अंग्रेजी के प्रभाव में धुंधला रही है भारत के मस्तक की बिंदी, परंतु इस युवती ने फिजी में यूँ बढ़ाया हिन्दी का मान और गौरव

Written by

हमारे राजनेताओं के वक्तव्य तो हम सब आये दिन सुनते और पढ़ते रहते हैं। यह राजनेता भारत को फिर से विश्व गुरु बनाने की दिशा में आगे बढ़ने की बड़ी-बड़ी बातें और दावे करते हैं, परंतु दुर्भाग्य से वास्तविकता कुछ और ही है। यह वास्तविकता इतनी चिंताजनक है कि इसके बारे में गहराई से विचार करने पर भी मन घबरा जाता है या कहिये कि भयभीत हो जाता है। हम पश्चिम, उसकी संस्कृति और अंग्रेजी भाषा के प्रति उसकी पागलपन के अंधानुकरण में इतने डूब गये हैं कि स्वयं को ही भूल गये हैं। इससे भले ही हम अमेरिका और ब्रिटेन की बराबरी कर लें, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि ऐसा हुआ, तो भले ही भारत दूसरा अमेरिका या ब्रिटेन बन जाये, लेकिन यह तो तय है कि भारत, भारत तो नहीं रह जायेगा।

ऐसे कैसे बनेंगे विश्व गुरु ?

हमारे राजनेता भारत को फिर से विश्व गुरु बनाने की बात करते हैं। लेकिन ऐसा कैसे होगा, इसकी कोई रणनीति, कोई योजना यह नेता हमें नहीं बताते हैं। हर देश की अपनी एक राष्ट्रभाषा है, परन्तु हमारे देश की राजनीतिक मनोदशा का दुष्परिणाम देखिये कि हमारे देश के पास अपनी कोई राष्ट्रभाषा ही नहीं है। स्कूली बालकों को हिन्दी राष्ट्रभाषा बताकर पढ़ाई जाती है। जबकि वास्तव में हिन्दी को हमारे संविधान में केवल राजभाषा के रूप में ही मान्यता प्राप्त हुई है, न कि राष्ट्रभाषा के रूप में। हम भारत की प्राचीन संस्कृति, परंपरा आदि की बात नहीं कर रहे हैं। हम वर्तमान की बात कर रहे हैं। हमारे देश का नाम तक तय नहीं है कि यह भारत है या हिन्दुस्तान या फिर इण्डिया। संयुक्त राष्ट्र परिषद में हमारे नेता हिन्दी में वक्तव्य देकर फूले नहीं समाते हैं। इसका ऐसा प्रचार करते हैं, ऐसा ढिंढोरा पीटते हैं जैसे हमने हिन्दी में वक्तव्य देकर हिन्दी को अंग्रेजी की तरह वैश्विक भाषा का दर्जा दिला दिया हो।

हिन्दी काव्य संग्रह का विमोचन

प्रशांत महासागर के द्वीपीय राष्ट्र फिजी की एक ख्यातनाम हिन्दी कवियित्री श्वेता दत्त चौधरी के कविता संग्रह ‘यह भी मेरे देश की मिट्टी, वह भी मेरे देश की मिट्टी’का पिछले दिनों नई दिल्ली में विमोचन हुआ। भारत में फिजी के राजदूत योगेश पुंजा ने इस पुस्तक का विमोचन किया। इस मौके पर कई गणमान्य हस्तियां उपस्थित रहीं। श्वेता दत्त चौधरी ने भारत में हिन्दी की उच्च शिक्षा प्राप्त की है। वह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं। इस मौके पर उन्होंने अपने पूर्वजों की मातृभूमि भारत के साथ काव्यात्मक सम्बंध का वर्णन किया।

इस बात का उल्लेख हम इसलिये कर रहे हैं कि भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी हो या न हो, लेकिन फिजी की राष्ट्रभाषा हिन्दी है। क्या भारत के राजनेता इससे कोई सीख लेंगे या हम अपने ही देश में हर साल 14 सितम्बर को सिर्फ एक दिन सभी संस्थाओं में हिन्दी में काम करके हिन्दी दिवस मनाकर संतुष्ट होते रहेंगे।

अगर भारत को सचमुच विश्व गुरु बनाने की दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति है तो हमें हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सम्मान देकर हिन्दी को सर्वप्रथम अपने ही देश में सर्वसामान्य की भाषा बनाने पर गंभीरता से काम करना होगा। अंग्रेजी के प्रयोग पर अंकुश लगाना होगा, इतना ही नहीं हिन्दी में अंग्रेजी की घुसपैठ पर भी अंकुश लगाना होगा और शुद्ध हिन्दी को बोलचाल में लाना होगा। अस्तित्व खोते जा रहे हिन्दी के मूल शब्दों का फिल्मों, सीरियलों, रियलटी शो और सोशल मीडिया में परिहास करने पर रोक लगानी होगी। अंग्रेजी माध्यम में अपने बच्चों को पढ़ाने की होड़ समाप्त करनी होगी और हमारे युवाओं को उच्च शिक्षा के लिये विदेशों के विजा की कतारों में न लगना पड़े, इसके लिये उन्हें वह सभी तकनीकी डिग्री कोर्स अपनी भाषा में स्वदेश में ही उपलब्ध कराने की ठोस व्यवस्था करनी होगी और यह सब बातों या दावों में नहीं होना चाहिये। इस दिशा में अमल होना चाहिये। जब तक हम हिन्दी को सम्मान नहीं देंगे तब तक उसे विश्व स्तर पर सम्मान नहीं दिला पाएंगे।

Article Tags:
· · ·
Article Categories:
News

Leave a Reply

Shares