कैसे लायें जीवनमें खुशियाँ-श्री अनंत बिहारी गोस्वामी जी

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आमतौरपर लोग नहीं जानते कि खुशी क्‍या है ? ढेर सारे पैसे, ऐशो-आराम होते हुए भी आज लोग खुश नहीं हैं, जबकि जिनके पास ज्यादा कुछ नहीं होता, फिर भी वे खुश रहते हैं। सच्चाई तो यह है कि खुशी कहीं नहीं, बल्कि हमारे अन्दर हर समय मौजूद रहती है,जिसे हम देख नहीं सकते, पर महसूस कर सकते हैं। श्री अनंत बिहारी गोस्वामी जी ने अनुसार, ज्यादातर लोग यह नहीं जानते कि खुशी क्या है ? वे समझते हैं कि खुशी मिलती है बहुत सारे पैसेसे, बड़ेसे घर या बढ़िया मकानसे, लेकिन वास्तवमें सच यह है कि कई लोग यह सब कुछ होते हुए भी खुश नहीं हैं; चेहरेपर चमक नहीं है जबकि बहुत-से लोग इन सबके बिना भी बहुत खुश हैं और जिन्दगीका भरपूर सुख उठाते रहते हैं।’श्री अनंत बिहारी गोस्वामी जी कहते है वे लोग दुखी रहनेमें सबसे आगे हैं जो नकारात्मक चीजोंपर अधिक ध्यान देते हैं जैसे जीवनमें क्या-क्या गलत है या उन्हें क्या-क्या अभीतक नहीं मिल पाया। इसके विपरीत वे लोग कम-से-कम में भी सुखी हैं, जिन्हें जो कुछ भी मिला है, वे उसीसे सन्तुष्ट हैं ॥ श्री अनंत बिहारी गोस्वामी जी कहते है नकारात्मक तत्त्व हमारे जीवनमें दुःख, असंतोष एवं अशान्तिका  संचार करते हैं जबकि सकारात्मक तत्त्व हमें आन्तरिक खुशी, संतोष एवं शान्ति देते हैं।

खुशी बाजारमें मिलनेवाली कोई वस्तु नहीं है जिसे पैसे देकर खरीदा जा सके। इसका कोई आकार नहीं होता और न ही इसे चुराया जा सकता है। खुशी छोटी या बड़ी नहीं होती और न ही यह बड़ी चीजोंको हासिल करनेसे बनी रहती है। यह तो जिन्दगीकी छोटी-छोटी चीजोंसे मिलती रहती है। बस! हमें उन्हें देखने तथा समझनेका तरीका नहीं आता। सच तो यह है कि जीवनमें बड़ी उपलब्धि एवं बड़ी खुशी पानेके लिये हम इन ढेर सारी छोटी-छोटी खुशियोंकी निरर्थक बलि देते रहते हैं और इस तरह न तो हम वर्तमानमें खुश रह पाते हैं और न ही भविष्यको सुखद कर पाते हैं इसका कारण यह भी है कि निरन्तरके नकारात्मक चिन्तनसे और इस सोचसे कि जो हमें मिला है, वह कम है । हमारा स्वभाव ही कुछ इस तरहका बन जाता है कि हम जाने-अनजाने मिलनेवाली इन खुशियों की परवाह ही नहीं करते और सदा दुखी रहनेको अपना स्वभाव बना लेते हैं।

खुशी तो देनेकी चीज है, जिसे जितना बाँटो, वह उतनी ही बढ़ती है । यह जितना चाहो, उतनी मिल सकती है। बस, हमें केवल इसे देखने एवं समझनेका नजरिया बदलनेकी आवश्यकता है। प्रश्न यह उठता है कि इस दृष्टिकोणको कैसे बदला जाय ? कुछ ऐसे सरल एवं आसान उपाय हैं, जिन्हें अपनाकर हम न केवल अपने नकारात्मक दृष्टिकोणको बदल सकते हें बल्कि स्वयंको सदा खुश भी रख सकते हैं।

 ऐसा ही एक उपाय है कि हम सदा स्वयंसे प्रेम करें। जब हम स्वयंको चाहते हैं, पसन्द करते हैं, तब ही दूसरोंसे प्रेम कर पानेमें और उन्हें आत्मीयता दे पानेमें समर्थ हो पाते हैं । जो स्वयंसे असन्तुष्ट होते हैं और सदा अपने व्यक्तित्वमें कमियाँ देखते रहते हैं, उनके आत्मविश्वासमें कमी बनी रहती है और वे दूसरोंका भी प्रोत्साहन नहीं कर पाते। उनकी अपनी असुरक्षा उन्हें दूसरोंको भी संरक्षण और सुरक्षा देनेमें नाकामयाब बना देती है। इस कमीको दूर करनेका एक अच्छा उपाय यह है कि हम नियमित अपनी डायरीमें कम-से-कम एक सत्य सकारात्मक घटना अपने विषयमें लिखें। ऐसा करनेके लिये हमें अपनी खामियोंको न देखकर अपनी खूबियोंपर ध्यान केन्द्रित करना होगा तथा सत्य लिखनेकी आदत हमें ऐसा कर्म करनेके लिये प्रेरित भी करेगी । धीरे-धीरे सकारात्मक घटनाक्रमोंसे हमारी डायरी भी भरेगी और हमारे जीवनमें भी सद्‌गुणोंका समावेश होता चला जायगा।

महापुरुषोंका कथन है– ‘सुख बॉटें और दुःख बॉँटायें। यह जीवनकी खुशियोंको बढ़ानेका मूल मन्त्र है । हमारे सुख बाँटनेमें ही हमारी खुशी छिपी है और यदि हम इसे छिपाकर रखते हैं तो यह कभी विकसित नहीं हो पाती और दूसरोंके दुःखको बँटानेसे एक तो उनका दुःख कम होता है और दूसरा इस परोपकारसे हमें वह आन्तरिक सन्तुष्टि मिलती है जिसकी सुगन्ध वायुमें फैलती है और सभीको आनन्दित करती है। अपनी नकारात्मक सोचसे मुक्ति पानेके लिये सकारात्मक सोचको अपनाना जरूरी है और इसे अपनानेके लिये जरूरी है कि हम न केवल दिये गये उपायोंको अपनी सोचमें सम्मिलित करें वरन्‌ उनका निरन्तर प्रयोग भी करें, तभी व्यक्तित्वमें स्थायी परिवर्तन ला पाना सम्भव होगा,जो हमारे सुखको बढ़ानेमें सहायक सिद्ध होगा।

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