जानिए विज्ञान की दुनिया के उस ‘हंस’ को, जिसकी तकनीक आज भी पढ़ रहे हैं बायोलॉजी के स्टूडेंट्स !

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 13 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। इंटरनेट के सर्च इंजन गूगल ने शुक्रवार को प्रख्यात जीवाणु वैज्ञानिक यानी माइक्रो बायोलॉजिस्ट हैंस क्रिश्चियन ग्रैम को उनके 166वें जन्मदिन पर स्मरण करते हुए एक खास डूडल प्रस्तुत किया है। विज्ञान के सरोवर के ‘हंस’ कहलाने वाले हैंस ग्रैम ने माइक्रो बायोलॉजी में बैक्टीरिया से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ दुनिया को दी हैं। उन्हें माइक्रो बायोलॉजी के ग्राउण्डबेकिंग खोज की तकनीक ग्रैम स्टेन खोजने का श्रेय दिया जाता है। गूगल ने डेनिश बैक्टीरियोलॉजिस्ट हैंस क्रिश्चियन ग्रैम की याद में यह खास एनीमेटेड डूडल बनाया है। इस डूडल को डेनिश आर्टिस्ट मिकेल सोमर ने तैयार किया है। इसमें हैंस ग्रैम को दिखाया गया है, साथ ही उन्हें प्रयोग करते हुए भी दर्शाया गया है और उन्होंने जिन बैक्टीरिया की खोज की, वह बैक्टीरिया भी दर्शाए गये हैं।

कौन हैं हैंस क्रिश्चियन ग्रैम ?

बैक्टीरियोलॉजिस्ट के रूप में मशहूर हैंस क्रिश्चियन ग्रैम का जन्म 13 सितंबर 1853 को कोपेनहेगन की राजधानी डेनिश (दानिश) में हुआ था। उन्होंने 1878 में कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी से एमडी किया था। इसके बाद जीवाणु विज्ञान तथा फार्माकोलॉजी की पढ़ाई के लिये यूरोप चले गये थे। उन्होंने 1878 से लेकर 1885 तक यूरोप की यात्रा की। यूरोप यात्रा के दौरान बर्लिन में एक माइक्रो बायोलॉजिस्ट लैब में काम करते हुए उन्होंने देखा कि क्रिस्टल वायलेट से बैक्टीरिया के स्मीयर का इलाज किया गया था। इसके बाद एक आयोडीन सॉल्युशन तथा एक ऑर्गेनिक सॉलवेंट से अलग-अलग सेंपल्स की संरचना तथा बायो कैमिकल फंग्शन में अंतर का पता चला। बर्लिन में ही 1884 में उन्होंने बैक्टीरिया के वर्गीकरण करने का तरीका इजाद किया था। उन्होंने बैक्टीरिया से जुड़े महत्वपूर्ण फैक्ट्स और तकनीक की खोज की थी। उन्होंने बैक्टीरिया को उनके कैमिकल रिएक्शन और फिजिकल कंडीशन के आधार पर वर्गीकृत किया था। बैक्टीरिया की भीतरी झिल्ली के आधार पर तथा कैमिकल रिएक्शन और फिजिकल कंडीशन के आधार पर अलग-अलग नाम दिये थे। उन्होंने अपने शहर डेनिश में एक लोकल सिविक हॉस्पिटल में जनरल फिजिशयन के रूप में मेडिकल क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की थी। आज के दौर में माइक्रोस्कॉप से बैक्टीरिया का पता लगाने की जिस तकनीक का उपयोग होता है, उसकी खोज हैंस क्रिश्चियन ग्रैम ने ही की थी। बायोलॉजी में उनकी इस तकनीक को नेमसेक स्टेनिंग तकनीक के रूप में जाना जाता है, जो एक बहुत महत्वपूर्ण और बड़ी खोज साबित हुई है। इस तकनीक में ग्रैम स्टेन मैथड से बैक्टीरिया का पता लगाने का प्रयास किया जाता है। बैक्टीरिया पर एक पर्पल रंग की मोटी परत होती है, जिसे ग्रैम पॉजीटिव कहा जाता है, जबकि पतली परत वाले बैक्टीरिया को ग्रैम नेगेटव नाम से जाना जाता है। डेनिश वैज्ञानिक की 85 वर्ष की उम्र में वर्ष 14 नवंबर-1938 को मृत्यु हो गई। हालाँकि उन्होंने मेडिकल साइंस में खास कर माइक्रो बायोलॉजी के इतिहास में जो ग्रैम स्टेनिंग तकनीक का आविष्कार किया है, उसे बायोलॉजी के छात्र प्रयोगशाला में आज भी उपयोग करते हैं और इसी महत्वपूर्ण आविष्कार के लिये इतिहास में हैंस क्रिश्चियन ग्रैम को उनकी मृत्यु के बाद भी स्मरण किया जाता है।

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