अजब विरोध-गज़ब विरोधाभास : दिल्ली में मोदी के विरुद्ध एकजुट क्षेत्रीय दल राज्यों में कांग्रेस को भाव देने को तैयार नहीं !

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लोकसभा चुनाव 2014 में 44 सीटों पर समिट जाने वाली कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा चुनाव 2019 में एक मात्र मोदी विरोध के एजेंडा के सहारे दिल्ली में तो मोदी विरोधियों को एकजुट कर शक्ति प्रदर्शन कई बार कर चुके हैं, परंतु ऐसे कई राज्य हैं, जहाँ क्षेत्रीय दल कांग्रेस को भाव देने को तैयार नहीं हैं।

सबसे पहले बात करते हैं आज के घटनाक्रम की, जो केरल में घटित हुआ। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने केरल की वायनाड सीट से नामांकन पत्र दाखिल करते हुए एक शपथ ली कि वे चुनाव प्रचार में सत्तारूढ़ सीपीएम के उम्मीदवार के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं बोलेंगे। केरल में सीपीएम की मुख्य लड़ाई ही कांग्रेस के साथ है। ऐसे में सीपीएम भला राहुल को क्यों बख्शेगी। उसने तो राहुल के विरुद्ध उम्मीदवार भी उतारा है। एनडीए की ओर से बीडीजेएस के तुषार वेल्लापल्ली चुनाव लड़ रहे हैं। राहुल की शपथ का अर्थ है कि वे केवल मोदी और एनडीए उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार करेंगे, परंतु मुख्य चुनौती तो सीपीएम से मिलने वाली है। यह कैसा विरोध और कैसा विरोधाभास है ?

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अब बात करते हैं उत्तर प्रदेश की। उप चुनावों में मिली जीत के बाद सपा-बसपा ने 25 वर्ष पुरानी दुश्मनी भुला दी। सपा-बसपा और आरएलडी ने कांग्रेस के लिए यूपी की 80 में से केवल 2 सीटें अमेठी और रायबरेली ही छोड़ीं। इससे बड़ी बेइज्ज़ती क्या होगी ? यद्यपि राहुल ने प्रियंका गांधी वाड्रा को उतार कर यूपी में भाजपा के खिलाफ राजनीति में एंट्री करा कर बड़ा दाँव चला। यूपी में भी कांग्रेस, सपा, बसपा, आरएलडी सबका मकसद मोदी का विरोध है, परंतु कांग्रेस सभी सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है, जहाँ सपा-बसपा-आरएलडी के उम्मीदवार भी होंगे। तो क्या राहुल ये शपथ भी लेंगे कि वे यूपी में सपा-बसपा-आरएलडी उम्मीदवारों के खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे ?

ऐसा ही मज़ेदार विरोधाभास पश्चिम बंगाल में है। मोदी विरोधी मोर्चे की मुखर नेता तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी चाहती हैं कि मोदी केन्द्र की सत्ता में कम बैक न करें। पश्चिम बंगाल के शेष राजनीतिक दल वामपंथी पार्टियाँ भी यही चाहती हैं और राहुल भी यही चाहते हैं, परंतु विरोधाभास देखिए। पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ टीएमसी केन्द्र में मोदी-भाजपा की वापसी नहीं देखना चाहती, परंतु राज्य में उसके विरुद्ध चुनौती वामपंथी और कांग्रेस ही है। दिल्ली में एक नाव में सवार ये सारे नेता पश्चिम बंगाल में अलग-अलग नाव में सवार हैं। तो क्या राहुल पश्चिम बंगाल में भी यह शपथ लेंगे कि वे केवल भाजपा उम्मीदवार के विरुद्ध ही प्रचार करेंगे ?

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