माया मिली न राम : टाँय टाँय फिस्स हुआ राहुल का ‘मिशन पाटीदार’ और हार्दिक का ‘मिशन महत्वाकांक्षा’ !

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एक तरफ देश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मिशन स्वच्छता से लेकर मिशन शक्ति तक की सफलताओं को खुली आँखों से देख-समझ-बूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर एक मात्र मोदी विरोध के एजेंडा पर सवार लोगों के राजनीतिक मिशन एक के बाद एक विफल हो रहे हैं।

ऐसे ही दो मिशन गुजरात में दो मोदी विरोधियों ने पिछले चार वर्षों से चला रखे थे। लोकसभा चुनाव 2014 के बाद नरेन्द्र मोदी का गांधीनगर से दिल्ली की ओर प्रयाण होते ही गुजरात में अचानक पाटीदार आरक्षण आंदोलन और हार्दिक पटेल का उदय हुआ, जिसे गुजरात की भाजपा सरकार और पूरी भाजपा ने पहली ही नज़र में कांग्रेस प्रेरित बताया और यह बात गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 से पहले हार्दिक पटेल और राहुल गांधी की गोपनीय मुलाकात सहित कई घटनाक्रमों से सिद्ध भी होती गई कि हार्दिक पटेल का पूरा आंदोलन पाटीदार समाज के लिए नहीं, बल्कि कांग्रेस प्रेरित और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए है। अहमदाबाद में जब कांग्रेस वर्किंग कमिटी (CWC) में हार्दिक पटेल कांग्रेस में शामिल हुए, तो भाजपा और पाटीदारों के अनेक वर्गों में उपजे इस संशय पर अंतिम मुहर भी लग गई कि हार्दिक पटेल वास्तव में कांग्रेस के मोहरे के रूप में ही काम कर रहे थे।

वास्तव में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की समझ में नहीं आ रहा था कि गुजरात में 1989 से 2017 तक हुए लोकसभा और विधानसभा के सभी चुनावों में भाजपा से मात खाने वाली मृतप्राय कांग्रेस को कैसे पुनर्जीवित करें। पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस ने पूरे देश में 2014 की मोदी लहर जैसी मोदी विरोधी लहर चलाने की कवायद शुरू की और मोदी विरोधी राजनीतिक दलों और नेताओं को लाबमंद करना शुरू किया।

चूँकि गुजरात में कांग्रेस के पास मोदी विरोधी कोई राजनीतिक दल को लामबंद करने का विकल्प था ही नहीं। ऐसे में राहुल ने मोदी विरोधी व्यक्तियों को लामबंद किया और उसकी नज़र उन तीन नेताओं पर पड़ी, जिनका एजेंडा केवल और केवल मोदी विरोध था। अब यह बात खुल कर इसलिए कही जा सकती है, क्योंकि उन तीन नेताओं में से सबसे पहले ओबीसी समाज के तथाकथित मसीहा अल्पेश ठाकोर कांग्रेस की गोद में जा बैठे और अब पाटीदार समाज को आरक्षण और न्याय के नाम पर गुप्त मोदी विरोधी एजेंडा लेकर चल रहे हार्दिक पटेल भी कांग्रेस में शामिल हो गए। रह गए तथाकथित दलित नेता और विधायक जिग्नेश मेवाणी, तो उन्होंने चतुराईपूर्वक अपने ऊपर किसी पार्टी का ठप्पा नहीं लगने दिया, परंतु उनकी विचारधारा और लड़ाई भी मोदी विरोध पर ही केन्द्रित है।

गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 में भरसक प्रयास करने के बाद भी 27 वर्षों से सत्ता से बाहर कांग्रेस सरकार बनाने का जादुई आँकड़ा 92 को नहीं छू सकी, तो उसने लोकसभा चुनाव 2019 में गुजरात में हार्दिक पटेल के नाम पर मिशन पाटीदार लागू किया। हार्दिक को कांग्रेस में लाने में राहुल सफल हुए, लेकिन उनकी इस सफलता से हार्दिक के मिशन महत्वाकांक्षा की पोल भी खुल गई। राहुल को लगा कि हार्दिक को अपने पाले में कर वह वर्षों से भाजपा का वोट बैंक रहे 18 प्रतिशत पाटीदार समुदाय का फायदा उठा सकेगी, लेकिन गुजरात उच्च न्यायालय (HC) ने राहुल के मिशन पाटीदार और हार्दिक के मिशन महत्वाकांक्षा पर पानी फेर दिया।

चुनाव नहीं लड़ सकेंगे हार्दिक पटेल

हार्दिक पटेल की राजनीतिक महत्वाकांक्षा तो 2015 में जब उन्होंने पाटीदार आरक्षण आंदोलन शुरू किया, तभी से उछालें मार रही थीं, लेकिन आयु सीमा की बाधा के कारण वे राजनीति में कूद नहीं रहे थे। अन्यथा वे तो गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 में ही कांग्रेस का दामन थाम कर चुनाव मैदान में कूद जाते। अब जबकि उम्र की बाधा उन्होंने पार कर ली और उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा को कांग्रेस की महत्वाकांक्षा के साथ जोड़ कर लोकसभा चुनाव 2019 में कूदने का फैसला किया, तो गुजरात हाई कोर्ट के एक फैसले ने राहुल और हार्दिक दोनों के मिशनों की हवा निकाल दी। क्योंकि गुजरात हाईकोर्ट के इस फैसले के मुताबिक हार्दिक पटेल लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ सकेंगे।

क्या है गुजरात हाई कोर्ट का फैसला ?

गुजरात उच्च न्यायालय ने पाटीदार आरक्षण आंदोलन के दौरान मेहसाणा के विसनगर में दंगा भड़काने के एक मामले में निचली अदालत की ओर से दी गई 2 वर्ष की सजा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। सजा पर रोक लगाने की यह याचिका इसलिए दायर की गई थी, ताकि हार्दिक चुनाव लड़ सकें, परंतु कोर्ट ने सजा पर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया। अब वर्तमान चुनावी नियमों के मुताबिक किसी भी न्यायालय द्वारा दोषी और दंडित किया गया व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता। ऐसे में हार्दिक की चुनाव में मोदी के विरुद्ध ताल ठोकने की मंशा पर पानी फिर गया। वे जामनगर लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले थे।

क्या कोर्ट से ऊपर हैं हार्दिक ?

हमारे देश में किसी भी अदालत के फैसले का पूरी तरह सम्मान किया जाता है। किसी भी निर्णय को चुनौती देने का अधिकार सबको है, परंतु निर्णय को अनुचित ठहराना अदालत की अवमानना कहलाता है। हार्दिक पटेल ने गुजरात हाई कोर्ट के फैसले पर जो प्रतिक्रिया दी, उससे यही लगता है कि वे स्वयं को कोर्ट यानी संविधान से ऊपर मानते हैं, क्योंकि देश की कोई भी अदालत संविधान के दायरे में रह कर ही कोई निर्णय सुनाती है। हार्दिक ने HC के निर्णय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ट्वीट किया, ‘भाजपा ने संविधान के खिलाफ काम किया है और मुझे ही चुनाव लड़ने से क्यों रोका जा रहा है ?’

इस ट्वीट से हार्दिक की नादानी और अपरिपक्वता दोनों उजागर होते हैं। क्या हार्दिक ये नहीं जानते कि अदालत में किसी व्यक्ति के विरुद्ध प्रतिवादी कोई पार्टी नहीं, बल्कि सरकार होती है। सरकार को ये लगता है कि हार्दिक की सज़ा पर रोक लगाना उचित नहीं है, तो यह सरकार की अपनी राय है, परंतु जब अदालत सरकार की राय से सहमत हो जाए, तो उस पर भाजपा को दोषी ठहराने का क्या मतलब है ?

क्या है मामला और क्या कहता है कानून ?

वर्ष 2015 में पाटीदार आरक्षण आंदोलन के दौरान मेहसाणा के विसनगर में स्थानीय भाजपा विधायक ऋषिकेश पटेल के कार्यालय में हुई तोड़फोड़ के मामले में विसनगर की अदालत ने 17 आरोपियों में से 3 को दोषी ठहराया था, जिनमें पाटीदार आरक्षण आंदोलन समिति (PAAS) के संयोजक हार्दिक पटेल और सरदार पटेल ग्रुप (SPG) के अध्यक्ष लालजी पटेल भी शामिल हैं। कोर्ट ने तीनों को 2 साल की सजा सुनाई थी। अब जबकि गुजरात उच्च न्यायालय ने इस सजा को बरकरार रखा है, तब जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951 के मुताबिक हार्दिक पटेल दागी नेता की श्रेणी में आ जाते हैं और इस अधिनियम के अनुसार 6 वर्ष तक चुनाव लड़ने पर रोक का प्रावधान है। ऐसी ही सजा भुगत रहे हैं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव।

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