ऐसा भी होता है : दुष्कर्म पीड़िता का ‘बच्चा’ ही बन गया आरोपियों के लिए वरदान ! जानिए कैसे ?

सामान्यत: दुष्कर्म के केस में पीड़िता की बात अधिक सुनी जाती है और उसकी हर बात पर अधिक विश्वास किया जाता है। ऐसे मामलों में आरोपी के विरुद्ध अपराधी घोषित होने से पहले जहाँ लोगों में घृणा पैदा हो जाती है, वहीं पुलिस और अदालतों में भी आरोपी की सफाई को अधिक महत्व नहीं दिया जाता, परंतु गुजरात हाई कोर्ट (HC) ने ऐसे ही एक मामले में निचली अदालत द्वारा 2 आरोपियों को दोषी ठहराए जाने के फैसले को पलट दिया और आरोपियों को निर्दोष घोषित कर दिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मामले में पीड़िता ने एक बालक को जन्म दिया था और यह बालक ही दुष्कर्म के दोनों आरोपियों के लिए वरदान सिद्ध हुआ और उनकी बेगुनाही का सबूत बन गया।

बच्चे के जन्म के बाद दर्ज हुआ मामला

मामला पंचमहाल जिले की मोरवा हडफ तहसील के एक गांव का है। पुलिस थाने में दर्ज शिकायत (FIR) के अनुसार एक 16 वर्षीय किशोरी को दो युवक पकड़ कर एक खेत में खींच ले गये, जहाँ उस पर सामूहिक दुष्कर्म करने के बाद फरार हो गये। पीड़िता ने इस मामले की पुलिस थाने में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई। इस घटना के बाद पीड़िता कक्षा 10 की परीक्षा की तैयारी के लिये राजस्थान में अपने एक रिश्तेदार के यहाँ चली गई, जहाँ उसे पता चला कि वह गर्भवती है। वहाँ उसने एक बालक को जन्म दिया। चूँकि बालक दुष्कर्म के कारण हुआ था, इसलिये किशोरी ने बदनामी से बचने के लिए बच्चे को ‘ठिकाने’लगाने का प्रयास किया, किन्तु वह पुलिस के हाथों पकड़ी गई। इसके बाद इस मामले में सामूहिक दुष्कर्म का मामला दर्ज किया गया।

निचली अदालत ने सुनाई 20 साल की सजा

पुलिस ने इस मामले में अजीत कुमार भगोरा और वजेसिंह डामोर नामक दो आरोपियों को प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस (POCSO) एक्ट के तहत गिरफ्तार किया। आरोपियों अजीत व वजेसिंह के विरुद्ध स्थानीय अदालत में मुकदमा चला और अदालत ने दोनों आरोपियो को सामूहिक दुष्कर्म का दोषी ठहराते हुए 20 साल के कठोर कारावास की सजा और 10 हजार रुपये का दंड दिया। आरोपियों ने निचली अदालत के इस फैसले को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसमें बचाव पक्ष के वकील ए. ए. झाबुआवाला ने दलील दी कि निचली अदालत ने सजा देने से पहले आरोपियों का Deoxyribo Nucleic Acid (डीएनए) टेस्ट नहीं करवाया। मात्र पीड़िता के बयान को ध्यान में लेकर ही आरोपियों को दोषी ठहरा दिया और सजा सुना दी।

DNA परीक्षण ने बचाया आरोपी को

गुजरात हाई कोर्ट ने आरोपियों की अपील को स्वीकार किया और पीड़िता के बालक और आरोपियों का डीएनए टेस्ट करवाया। बालक और आरोपियों का डीएनए अलग-अलग होने से वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हुआ कि आरोपी इस बालक के पिता नहीं हैं। इसलिये हाईकोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण निर्देश दिये कि प्राथमिक रूप से दुष्कर्म पीड़िता के बयान को सत्य मानना चाहिये, किन्तु वैज्ञानिक प्रमाणों को भी ध्यान में लेना चाहिये और जब वैज्ञानिक प्रमाण पीड़िता के बयान से विपरीत हों तो सत्य को उजागर करने के लिये मामले की जाँच करनी चाहिये। इन निर्देशों के साथ हाई कोर्ट ने दोनों आरोपियों को निर्दोष मानते हुए उन्हें सजा से मुक्त कर दिया।

पीड़िता ही सवालों के घेरे में

गुजरात हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब दुष्कर्म पीड़िता ही सवालों के घेरे में आ गई है, क्योंकि जब बच्चे का जन्म हुआ है, तो यह तो निश्चित ही है कि पीड़िता के साथ या तो दुष्कर्म हुआ है या पीड़िता किसी के बहकावे-फुसलावे में आकर अज्ञात बलात्कारी या बलात्कारियों का शिकार हुई है। अब यह पुलिस की जिम्मेदारी है कि वह पीड़िता के साथ शारीरिक संबंध बनाने वाले आरोपियों को खोजे और उन्हें सजा दिलवाए। यदि ऐसा हो कि पीड़िता ने अपनी मरजी से भी किसी से संबंध बनाए हों, तो भी संबंध बनाने वाला व्यक्ति अपराधी ही माना जाएगा, क्योंकि पीड़िता की आयु 18 वर्ष से कम है।

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