँ, किसका, और कितना हुआ ‘विनाश’ ? जानिए केवल यहाँ

Written by

रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

देश के चार राज्यों में आया फानी तूफान तबाही के कुछ मंज़र छोड़ कर चला गया, परंतु गुजरात में आज से 13 दिन पहले एक ‘भीषण’ चक्रवात आकर गुज़र गया। इस चक्रवात ने कुछ हिस्सों नहीं, अपितु पूरे गुजरात पर प्रभाव डाला। 52 वर्षों के बाद पहली बार गुजरात इतनी ‘भयावह’ आंधी से गुज़रा है और इसने कहाँ, किसका और कितना विनाश किया, यह हम आगे आपको बताएँगे।

चूँकि ‘भीषण’ चक्रवात गुज़र चुका है, इसलिए घबराने की आवश्यकता नहीं है, परंतु इस चक्रवात ने जो विनाश किया है, उसका अभी तक रहस्योद्घाटन नहीं हुआ है। यह चक्रवात भले गुजरात के सभी हिस्सों में आया हो, परंतु इसका प्रभाव केवल 416 व्यक्तियों पर पड़ा है। अभी यह रहस्य बना हुआ है कि इस चक्रवात ने इन 416 व्यक्तियों में से कहाँ, किसका और कितना विनाश किया होगा। आपके मन में भी प्रश्न उठ रहा होगा कि आख़िर यह चक्रवात आया कब ? तो इस प्रश्न का उत्तर आप अपनी उंगलियों पर 13 दिन बाद भी नहीं मिटे उस निशान से ढूँढ सकते हैं।

जी हाँ। हम बात कर रहे लोकसभा चुनाव 2019 की, जिसमें गुजरात ने इतिहास रचा है। गुजरात ने तीसरे चरण में गत 23 अप्रैल को हुए मतदान में 52 वर्ष पुराना रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिया है। हम 23 अप्रैल को हुए मतदान के बाद से ही चुनाव आयोग (EC) की वेबसाइट ECI.GOV.IN पर निरंतर दृष्टि गड़ाए हुए थे और मतदान के अंतिम अधिकृत आँकड़े अपलोड होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। यह प्रतीक्षा आज पूरी हुई और इसके साथ ही यह बिग ब्रेकिंग न्यूज़ भी सामने आ गई कि गुजरात ने 2019 में रिकॉर्ड 64.11 प्रतिशत मतदान किया है।

बिना लहर बना रिकॉर्ड, बिना लहर ही टूटा

पृथक गुजरात की स्थापना के बाद पहला लोकसभा चुनाव 1962 में हुआ था। 1962 से 2014 तक गुजरात में लोकसभा के कुल 14 चुनाव हुए। इन 14 चुनावों में सबसे अधिक 63.7 प्रतिशत मतदान का रिकॉर्ड दूसरे ही लोकसभा चुनाव 1967 में बना था, जब पूरे देश में कांग्रेस की तूती बोलती थी और जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे। यद्यपि उस समय कोई लहर नहीं थी, परंतु स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे कांग्रेस के विरुद्ध नई-नई शक्तियाँ उभरने लगीं और चुनौती देने लगीं। कांग्रेस के विरुद्ध सबसे बड़ी लहर और चुनौती लोकसभा चुनाव 1977 में थी, जब आपातकाल लगाने वालीं इंदिरा गांधी के विरुद्ध गुजरात सहित पूरे देश में लहर थी। लग रहा था कि गुजरात इंदिरा विरोधी लहर में मतदान के पिछले रिकॉर्ड को तोड़ देगा, परंतु ऐसा हुआ नहीं। लोकसभा चुनाव 1984 में इंदिरा की हत्या के बाद राजीव गांधी के प्रति सहानुभूति लहर थी। तब भी गुजरात ने 1967 के मतदान का रिकॉर्ड नहीं तोड़ा। 1989 में राजीव विरोधी लहर, 1991, 1996, 1998 और 1999 में भी गुजरात में हिन्दुत्व और भाजपा के पक्ष में परोक्ष-अपरोक्ष लहर थी और परिणाम में तो इस लहर का असर दिखाई दिया, परंतु मतदान में नहीं दिखाई दिया और 1967 का रिकॉर्ड बना रहा। लोकसभा चुनावों के इतिहास में 2014 में भी बहुत बड़े और व्यापक पैमाने पर मोदी लहर थी। मोदी स्वयं गुजरात के मुख्यमंत्री थे, परंतु मोदी लहर में भी गुजरात ने 1967 का रिकॉर्ड नहीं तोड़ा और 63.6 प्रतिशत मतदान ही हुआ। लोकसभा चुनाव 2019 में जब धरातल पर कोई लहर नहीं दिखाई दे रही थी। सभी राजनीतिक दल और नेता पसीना बहा रहे थे मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए। बिना लहर में और गर्मी की तपन के बीच मतदान कम करने की आशंका के चलते राजनीतिक दलों के अलावा चुनाव आयोग और कई निजी क्षेत्रों ने मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के लिए अपने-अपने तरीके से अभियान चलाए और चुनाव आयोग की वेबसाइट ने आज जो आँकड़े जारी किए, उससे उन सभी की मेहनत रंग लाई और गुजरात ने 52 वर्ष पुराना रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिया। इस तरह गुजरात ने 1967 में बिना लहर में बनाया रिकॉर्ड 2019 में बिना लहर में ही तोड़ डाला।

पहली बार 64 के पार, किसका होगा बंटाधार ?

अब यक्ष प्रश्न यह उठता है कि गुजरात में आए इस चुनावी तूफान से किसे नुकसान होगा और किसे फायदा ? गुजरात के लोकसभा चुनावी इतिहास में पहली बार 2019 में 64 पार मतदान का होना क्या संकेत करता है ? जब कोई लहर नहीं थी, तो फिर मतदाता इतनी बड़ी संख्या में क्यों मतदान करने के लिए निकले। ईसी के आँकड़ों के अनुसार गुजरात में कुल 4 करोड़ 51 लाख 25 हजार 680 मतदाताओं में से 2 करोड़ 89 लाख 30 हजार 337 यानी 64.11 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान किया। मतदान करने वालों में 1 करोड़ 57 लाख 15 हजार 980 पुरुष और 1 करोड़ 32 लाख 14 हजार 107 महिला मतदाता शामिल हैं। गत 23 अप्रैल को मतदान का नया रिकॉर्ड बनाने वाले गुजरातियों ने लोकसभा की 26 सीटों पर चुनाव लड़ रहे 371 उम्मीदवारों और विधानसभा की 4 सीटों पर उप चुनाव लड़ रहे 45 उम्मीदवारों यानी कुल 416 लोगों का चुनावी भाग्य इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) में बंद किया है, परंतु प्रश्न यह उठता है कि यह भारी मतदान किसके पक्ष में हुआ है ? गुजरात के चुनावी मैदान में एक तरफ सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और प्रधानंत्री नरेन्द्र मोदी थे, तो दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस व उसके अध्यक्ष राहुल गांधी थे। गुजरात के लोगों के पास ये दो ही विकल्प थे। अब लोगों ने मोदी को प्रधानमंत्री बनाए रखने के लिए भारी मतदान किया या फिर लोगों के मन-मस्तिष्क में मोदी लहर थी और उन्होंने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में देखने की इच्छा से भारी मतदान किया ?

गुजरात ने ‘MODI ONCE MORE’ कहा ?

गुजरात ही नहीं, पूरे भारत के चुनावी इतिहास को खंगालने पर एक आम धारणा यह निकल आती है कि कम मतदान होने का सीधा अर्थ है कि कांग्रेस के परम्परागत मतदाताओं ने तो मतदान किया, परंतु भाजपा का परम्परागत मध्यमवर्गीय मतदाता घरों में बैठा रहा। इसी कारण 2004 में केन्द्र की लोकप्रिय अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को सत्ता से हटना पड़ा था। अब 2019 के जो आँकड़े जारी हुए हैं, उन्हें भी इसी धारणा पर तोला जाए, तो स्पष्ट है कि अधिक मतदान से भाजपा को लाभ होता है। अधिक मतदान यह दर्शाता है कि भाजपा के परम्परागत मतदाता बड़ी संख्या में मतदान केन्द्र में पहुँचे। इस धारणा के आधार पर कहा जाता है कि गुजरात की जनता फिर एक बार केन्द्र में नरेन्द्र मोदी को ही प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहती है। यद्यपि भाजपा को 2014 की तरह ही सभी 26 सीटें मिलेंगी या नहीं ? इसका आकलन करना जल्दबाजी होगा। इस प्रश्न का उत्तर तो 23 मई को ही मिलेगा।

Article Categories:
News

Leave a Reply

Shares